रैलियों और थैलियों में फंसा लोकतंत्र…

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-आशीष वशिष्ठ||
भारतीय लोकतंत्र रैलियों और थैलियों के बीच फंसा है. चुनाव के समय ये प्रवृत्ति अपने पूरे उफान पर होती है या ये कहा जा सकता है कि इस समय रैलियों और थैलियों के दर्शन सर्वसाधारण को सुलभ प्राप्त हो जाते हैं. असल में राजनैतिक दलों के पास न तो मुद्दे हैं और ना ही उनके कर्म ऐसे हैं कि वो जनता के पास वोट और समर्थन की उम्मीद में सीधे संपर्क कर पाएं. ऐसे में रैलियों की बदौलत भीड़ जुटाकर जनमत को भरमाने और बरगलाने का काम किया जाता है. वहीं पिछले तीन-चार दशकों में लोकतंत्र में पैसे के दम पर वोट खरीदने और मत प्रभावित करने का चलन बढ़ा है. वोट बैंक की राजनीति ने इस कदर लोकतंत्र के सिंद्वातों और परिकल्पना को तोड़ा-मरोड़ा है कि पैसे के दम पर चुनाव जीते जाने लगे हैं. क्षेत्रीय दलों के बढ़ता वर्चस्व वोट बैंक और जात-पात की राजनीति का ही नतीजा है. ऐसे में वोट बैंक को पाले में रखने और मजबूत बनाने की नीयत से राजनैतिक दल लुभावनी योजनाएं चलाने और वर्ग विशेष को लाभ देने के वादे घोषणा पत्र के माध्यम से करते हैं. चुनाव जीत जाने के बाद वोटरों से किये हुये उलूल-जलूल वादों को पूरा करने के लिए सरकारी खजाने को अंधाधुंध तरीके से खर्च किया जाता है.democracy-hands

कांग्रेस के सांसद चौधरी बीरेन्द्र सिंह ने पैसे के बल पर राज्यसभा की सांसदी और सांसदों की अनाप-शनाप कमाई पर बयान देकर भारतीय लोकतंत्र के असली चेहरे को बेनकाब किया था. भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपी नाथ मुंडे ने यह कहकर कि २००९ के लोकसभा चुनाव में उन्होंने आठ करोड़ का खर्चा किया था, एक नयी बहस को तो जन्म दिया ही, वहीँ, चुनाव प्रणाली में व्याप्त दोष और चुनाव लडने के लिए आजमाये जाने वाले हथकंडों की कलई भी खोल कर रख दी.
वास्तविकता किसी से छिपी नहीं है कि धनबल और भारी भरकम रैलियों में भीड़ जुटाकर जनमत को बरगलाने का काम किया जाता है. अगले महीने देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. अगले वर्ष लोकसभा चुनाव भी होने हैं ऐसे में रैलियों को रेला देशभर में देखने को मिल रहा है. लेकिन असली सवाल यह है कि इन रैलियों से देश के आम आदमी को क्या हासिल हो रहा है. राजनैतिक दल रैलियों के माध्यम से अपनी उपलब्ध्यिां गिनाने और पक्ष-विपक्ष पर कीचड़ उछालने के अलावा कुछ खास नहीं कर रहे हैं. हां, ये बात जोड़ना जरूरी है कि वो पांच साल पूर्व किये हुए अपने ही वादों को पुनः करने के वादे के साथ तालियां बटोर रहे हैं. रैलियों का उद्देश्य देश की जनता का ध्यान असल मुद्दों और मसलों से भटकाना होता है. वहीं विरोधियों पर तीखे शब्द बाण चलाकर, इमोशनल किस्सें-कहानियां सुनाकर नेतागण अपना हित साधते हैं. रैली या सभा से आम आदमी का कोई भला नहीं होता उलटा आम आदमी को घंटों जाम जरूर झेलना पड़ता है.

जब भी देश में चुनाव निकट आते हैं, सत्ताधारी पार्टियां मतदाताओं के लिए प्रलोभनों का पिटारा खोल देती हैं. जहां सत्तारूढ़ दलों की सरकारें कर्मचारियों के लिए विभिन्न रियायतों की घोषणा करती हैं, वहीं आम लोगों के लिए टैलीविजन, साडियां, लैपटॉप, मंगलसूत्र, चावल, आटा और यहां तक कि सैनेटरी नैपकिन जैसी चीजें मुफ्त देने की घोषणाएं शुरू कर देती हैं. अब नवम्बर और दिसम्बर में चुनावों का सामना करने जा रही राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम, दिल्ली और मध्यप्रदेश की सरकारों ने भी मतदाताओं को प्रलोभन देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. जहां दिल्ली व मध्यप्रदेश में चुनाव तिथियों की घोषणा व आचार संहिता लागू होने से पूर्व विभिन्न योजनाओं के उद्घाटनों और शिलान्यासों की होड़ लगी रही, वहीं राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने भी पिछले दो वर्षों के दौरान स्कूलों में 8वीं, 10वीं तथा 12वीं कक्षाओं में टॉप करने वाले छात्र-छात्राओं को लैपटॉप दिए जबकि इन कक्षाओं में टॉप टैन में शामिल अन्य छात्र-छात्राओं को पी.सी. टैबलेट खरीदने के लिए 6-6 हजार रुपए के चैक दिए. मंहगाई के इस दौर में एक-एक रैली पर करोड़ों का खर्च आ रहा है. ऐसे में रैलियों में हाईटेक तकनीक का तड़का लगाकर वोटरों को भरमाने का काम नेता हर बार की तरह इस दफा भी कर रहे हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बुंदेलखण्ड के गठन और कल्याण के लिए भारी भरकम घोषणाएं की थी. वहीं, पूर्वांचल के बुनकरों के कल्याण के लिए भी खजाने का मुंह खोल दिया गया था. यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश के युवाओं, किसानों, अल्पसंख्यकों से सैंकड़ों वायदे किये थे. कमोबेश मिलते-जुलते हालात दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, बिहार और देश के दूसरे राज्यों के भी हैं. चुनाव के समय लंबे-चौड़े वायदे कर सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होने वाले राजनैतिक दल सियासी नफे-नुकसान के हिसाब से योजनाओं को चलाते और बनाते हैं. अगर गौर किया जाए तो आजादी के बाद से राजनैतिक दल लगभग घिसी-पिटी घोषणाओं के साथ वोटरों को भरमाने और लालच देने की नीयत से एक दो नयी चीजें जोडकर वोट पाने में कामयाब हो जाते हैं. बड़ा सवाल यह भी है कि जो लोग देश और देशवासियों की बुरी हालत के लिये जिम्मेदार हैं वहीं लोग बड़ी बेशर्मी से जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से भरे सरकारी खजाने के मालिक की हैसियत से घोषणाएं चुनाव के समय करते हैं.
देश की संसद में विभिन्न कार्यक्षेत्र के लोग निर्वाचित होकर पहुंचते हैं. पिछले कुछ वर्षों में राज्यसभा पहुंचने वाले उ्रद्योगपतियों की संख्या अच्छी खासी रही है. सरकारी खजाने और विकास राशि के दम पर विकास का दम भरने वाले इन सांसदों से कोई यह नहीं पूछता कि उन्होंने अभी तक अपने बिजनेस की कमाई से देश और समाज के लिये क्या किया है. चंद ईमानदार प्रयास छोडकर ज्यादातर मामलों में कटोरी का घी थाली में गिरता दिखाई देता है. कारपोरेट और उद्योगपतियों ने संसद पहुंचकर अपने फायदे के लिए नियम कानूनों में परिवर्तन व निर्माण करवाया है. देश में भ्रष्टाचार, मंहगाई और विकास अवरुद्ध होने के पीछे व्यापारी नीयत के सांसदों व प्रतिनिधियों का बड़ा हाथ है. ये कडुवी सच्चाई है, जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता. देश में अशिक्षा, गरीबी और राजनैतिक जागरूकता का अभाव है. ऐसे में कुटिल नेता और सत्तालोलुप राजनैतिक दल जनता को भरमाने में कामयाब हो जाते हैं. खाने-पीने की वस्तुओं, लैपटाप, कंप्यूटर, कपड़ों के अलावा प्रलोभनों की लंबी लिस्ट चुनाव घोषणा पत्र में शामिल है.

चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार 2009 के आम चुनाव में 10,000 करोड़ रुपये का खर्च राजनैतिक दलों ने किया था. एक अनुमान के अनुसार में इसमें एक चौथाई याने 2500 करोड़ रुपये काला धन शामिल था. अगले साल होने वाले आम चुनावों में यह धनराशि दुगने से ज्यादा याने बीस हजार करोड़ से ज्यादा का आंकड़ा छू जाये तो कोई हैरानी नहीं होगी. वोटरों को अपने पाले में लाने और वोट हासिल करने के लिए राजनैतिक दलों ने पेड न्यूज, विज्ञापन, हेलीकाप्टर भाड़े पर लेने, प्रचार सामग्री के प्रकाशन और पार्टी कर्मचारियों के वेतन पर खर्च किया. पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के एक प्रत्याशी ने मात्र एक पेड न्यूज के लिये 25 लाख खर्च किया था. पंजाब में तीन महीने पूर्व हुये पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों ने लाखों रुपये खर्च किये और वोटरों को लुभाने के लिए शराब, बीयर, अफीम, चरस, हेरोइन के घर तक सप्लाई की गई. एक मार्केट रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में पंचायत चुनाव के दौरान कोल्ड ड्रिंकस की बिक्री में अप्रत्याशित तौर पर 25 फीसदी बढ़ोतरी देखने को मिली. कोल्ड ड्रिंक में अप्रत्याशित बिक्री की वजह महिलाओं को लुभाने के लिए राजनैतिक दलों ने घर-घर कोल्ड ड्रिंक की बोतलें बांटी थी. पिछले साल पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मणिपुर, गोवा और कर्नाटक विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने तकरीबरन 48 करोड़ रुपये जब्त किये थे. काले धन के साथ भारी मात्रा में शराब और नशे की सामग्री जिसमें हेरोइन, डोडा, अफीम, स्मैक, नशे की गोलियां व कैप्सुल पकड़े थे. अकेले यूपी में आयोग ने 32.71 करोड़ कालाधन, 2,23,120 लीटर शराब और 6290 नशे की गोलियां जब्त की थी.
चुनावी बेला में बिना सोचे-समझे लागू की जाने वाली सरकारी योजनाओं पर धन बर्बाद करना केंद्र व राज्यों सरकारों का पुराना शगल है जो इन विधानसभा चुनावों में देखने को मिल रहा है. असल में जन कल्याण का कोई कार्य करने की बजाय केंद्र और राज्यों की सरकारें अपने कार्यकाल का अधिकांश समय आपसी उठा-पटक में ही नष्ट कर देती हैं और चुनाव निकट आते ही नींद खुलने पर वोट बटोरने के लिए प्रलोभनों का पिटारा खोल देती हैं. जरूरतमंद और गरीब मतदाता ऐसी चुनावी घोषणाओं तथा ऐसे प्रलोभनों में फंस जाते हैं और राजनीतिक दलों द्वारा वोटों के बदले में दी जाने वाली नकद राशि तथा उपहार आदि यह मानकर स्वीकार कर लेते हैं कि नौ नकद न तेरह उधार अथवा भागते चोर की लंगोटी ही सही. होना तो यह चाहिए कि सरकारें प्राथमिकता तय करें न कि ऊल-जलूल निर्णय लेकर सत्ता प्राप्ति के लिए जनता के धन की बर्बादी करें. लेकिन भारतीय प्रजातंत्र की ये बदकिस्मती है कि वो पूरी तरह से रैलियों और थैलियों के दुष्चक्र में दिनों दिन और बुरी तरह से घिरता जा रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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