प्रभु! फेंकू या पप्पू की पार्टी का टिकट दिलवा दो..

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-अशोक मिश्र||

गुनहगार हनुमान जी की प्रतिमा के आगे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे, ‘हे भगवान! बस एक बार..सिर्फ एक बार किसी पार्टी से अपना टांका भिड़वा दो. मुझे कोई भी पार्टी लोकसभा चुनाव के लिए टिकट दे दे, बस… इतनी कृपा कर दो, अंजनी सुत. वैसे आपको तो सब मालूम ही है, आपसे इस चराचर जगत में क्या छिपा हुआ है. राष्ट्रीय लात-घूंसा पार्टी वाले अपना टिकट देने को तैयार हैं. लेकिन भगवन! इस पार्टी का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शब्द का अर्थ किसी मोहल्ले-टोले से बड़ा नहीं है. कहने को तो लात-घूंसा पार्टी राष्ट्रीय है, लेकिन उसका जनाधार सिर्फ एक मोहल्ले तक ही सिमटा हुआ है. ऐसी पार्टी का क्या राष्ट्रीय होना और क्या अंतरराष्ट्रीय होना, सब समान है.politician

आदरणीय पवन सुत जी! एक बात बताऊं. कामरेडों वाली एक पार्टी मेरे संपर्क में है. उसके पोलित ब्यूरो के एक सदस्य कल मुझे बता रहे थे कि अगर मैं थोड़ा सा प्रयास करूं, तो बात बन सकती है. प्रभु! इनके टिकट से चुनाव लड़ने पर एक ही दिक्कत है कि खुदा न खास्ता अगर चुनाव जीत भी गया, तो खाने-कमाने का मौका मिलेगा ही नहीं. विपक्ष में बैठकर बस कभी-कभार हल्ला गुल्ला मचाने का मौका भर मिलेगाा. अब भगवन! आप तो जानते ही हैं कि कोई भला दस-पांच करोड़ खर्च करके अगर चुनाव जीतेगा, तो संसद में बैठकर भजन-कीर्तन करने की इच्छा पालेगा नहीं. वह तो यही चाहेगा कि जहां पांच-दस करोड़ खर्च किए हैं, तो वहां हजार-पांच सौ करोड़ कमाने का जुगाड़ बने. चलिए, कामरेडों के टिकट पर चुनाव लड़ लिया, तो पार्टी किसी तरह की मदद करने से रही. जिसके घर में भूजी भांग नहीं होगी, वह दूसरों की क्या मदद करेगा. उल्टे पार्टी फंड के नाम पर शरीर पर जो कपड़ा-लत्ता होगा, वह भी उतार ले जाएंगे.’

इतना कहकर गुनाहगार सांस लेने के लिए रुके और फिर बोले, ‘किसी तरह पप्पू या फेंकू की पार्टी का टिकट दिला दो, तो मजा आ जाए. भगवन! मैं यह कतई नहीं कहता कि मेरा जीवन बेदाग रहा है. जहां देश के नेता और साधु-संतहत्या, बलात्कार, सरकारी और गैर सरकारी जमीनों पर कब्जा करने के बाद भी साफ सुथरे और चरित्रवान बने रहते हों, जनता के विकास के नाम पर बनने वाली परियोजनाओं का सारा पैसा डकारने के बाद भी सीना ठोककर दूसरों को ईमानदारी, कर्त्तव्य पारायणता और राष्ट्रहित में कार्य करने की नसीहत देते हों, तो उनके मुकाबले में मेरा अपराध बहुत तुच्छ है. केशरीनंदन! मैं मानता हूं, मैंने जिंदगी भर पाकेटमारी की है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि गलती से किसी गरीब के पाकेट पर अपना ब्लेड चल गया है, तो मैंने वह पैसा अपने पर कभी खर्च नहीं किया. उसमें अपने मेहनत से कमाई गई रकम में से कुछ पैसा मिलाकर किसी असहाय, जरूरतमंद की मदद की है. भगवान! मैं यह सब कुछ बताकर अपने को अच्छा बताने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि यह जताने की कोशिश कर रहा हूं कि आज की राजनीति में कितनी गंदगी आ गई है.’

गुनाहगार ने चुपके से अपनी दोनों आंखें खोलकर इधर उधर देखा और फिर बोले, ‘वैसे तो पप्पू की पार्टी न दूध की धुली है, न फेंकू की. दोनों एक तरफ एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. अपने को जनता के रहनुमा कहने वाले कामरेडों का चरित्र भी कमोबेश पप्पू-फेंकू जैसा ही है. दरअसल, इनकी पार्टी के झंडे, नारे और नेता भले ही अलग-अलग हों, लेकिन सभी इस लूट-खसोट की व्यवस्था के संचालक बनने की होड़ में हैं. गरीब जनता के सामने एक ओर नाग नाथ हैं, तो दूसरी ओर सांप नाथ. जनता के सामने लोकतंत्र नाम का एक झुनझुना टंगा हुआ है जिसको हर पांच साल बाद बजाया जाता है. इस झुनझुने की लय और ताल पर बेचारी गरीब जनता नाचने को मजबूर हैं. भगवन! पिछले साढ़े दशक से लोकतंत्र में जब भ्रष्टाचार की गंगोत्री बह रही है, तो मैं भी सोचता हूं कि बुढ़ापे में एक बार डुबकी मैं भी लगा ही लूं. एक बार की डुबकी से मेरा बुढ़ापा तो सुधर ही जाएगा, दो-चार पीढ़ियों का भी काम आसानी से चलता रहेगा. आपको बस अपने इस अनन्य भक्त की इतनी मदद करनी होगी कि पप्पू या फेंकू की पार्टी के कर्ता-धर्ताओं की मति फेर दो और वे मुझे अपना उम्मीदवार बना लें. इसके बाद भी आपका काम खत्म नहीं होगा, भगवन! जिस लोकसभा सीट से मैं उम्मीदवार होऊंगा, उस क्षेत्र की जनता की मति फेरने क्या दूसरे ग्रह का कोई भगवान आएंगे? मैंने तो आपके ही भरोसे पर न जाने कितनी तरह की कल्पनाएं कर रखी हैं. सांसद बन गया, तो यह करूंगा. सांसद बन गया, तो वह करूंगा.

सब कुछ खाक में मत मिला देना, प्रभु!’ तभी हनुमान जी के गले में पड़ी माला का एक फूल पता नहीं कैसे, गुनाहगार के सिर पर आकर गिरा, तो गुनाहगार खुशी से उछल पड़े. उन्होंने ‘राम भक्त हनुमान की जय’ का जयकारा लगाया और उस फूल को बड़ी श्रद्धा से उठाकर जेब में रख लिया. वे समझ गए कि उन्हें अगले लोकसभा चुनाव में सत्ता पर काबिज होने वाली पार्टी से टिकट मिलने का आश्वासन भक्तवत्सल हनुमान जी ने दिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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