आलू संकट की बलि चढ़ गये अरुप विश्वास…

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-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

आलू उत्पादक बंगाल में अभूतपूर्व आलू संकट है. इस संकट की वजह से कोलकाता से आलू गायब है. आलू जबतक समोसे में रहेगा, तब तक रहेगा लालू. लालू अब जेल में है और जाहिर है समोसे में आलू कम से कम बंगाल से गायब होने जा रहा है. बंगाल की मशहूर भुखमरी और साठ के दशक के खाद्य संकट से बड़ा हो गया है आलू संकट. इसकी वजह से आधार संकट की चर्चा बंद हो गयी है. राजकाज ठप्प है और सरकार की सारी निष्ठा आलू में समाहित हो गयी है. जाहिर है कि पूरा बंगाल मधुमेह का शिकार है नहीं. बिरयानी सबसे लोकप्रिय रेसिपि है. इसलिए सब्जी चाहे अस्सी पार हो, अनाज, दाल तेल, पेयजल, बिजली, ईंधन, शिक्षा, चिकित्सा, यातायात चाहे कुछ भी महंगा हो, या मिले ही नहीं,कोई परवाह नहीं. सबसे पहले थाली में आलू हाजिर करो. नवान्न से छापे मारने बाजार बाजार दौड़ रही हैं ममता बनर्जी.alu and mamta

इस संकट की बलि चढ़ गये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नजदीकी समझे जाने वाले महान पूजा आयोजक अरुप विश्वास, जिनसे कृषि विपणन विभाग की जिम्मेदारी छीनकर दीदी ने अपने हाथों में ले ली. इससे पहले उद्योग और कारोबार का माहौल न सुधरने के कारण उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के पर छांट दिये गये. बंगाल में राजकोष विभिन्न रंग बिरंगे सरकारी खर्च की वजह से जिस तेजी से खाली होता जा रहा है, जिस तरह केंद्र को मदद को तैयार नहीं है और आर्थिक बदहाली का जो आलम है, मसलन मंहगाई भत्ता भी बकाया है, बहुत ताज्जुब होना नहीं चाहिए कि किसी दिन ब्रेकिंग न्यूज से पता चलेगा कि वित्त मंत्रालय भी दीदी ने अपने हाथों में ले लिया है.

पहले से दीदी के पास गृह मंत्रालय से लेकर चिकित्सा मंत्रालय तक तमाम बेहद खास मंत्रालय हैं. जिस तेजी से वे बाकी मंत्रियों से उनका कामकाज अपने हाथ में ले रही हैं, किसी दिन सारे मंत्रालय उनके ही हाथों में होंगे.

अगर सारा राजकाज दीदी को करना है, तो जनता के खर्च पर इतना भारी भरकम मंत्रालय क्या घुइय़ा छीलने के लिए रखा गया है, यह सवाल उठाने का वक्त आ गया है.

दीदी ने संभाली आलू युद्ध की कमान. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता, हावड़ा के नहीं,कृपया इसे नोट किया जाये, के खुदरा बाजारों में आलू की कमी से निबटने के तौर तरीके को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार की तेज हो रही आलोचना के मद्देनजर अस्थायी रुप से राज्य कृषि विपणन विभाग प्रभार खुद संभाल लिया है.

मजा तो यह है कि अस्थाई निलंबन की हालत में, फिर भी मंत्री बने रहेंगे अरुप. उनके लिए बड़ी राहत की बात है कि आलू संकट खत्म होते ही फिर उनका लोटा कंबल उन्हीं को लौटा देंगी दीदी. राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्र, मुख्य सचिव संजय मित्र तथा वरिष्ठ सरकारी एवं पुलिस अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक के बाद ममता ने संवाददाताओं से कहा, “मैंने (कृषि विपणन मंत्री) अरुप राय से कहा है कि अब से कुछ दिन तक मैं विभाग का कामकाज देखूंगी, लेकिन वह ही इसके मंत्री बने रहेंगे.”

बाजार पर अंकुश लगाने के लिए आलू की धरपकड़ भारी साबित होने लगी है. राज्य सरकार ने खुदरा बाजार में आलू की कीमत 13 रुपए प्रति किलोग्राम कर दिया और इसके बाद बाजार की बाजीगरी शुरु. यक ब यक आलू की कृत्रिम कमी पैदा हो गयी और सरकार बहादूर के माथे पर बल.
वायदे से मुकर गये व्यापारी
हालांकि मुख्यमंत्री ने जमाखोरों को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी जिसमें बेईमान व्यापारियों का लाइसेंस रद्द किया जाना भी शामिल है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार और व्यापारियों के बीच बैठक के दौरान खुदरा बाजारों में 13 रुपए प्रति किलोग्राम तथा थोक बाजार में 11 रुपए प्रतिकिलोग्राम की दर से आलू बेचने का फैसला हुआ, लेकिन व्यापारी अपने वादे से मुकर गए और वे कृत्रिम कमी पैदा कर रहे हैं. किसी को नहीं सोचना चाहिए कि हमारी सरकार कमजोर है. जमाखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

वित्तमंत्री चंदंबरम को वित्तीय घाटे और विकास दर की चिंता है जबकि असल बात है कि न वित्तीयघाटा, न भुगतान संतुलन, न मंहगाई, न मुद्रास्फीति और न कोई दूसरा संकट देश में है. चारों तरफ आलू के लिए त्राहि त्राहि मची हुई है. लोग प्याज के लिए भी इतना नहीं रोये, जितना कि आलू के लिए हाहाकार है. मजा तो यह है कि आलू के लिए सिर्फ पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि पूर्वी भारत के विभिन्न राज्यों में इसे लेकर हाहाकार मचा हुआ है, क्योंकि पूर्वी भारत के प्राय: सभी राज्यों में आलू की आपूर्ति पश्चिम बंगाल से ही होती है. अपने किस्म का एक अनोखा फैसला करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के बाहर सब्जियों और आलू के निर्यात पर रोक लगा दी है. कीमतों में हो रही तेज वृद्धि के मुद्दे पर बुलाई गई बैठक के बाद उन्होंने कहा, ‘जब तक कि कीमतें एक सही स्तर पर नहीं आ जाती हैं तब तक पश्चिम बंगाल से बाहर सब्जियों के आवागमन की अनुमति नहीं दी जाएगी.’ उन्होंने कहा कि कुछ व्यापार बारिश और बाढ़ का बहाना बनाकर कीमतें ऊंची कर रहे हैं. इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

बंगाली आलूबाजी का करिश्मा अब राजधानी दिल्ली में भी दिख रहा है, जहां आलू बेहद मंहगा हो रहा है. बंगाल में जहां दो रुपये भाव घटाने के लिए सरकार सब्सिडी तक दे रही है, मंत्री खुद आलू बेचने के बाद भी नौकरी से खारिज हैं और मुख्यमंत्री सरेबाजार मारे मारे घूम रही हैं, वहीँ, दिल्ली और भोपाल में हफ्ते भर पहले ही आलू चालीस पार है. शायद वहां सारे लोग शुगरिये हैं या फिर म्लेच्छ, जिनका आलू संकट से सरोकार नहीं है. प्याज वगैरह दूसरी चीजों का रोना रो रहे हैं.

मौसम की बेरुखी के कारण बाजार में प्याज के बाद अब आलू भी महंगाई के रंग में पूरी तरह से रंग गया है. रिटेल बाजार में आलू की कीमत तीस से चालीस रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. पिछले साल नए आलू की कीमत एक हजार रुपये प्रति बोरी (करीब पचास किलो) थी, जबकि इस बार भाव 1400 रुपये प्रति बोरी पर शुरुआत हुई थी. मंडी में ज्यों ज्यों नए आलू की आमद बढ़ रही है, कीमतों में नर्मी का रुख आएगा. फिलहाल आमद काफी कम हो रही है. फसल में देरी के कारण दस से पंद्रह दिन का गैप बन गया और पुराने आलू की मांग बनी रही. पुराने माल का स्टॉक कम होने के कारण कीमतें लगातार बढ़ती चली गईं और रिटेल में आलू चालीस रुपये पर पहुंच गया.पंजाब में नए आलू की आपूर्ति होशियारपुर और ऊना क्षेत्रों से शुरू हो गई है, जबकि स्टोर का माल उत्तर प्रदेश से आ रहा है. सूबे के अधिकतर कोल्ड स्टोरों में आलू का स्टॉक खत्म हो गया है. मंडी में पुराने आलू का होलसेल दाम 13 से 18 रुपये प्रति किलो और नए का दाम 22 से 24 रुपये प्रति किलो के बीच है. सब्जी कारोबारियों का कहना है कि आने वाले दस दिन पर नई फसल की आमद तेज होते ही कीमतों में गिरावट का रुख बन सकता है.

बंगाल में जाहिर है कि आलू के बिना रसोई असंभव है.सब्जियां अस्सी पार हो तो क्या,बंगाली माछ बात के अलावा खाते क्या हैं, कोई चर्चा कहीं नहीं होती.गुजरातियों और राजस्थानियों की तरह हजारों शाकाहारी व्यंजन बंगाल में होते नही हैं. दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ, बुरबक गायपट्टी का नारा है. बंगाल में माछ भात या फिर मांस भात. जो बिना आलू हो तो हाहाकार. बाकी पूर्वी राज्यों और पूर्वोत्तर में भी लोग इसीतरह आलूबाज हैं.

बहरहाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आलू युद्ध की घोषणा कर दी है और स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी कीमत पर बंगाल से उत्पादित आलू को बाहर राज्यों में भेजने की इजाजत नहीं है. राज्य के आलू को यराज्यवासियों को ही बेचना होग.पहले राज्य,फिर बाकी देश. सबसे पहले राज्य की मांग पूरी करनी होगी, उसके बाद बाहर के राज्यों के बारे में सोचा जायेगा. मुश्किल यह है कि आलू राज्य में है, बाहर भी नहीं जा रहा है, जनपदों से हाहाकार की कहीं कोई गूंज अभी सुनायी नहीं पड़ रहा है. लेकिन दो महानगरों कोलकाता और हावड़ा से आलू रातोंरात ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग.

लेकिन बंगाल के आलू संकट और बंगालियों के वजूद के लिए उत्पन्न अभूतपूर्व संकट की शायद पड़ोसियों को कोई खबर है ही नहीं और आलू की मांग करते हुए असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई व ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को फोन कर दिया, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनकी मांगों को भी ठुकरा दिया. राज्यवासियों का बड़ा उपकार हो गया. गौरतलब है कि बंगाल में प्रत्येक वर्ष 110-120 लाख टन आलू का उत्पादन होता है, जबकि यहां की खपत मात्र 60 लाख टन आलू है. इसलिए बाकी आलू को राज्य के बाहर भी भेजा जाता है. आलू के लिए पूर्वी भारत के कई राज्य बंगाली आलू पर ही निर्भर हैं, लेकिन बंगाल से वहां आलू नहीं भेजने पर वहां भी आलू के लिए हाहाकार मच गया है.

बंगाल के कारोबारी पहले तो उद्योग और कारोबार की बदहाली का रोना रो रहे थे. माफिया शिकंजे में फंसे व्यवसायी अब भी त्राहि त्राहि कर रहे हैं. दीदी के परिवर्तन राज में अभी आस्था उनकी हालांकि अटूट है. लेकिन आलूबाज राज्य सरकार के फैसले व्यवसायी काफी नाखुश बताये जाते हैं. उनका कहना है कि राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज को मिलाकर यहां अभी भी करीब 16 लाख टन आलू है और राज्य में प्रत्येक महीने पांच लाख मेट्रिक टन आलू की खपत होती है.यानी व्यवसायियों की मान लें तो आलू संकट है ही नहीं.

फिर भी मुख्यमंत्री ने 30 नवंबर तक सभी कोल्ड स्टोरेज खाली करने का भी निर्देश दिया है. अब अगर यहां से महीने भर आलू निकाला भी गया, तो अधिकतम पांच से छह लाख टन आलू की खपत यहां हो पायेगी और बाकी 10 लाख टन आलू का क्या होगा, यह व्यवसायी समझ नहीं पा रहे हैं. राज्य सरकार ने आलू दूसरे राज्यों में भेजने पर रोक लगा दी है, तो ऐसी हालत में आलू को नष्ट करने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचेगा, इसलिए उन्होंने राज्य सरकार से अपने पहले फैंसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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