चुनावों से पहले कांग्रेस की फूट आई चौड़े धारे…

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पचपदरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक को टिकट का सामूहिक विरोध…

-चन्दन सिंह भाटी||

– करीब 20 वर्षो बाद पचपदरा विधानसभा की सीट कांग्रेस के खाते में आई थी, तब पूरे कांग्रेस कार्यकर्ता बड़े उत्साहित थे, लेकिन ये खुशी इस बार बगावत में तब्दील हो गई है. चुनावी बिगुल बजने के साथ ही कांग्रेस में विधायक विरोधी स्वर मुखरित होने लगे है, तो वही भाजपा में एकजुट होने के संकेत मिल रहे है.MADANP~1

राजस्थान में नमकनगरी के नाम से पहचाने जाने वाला पचपदरा विधानसभा क्षेत्र यूं तो भाजपा का अभेद गढ़ माना जाता रहा है लेकिन विगत चुनावों में कांग्रेस ने इस विधानसभा क्षेत्र में पूरी ताकत झोंक दी, तो भाजपा की अंतरकलह ने कांग्रेस प्रत्याशी की जीत की राह को आसान बना दिया. इस विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के कद्दावर माने जाने वाले नेता व पूर्व मंत्री अमराराम चौधरी लगातार तीन बार जीतकर विधानसभा में जा चुके है, लेकिन विगत चुनाव में यहां से अमराराम चौधरी रनर-अप रहे.

वर्तमान कांग्रेस विधायक मदन प्रजापत और भाजपा के अमराराम चौधरी के बीच जीत का अंतर करीब 12 हजार मतों का रहा था, जिसमें करीब 65 प्रतिशत मतदान हुआ था. कलबी चौधरी और अनुसूचित जाति-जनजाति वोट बाहुल्य इस विधानसभा क्षेत्र में करीब 1 लाख 70 हजार मतदाता है. यहां पर कलब चौधरियों के 30 हजार व अनुसूचित जाति-जनजाति के भी 30 हजार निर्णायक मतदाता है. इसके अलावा पचपदरा विधानसभा क्षेत्र में मुख्य रूप से जाट समुदाय के 14 हजार, पुरोहित समुदाय के 12 हजार, प्रजापत समुदाय के 10 हजार, माली समाज समुदाय के 15 हजार, रावणा राजपूत समुदाय के 5 हजार, राजपूत समुदाय के 10 हजार, जैन समुदाय के 8 हजार, अग्रवाल समुदाय के 3 हजार, घांची समुदाय के 3 हजार, मुस्लिम व देवासी समाज के 5 हजार, माहेश्वरी समुदाय के 1500 मतदाता हैं. शेष में सभी वर्गों के मतदाता हैं.

यहां से भाजपा व कांग्रेस दोनों पार्टियों के चुनावी घोषणा-पत्र में मीठा पानी लाना और विधानसभा के बालोतरा उपखंड को जिला बनाने के मुद्दे शामिल थे. दोनों ही मुद्दो में आशातीत प्रगति नहीं हुई है जिस कारण इन मुद्दों के फिर से आगामी चुनावों में छाये रहने की संभावना है.

यहां से कांग्रेस रिफाइनरी, जिला परिवहन कार्यालय, नगर पालिका के नगर परिषद में क्रमोन्नत करने की उपलब्धियों के साथ चुनाव में उतरेगी तो भाजपा पेयजल योजनाओं के पूरा नहीं होने सहित जमीन घोटाले, भ्रष्टाचार, बिजली, शिक्षा व सडक़ के मुद्दो पर उतर सकती है.

संभावित उम्मीदवारों की बात करें तो दोनों ही खेमों में लंबी सूची है. कांग्रेस से वर्तमान विधायक मदन प्रजापत सहित कद्दावर कांग्रेस नेत्री व महिला कांग्रेस की प्रदेश संयुक्त सचिव शारदा चौधरी, पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष अब्दुल रहमान मोयला, ईमानदार व स्वच्छ छवि के नेता माजीवाला ग्राम पंचायत के सरपंच कुंपाराम पंवार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पार्षद नरसिंग प्रजापत, उद्यमी राजू बोहरा जसोल आदि संभावित उम्मीदवार की सूची में शामिल है. वही दूसरी ओर भाजपा में पूर्व मंत्री अमराराम चौधरी, पूर्व नगर पालिका अध्यक्षा प्रभा सिंघवी, भाजपा सांस्कृतिक प्रकोष्ठ प्रदेश प्रभारी प्रकाश माली संभावित उम्मीदवार है.

विगत चुनावों में भाजपा में मची अंतरकलह और निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनावी समीकरण उलझा कर गड़बड़ा दिए थे, जिसके चलते चौंकाने वाला परिणाम सामने आया था. इस बार कांग्रेस में बगावत के सुर तेज हो गए है, जिसके चलते कांग्रेस को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता भी इस बार विधायक मदन प्रजापत पर जमीन घोटालों के आरोप लगाते हुए व आम जनता के साथ किए गए वादों को पूरा नही करने व जमीन से जुड़े कांग्रेसी नेताओं की अनदेखी का आरोप लगाते हुए इस बार दूसरे प्रत्याशी को टिकट देने की मांग कर रहे है.

चंद दिनो पहले बालोतरा पहुंचे कांग्रेस पर्यवेक्षक के सामने इन कद्दावर कांग्रेस नेत्री व महिला कांग्रेस की प्रदेश संयुक्त सचिव शारदा चौधरी, पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष अब्दुल रहमान मोयला, माजीवाला ग्राम पंचायत के सरपंच कुंपाराम पंवार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पार्षद नरसिंग प्रजापत, उद्यमी राजू बोहरा ने अपना शक्तिप्रदर्शन कर विधायक की पोल खोली थी. इस दौरान इन नेताओं के समर्थन में बड़ी संख्या में समर्थक भी मौजूद थे. विधायक मदन प्रजापत ने भी अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की थी परंतु डाक बंगले में इतनी भीड़ नही थी.

बहरहाल, चुनावों के मद्देनजर क्षेत्र में इन दिनों बन रहे राजनितिक माहौल को देखकर ऐसा लगने लगा है कि पिछले विधानसभा चुनावों में जहां बीजेपी को बगावत ले डूबी थी, वहीं इस बार सत्तासीन कांग्रेस में बगावत के सुर तेज हो चुके हैं. ऐसे में आगामी चुनावों और क्षेत्र में बन रहे राजनितिक माहौल को ध्यान में रखते हुए फिलहाल यह कह पाना मुश्किल है कि ऊंट कौनसी करवट बैठेगा. ऐसे में अब ये देखना काफी दिलचस्प हो गया है कि आगामी चुनावों में दोनों पार्टियों के द्वारा उम्मीदवार को लेकर क्या फैसला किया जाएगा और इन उम्मीदवारों में से कौन बाजी मार पाएगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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