जिंदगी कैसी है पहेली हाय के गायक मन्ना डे नहीं रहे…

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जिंदगी कैसी है पहेली हाय जैसे गीतों को अपनी आवाज़ देने वाले बॉलीवुड के मशहूर गायक मन्ना डे का बैंगलोर के अस्पताल में निधन हो गया. मन्ना डे 94 साल के थे और काफी समय से बीमार चल रहे थे.manna-de

दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित मन्ना डे के नाम से लोकप्रिय प्रबोधचंद डे का जन्म एक मई 1919 को कोलकाता में हुआ था. मन्ना डे ने अपनी गायिकी के सफर में कई भारतीय भाषाओं में लगभग 3500 से अधिक गाने गाए. मन्ना डे के आवाज का इस्तेमाल जहां-जहां हुआ कामयाबी की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ. मन्ना डे को संगीत के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए पद्म भूषण और पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया. संगीत में उनकी रूचि अपने चाचा केसी डे की वजह से पैदा हुई.

हालांकि उनके पिता चाहते थे कि वो बड़े होकर वकील बने. लेकिन मन्ना डे ने संगीत को ही चुना. कलकत्ता के स्कॉटिश कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ मन्ना डे ने केसी डे से शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं. कॉलेज में संगीत प्रतियोगिता के दौरान मन्ना डे ने लगातार तीन साल तक ये प्रतियोगिती जीती. आखिर में आयोजकों को ने उन्हें चांदी का तानपुरा देकर कहा कि वो आगे से इसमें हिस्सा नहीं लें.

‘तमन्ना’ (1943) के जरिये हिंदी फिल्मों में मन्ना डे ने अपना सफर शुरू किया और धीरे-धीरे मन्ना डे की पहचान बन गई. किसी कैम्प में शामिल न होने की वजह से बड़ी फिल्मों में उन्हें इक्का-दुक्का गाने के अवसर मिले और बी-सी ग्रेड फिल्मों में वे गाते रहे.

ये रात भीगी-भीगी (श्री 420), कस्मे वादे प्यार वफा सब (उपकार), लागा चुनरी में दाग (दिल ही तो है), जिंदगी कैसी है पहली हाय (आनंद), प्यार हुआ इकरार हुआ (श्री 420), ऐ मेरी जोहरां जबी (वक्त), ऐ मेरे प्यारे वतन (काबुलीवाला), पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई (मेरी सूरत तेरी आँखें), इक चतुर नार करके सिंगार (पड़ोसन), तू प्यार का सागर है (सीमा) जैसे कई सदाबहार गीत मन्ना डे ने गाए हैं. उन्होंने कई फिल्मों में संगीत भी दिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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