कोई टैप कर रहा है आपकी बातचीत, सावधान…

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हर लीक, हर खुलासा और हर भंडाफोड़ कारपोरेट हित में और उनका निपटारा भी कारपोरेट हितों के मुताबिक…

‘‘टाटा टेलीकाम को ही हर साल टेलीफोन सुनने के लिये 10 से 15 हजार अनुरोध मिलते हैं. सभी टेलीकाम कंपनियों को हर साल इस तरह के 60 से 70 हजार अनुरोध मिलते ही होंगे.’’

-पलाश विश्वास||

सिर्फ राष्ट्रनेताओं की नहीं, किसी भी देश में किसी भी नागरिक की बातचीत टैप हो रही है.अमेरिकी सरकार की सर्वशक्तिमान प्रिज्म खुफिया प्रणाली है और गाइडेड मिसाइलों से लैस ड्रोन हमारे आसमान में दिनरात हमारी निगरानी कर रहा है.तो भारत सरकार और उसकी एजंसियां नागरिकों की गोपनीयता और निजता के अधिकार को चूना लगाते हुए न केवल बायोमोट्रिक डिजिटल खुपिया बंदोबस्त के तहत टेलीकाम और सोशल नेटवर्किंग के मार्फत हर नागरिक की खुफिया निगरानी कर रही हैं.कारपोरेट कंपनियां भी एक दूसरे की निगरानी और जासूसी में लगी हैं. जो तथ्य आते हैं वे कारपोरेटहितों के मुताबिक ही.सभी मामलों का निपटान भी कारपोरेट सिद्ध.’NSA

न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष रतन टाटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने यह सनसनीखेज खुलासा करते हुये कहा कि टाटा टेलीकम्युनिकेशंस को भी टेलीफोन की बातचीत सुनने के लिये हर साल सरकारी प्राधिकारियों से 10 से 15 हजार अनुरोध मिलते हैं. उन्होंने टैप की गयी बातचीत लीक करने वालों का पता नहीं लगाने पर केन्द्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाया.

साल्वे ने कहा, ‘‘टाटा टेलीकाम को ही हर साल टेलीफोन सुनने के लिये 10 से 15 हजार अनुरोध मिलते हैं. सभी टेलीकाम कंपनियों को हर साल इस तरह के 60 से 70 हजार अनुरोध मिलते ही होंगे.’’

उन्होंने कहा कि टेलीफोन टैप करने का यह आदेश दूसरी वजहों से दिया गया था. यदि कापरेरेट जगत में लड़ाई नहीं चल रही होती तो यह सार्वजनिक दायर में नहीं आता. उन्होंने कहा कि उन्हें इसमें कोई संदेह नहीं है कि कापरेरेट प्रतिद्वन्द्विता के कारण ही सबसे पहले लीक हुआ था. इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले में आय कर विभाग की पहल पर टेलीफोन टैप किये गये थे और उसी समय कुछ सेवा प्रदाता ने लाइसेंस से वंचित होने के जोखिम पर यह किया था.

साल्वे ने कहा कि टैप की गयी बातचीत के विश्लेषण करके काम की सूचना का पता लगाने और निजी स्वरूप के अंशों को नष्ट करने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है. उन्होंने जांच एजेन्सी पर भी सवाल उठाया और कहा कि उसने मीडिया का इस्तेमाल किया जो बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति है.

उन्होंने कहा, ‘‘हमें नहीं मालूम की यह (राडिया टैप) क्यों और किसे शर्मसार करने के लिये लीक किये गये.’’ साल्वे ने कहा कि सरकार को टैप की गयी बातचीत में से काम के अंश अपने पास रखने चाहिए और शेष अंश नष्ट कर देने चाहिए. टैप की गयी समूची बातचीत रखने की इजाजत नहीं है. लोगों के निजता के अधिकार की रक्षा करनी होगी.

उन्होंने कहा कि टैपिंग की समीक्षा करने वाली समिति पर काम का दबाव है और उसके लिये सुने गये सभी टेलीफोनों की समूची प्रक्रिया पर गौर करना संबंध नहीं है. साल्वे ने कहा, ‘‘इस तरह के अनेक मामले सामने नहीं आये हैं. कौन है जो इन सभी मामलों को देख रहा है. क्या हम सरकार के लिये अनुपायोगी बातचीत को नष्ट नहीं करके किसी और वक्त पर इसे ‘डायनामाइट’ (सूचना की खान) के रूप में इस्तेमाल की अनुमति देने जा रहे हैं.’’

उन्होंने कहा कि इस लीक की केन्द्र द्वारा करायी गयी जांच पूरी तरह सतही है और इस मामले में उसके हलफनामे में भी एकरूपता नहीं है. साल्वे ने इस बातचीत को सार्वजनिक नहीं करने की दलील देते हुये कहा, ‘‘सरकार ने अपने हाथ खड़े कर लिये हैं. मीडिया और याचिकाकर्ता से परे नहीं हैं. आरटीआई है और सरकार को यह फैसला करना है कि टैप की गयी बातचीत को सार्वजनिक करना है या नहीं. हमारे पास तो अब पारदर्शिता के लिये आरटीआई की व्यवस्था है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘सार्वजनिक मसलो की जांच का मीडिया को अधिकार है और कानून को एक सीमा तक उन्हें भी संरक्षण देना होगा. लेकिन महज संदेह के आधार पर सचूना का प्रकाशन नहीं किया जा सकता. मीडिया को इसे प्रकाशित करने से पहले गपशप की सत्यता का पता लगाने के लिये और आगे की जांच करलेनी चाहिए’’ साल्वे ने कहा कि अदालतों में पेश दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं कहा जा सकता है.

उन्होंने कहा, ‘‘मैं एक पत्रिका के इस दावे को चुनौती दे रहा हूं कि यदि कोई दस्तावेज शीर्ष अदालत में पेश कर दिया गया है तो वह सार्वजनिक है और उसे प्रकाशित करने का अधिकार है.

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने नीरा राडिया के टेलीफोन टैपिंग से मिली जानकारी के आधार पर आठ नये प्रारंभिक जांच (पीई) प्रकरण दर्ज किए हैं. इनमें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) और अन्य मामले शामिल हैं.

सूत्रों ने यहां बताया कि एक पीई झारखंड के सिंहभूम जिले के अंकुला में लौह अयस्क खान टाटा स्टील को आवंटित करने में कथित अनियमितताओं पर गौर करने के लिए शुरू की गयी है. भ्रष्टाचार के एक मामले में जमानत पर चल रहे कोड़ा और झारखंड के अज्ञात अधिकारियों को इसमें आरोपी के रूप में नामजद किया गया है. टाटा स्टील ने कहा कि इस पर प्रतिक्रिया देना अभी जल्दबाजी होगी.

सूत्रों ने बताया कि दूसरी पीई आरआईएल का तत्कालीन हाइड्राइकार्बन महानिदेशक वीके सिब्बल द्वारा कथित रूप से पक्ष लेने और परस्पर अवैध लाभ पहुंचाने को लेकर सिब्बल, आरआईएल और अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गयी है. सिब्बल ने उनसे प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजे गए संदेश का जवाब नहीं दिया. आरआईएल प्रवक्ता ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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