अपनी-अपनी राह से..

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-आलोक पुराणिक||

उफ्फ, आलू भी प्याज की राह पर निकल चला है, महंगा हुआ जा रहा है.

गोया महंगाई की राह होती हो कोई, उस राह पर सब्जियों की फार्मूला-टू रेस होती हो कोई, कोई नेता उस रेस को हरी झंडी दिखाता हो. आलू कई इलाकों में चालीस रुपये किलो के आसपास है, प्याज गिरकर भी कई इलाकों में सत्तर के आसपास है, प्याज की इस हालत को कुछ नेता स्थिति में सुधार कहते हैं. जैसे मुहल्ले में कोई राहजन पचास के बजाय सिर्फ पैंतालीस राहजनों को लूटे और उसे सुधरा राहजन कहा जाये.Onion-potato-price-up-expensive

आलू प्याज की राह पर जा रहा है. प्याज गिरकर भी सोने की राह पर जाता लगता है.

अपनी-अपनी राह चलो सब. किसी दूसरे की राह को फालो ना करो.

हे आलू, तुम लोकल जमाखोरों के हाथों में जाकर महंगे हो जाओ, लोकल स्तर पर.

प्लीज, ऐसा ना करो आलू कि प्याज की तरह महंगाई के ग्लोबल एंगल जोड़ लो अपनी चाल में. प्याज की महंगाई की राह में नेशनल नेता हरी झंडी दिखाते हैं, प्याज के इंटरनेशनल एक्सपोर्टर प्याज की महंगाई को चीयर करते हैं ,तब जाकर आती ही प्याज में इतनी महंगाई.

आलू की महंगाई की राह कतई लोकल है, लोकल जमाखोर, लोकल नेता ही मिलजुलकर भाव बढ़ाते हैं, सो प्याज की हैसियत के भाव तो ना हो पाते.

आलू लोकल चोट्टे की तरह का बरताव करता है, प्याज कतई ग्लोबल स्मगलर सा हो रखा है. लोकल चोट्टा ग्लोबल स्मगलर होने लगे, तो क्या होगा, हाय, हाय, कितना तो खून-खराबा होगा. लघु स्तरीय चेन-स्नैचर चेन-स्नैचरी की राह चले.

चेन-स्नैचर अगर डकैत होने की ख्वाब पालेगा, तो क्या होगा, कैसे होगा. सारे डकैत अगर एक झटके में नेता स्तर की लूट मचाने लगेंगे, तो पब्लिक का क्या होगा. हर स्तर का चोट्टा नेता स्तर की महत्वाकांक्षाएं पालने लगेगा, तो पब्लिक क्या करेगी, कितने डकैतों को झेल पायेगी. ना भाई, ना, चेन-स्नैचर, तू अपनी लघु-स्तरीय राह चल, डकैत तू मंझोले स्तर की आकांक्षाएं पाल कुछ चुनिंदा को ही नेतागिरी की तरफ जाने दे.

आइये हम सब मिलकर यही प्रार्थना करें कि आलू अपने स्तर से पब्लिक को जेब काटे, प्याज की तरह ग्लोबल स्मगलर ना बने.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “अपनी-अपनी राह से..

  1. कहीं इसमें आर एस एस का हाथ तो नहीं?विरोधयों की भी साजिश हो सकती है.कभी प्याज कभी टमाटर और कभी आलू , सरकार को डुबाने के लिए सर पर आ खड़े हो जाते हैं,तेल गेस क़ी कीमत में बढ़ोतरी से न डरने वाली सरकार कुछ दिन ही इस से डर रही है, बाद में यह भय भी निकल जायेगा.

  2. कहीं इसमें आर एस एस का हाथ तो नहीं?विरोधयों की भी साजिश हो सकती है.कभी प्याज कभी टमाटर और कभी आलू , सरकार को डुबाने के लिए सर पर आ खड़े हो जाते हैं,तेल गेस क़ी कीमत में बढ़ोतरी से न डरने वाली सरकार कुछ दिन ही इस से डर रही है, बाद में यह भय भी निकल जायेगा.

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