यमराज से ऊपर…

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-आलोक पुराणिक||

अब से करीब एक हजार साल बाद हम सब तो ना बचेंगे, पर अब टीवी पर चल रहे सीरियलों के रिकार्ड-सीडी वगैरह तो बचेंगी ही. उनके आधार पर एक हजार साल बाद यानी सन् 3013 में अब के भारतीय समाज का खाका यूं खींचा जायेगा.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

प्राचीन कालीन भारत में यानी एक हजार साल पहले भारत में परिवार कई प्रकार होते थे. घर की गृहिणी को कई परिवारों की चिंता करनी होती थी. एक तो अपना परिवार, दूसरा पड़ोसी का परिवार और तीसरा विरमानी परिवार, अम्माजी का परिवार, जग्या, दादी-सा का परिवार, जिनकी व्यथाएं-कथाएं नियमित तौर पर भारतीय गृहिणियां डिस्कस किया करती थीं. जग्या तीसरी शादी करके फंस गया, इस विषय पर गहन चिंतन चला करता था. और राम कपूर और साक्षी तंवर के परिवार पर विकट बाधा आ रखी हैं, ऐसी चिंताएं तत्कालीन भारतीय गृहिणियां बहुतै जबरदस्त तरीके से करती थीं. सबसे ज्यादा आंसू टीवी सीरियलों के परिवार पर बहाये जाते थे. फिर पास-पड़ोस की ये चिंताएं की जाती थीं कि आजकल गुप्ता के यहां बहुत मेहमान आने लगे हैं, पठ्ठा कर क्या रहा है इन दिनों. उस वाले पड़ोस में 87 इंच का टीवी आया है, हाय लोग कितने रिश्वतखोर हो गये हैं. इतनी चिंताओं के बाद जो चिंता का स्कोप बचता था, उसमें अपने निजी परिवार की भी चिंता की जाती थी.

तत्कालीन तमाम सीरियलों को देखकर साफ होता है कि भारतीय समाज में मुख्यत तीन गतिविधियां ही होती थीं-एक शादी की तैयारी, दूसरी शादी में तोड़-फोड़ का षडयंत्र, तीसरी गतिविधि यह कि शादी के बाद दोबारा किसी संबंध में फंसना और तब तक फंसे रहना, जब तक उसमें भी शादी की स्थितियां ना बना ली जायें.

सीरियल शादी से शुरु होते थे, पर शादियां कभी खत्म ना होती थीं. शादियों का हाल ये था कि औसत बंदा शादियों के लिए प्रतिबद्ध ही नहीं तत्पर रहता था. पढ़े-लिखों में भी एक से अधिक शादियों का चलन था. जैसा कि प्रख्यात सीरियल बालिका वधू से पता चलता है कि इस सीरियल का पढ़ा-लिखा डाक्टर जग्या तीन शादियों में हाथ आजमाता है. इससे यह भी पता लगता है कि उस जमाने में सरकारी खजाने की बहुत बरबादी होती थी. सरकार डाक्टर बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च करती थी पर डाक्टर बनकर भी जग्या क्या करता है-शादी, फिर शादी और इसके बाद भी शादी. कुल मिलाकर समाज शादीमय था.

उस जमाने के धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से साफ होता है कि यमराज को मौत की अंतिम अथारिटी माना जाता था. पर सीरियलों को देखकर यह पता लगाया जा सकता है कि मौत के मामले में यमराज से भी ऊपर की अथारिटी सीरियल निर्माता या सीरियल निर्मात्री होते थे. अब जैसे मिहिर की मौत हो गयी हो, पर एकता कपूर चाहे तो उसे दोबारा जीवित कर सकती थी.

यमराज एकता कपूर के आगे हाथ जोड़कर कहते थे-आप सुपर यमराज हैं, जिसे चाहें कोमा से वापस ले आयें. जिसे चाहें बचपन से एक हफ्ते में बुढ़ापे में पहुंचाकर मार दें. जब चाहे बूढ़े की उम्र को रिवर्स गीयर में लाकर हाथ में झुनझुना पकड़ा दें. जीवन-मौत के मामले सिर्फ यमराज के हाथ में नहीं होते थे, एकता कपूर के हाथ में भी होते थे. एकता कपूर इस मामलों में सुपर यमराज थीं.

लोग कहा करते थे कि यमराज अगर किसी सीरियल में काम कर रहे होते, तो अपनी मौत की तारीख भी पूछने के लिए उन्हे एकता कपूर के पास जाना पड़ता, इस निवेदन के साथ कि प्लीज दोबारा जिंदा मत कर देना.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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