नया घर देखने की कला…

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-आलोक पुराणिक||

जिन मौकों पर मुझे बहुत घबराहट होती है, उनमें से एक मौका अकसर तब आता है, जब मुझे किसी के नये मकान में जाना पड़ता है।
किसी का नया मकान देखना एक कला है, साइंस है। या दोनों है।OLYMPUS DIGITAL CAMERA

आम तौर होता यूं है। मैं किसी को नये घर के लिए बधाई देता हूं। वह कहता है-घर देखिये ना। पूरा घर देखिये ना।
बताइए कितनी बेहूदी बात है। अब मैं किसी से कहूं कि आप बहुत सुंदर है, बहुत स्मार्ट हैं, तो क्या वह यह कहता या कहती है –देखिये ना पूरा शरीऱ देखिये।

मैं घर देखना शुरु करता हूं। वो बताता है-देखिये ये ड्राइंग रुम में फाल्स सीलिंग बढ़िया है। फाल्स सीलिंग क्या होती है, यह मुझे आज तक समझ नहीं आया।
पर वो कहता है-बढ़िया है ना।
हां जी क्या बात है वाह वाह-मैं बता देता हूं।

देखिये फ्लोर का मार्बल कैसा है-वो पूछता है।
वो जिस निगाह से मुझे देखता है, उसे देखकर मुझे लगता है कि कम से कम सौ बार वाह-वाह तो मुझे करनी चाहिए। मैं इतनी बार नहीं कर पाता, चार बार वाह-वाह करके थक जाता हूं।

फिर वो बताता है कि ये स्पेशल मार्बल, हर कस्टमर को नहीं मिलता है। वो तो अपना साला है नाम पशुपति मार्बल्स में वाइस प्रेसीडेंट है। उसी की सिफारिश पर मिला है। यह हरेक नहीं मिलता है। दरअसल मार्बल तो बहुत तरह के होते हैं। पर यह मार्बल कुछ खास है। यह सिर्फ उन इलाकों में होता है, जहां पचास सेंटीग्रेड के तापमान के बाद ढाई इंच की बारिश होती है और फिर कम से कम पांच सेंटीग्रेड वाली ठंड पड़ती है। ऐसे तापमान में मार्बल का रंग हल्का दूधिया होकर हल्का गुलाबी होकर हल्का नीला सा होने लगता है……………..वो मार्बल की फिजिक्स और केमिस्ट्री में घुस जाते हैं।
मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
ऐसे में आम तौर पर कहता हूं-वाह, क्या बात है।

अरे बात तो तब समझ में आयेगी, जब आप सुनेंगे-वो मार्बल की फिजिक्स और केमिस्ट्री पूरी सुनाने पर आमादा हैं।
सो सुनिये जब मार्बल हल्का नीला होने लगता है, उसे खोदकर निकाल लेते हैं और फिर पशुपति मार्बल वाले उसे 15 सेंटीग्रेड के तापमान पर रखते हैं……………..वह फिर चालू हैं।

मेरे चेहरे से बोरियत टपकने लगी है। मैं सोच रहा हूं, हाय अगर शाहजहां इस तरह की हरकतों पर उतर आता होगा, तो कितनी परेशानी होती होगी।

मुझे एक बहुत मार्मिक सीन दिखायी पड़ रहा है-
कोई बंदा शाहजहां से मिलने गया।
शाहजहां उसे ताजमहल दिखा रहा हैं-ये वाला मार्बल जो यहां लगा है, इसे मकराना से मंगवाया है। ये सबको नहीं मिलता है, वो तो वहां हमारे फ्रेंड जयसिंह ने अपनी खानों से निकलवाकर स्पेशल हमारे लिए पैक करवाकर भिजवाया। देखिये उस मार्बल का रंग पहले दूधिया होता है, फिर गुलाबी…………..।
हाय हाय शाहजहां ने अगर किसी को पूरा ताजमहल इस स्टाइल में दिखाया होगा, तो अगले का हार्ट तो बोरियत में ही फेल हो गया होगा।

आगरा में ताजमहल के पास एक श्मशान घाट क्यों बना है, यह राज अब समझ में आता है।
बंदा जैसे ही ताजमहल देखकर निकलता होगा, ढप्प होकर टें बोल जाता होगा।

साहब मैं तो सिर्फ उनके ड्राइंग रुम पर ही अटका हुआ था।

सो साहब मेरे साले ने स्पेशल आर्डर से इस मार्बल का जुगाड़ किया…………वो चालू थे।
देखिये ये किचन है माडुलर किचन –वो बता रहे हैं।
माडुलर का मतलब क्या है, मुझे समझ में नही आता। समझने की कोशिश भी नहीं की। अपना दिमाग बहुत लिमिटेड है जी। उसमें ज्यादा आइटम नहीं डालने चाहिए।

देखिये हमारी माडुलर किचन में सब चीजें आटोमेटिक हैं। देखिये जैसे आपको मिर्च निकालनी है, आप यह बटन दबाइए, अपने आप निकल आयेगी। अगर आपको नमक निकालना है, तो आप इस मशीन पर चम्मच के निशान को दो बार दबा दें, नमक अपने आप निकल आयेगा-आटोमेटिक।
मुझे लगा कि आगे ये बतायेंगे कि इस किचन में रोटी बन जाती है-आटोमेटिक।
पेट में अपने आप चली जाती है-आटोमेटिक।
आगे की प्रक्रिया भी अपने आप हो जाती है-आटोमेटिक।

मैं आटोमेटिकबाजी का परम विरोधी हूं।
क्यों, बताता हूं इसलिए आटोमेटिक चक्की का आटा खाने वाले हम जिम और योगा केंद्र में पांच हजार रुपये वजन घटाने वाले पैकेज में खर्च करते हैं, जिसमें वो चक्की पीसने का व्यायाम कराते हैं। चक्की पीसने के पैसे देते हैं हम जी-आटोमेटिक।

खैर साहब, किचन से आगे बढ़े। वो बैडरुम तक पहुंचे।
बैडरुम में वो देख रहे हैं ना नाइट लैंप, वो ईरान से मंगवाया है।
जी वाह वाह वाह-मैं कह रहा हूं।

बेडरुम के दक्षिण कोने में जो वो हंसों का जोड़ा है, वह स्पेशल चीन से मंगाया है, फेंगशुई इनर्जाइज्ड है। फेंगशुई इनर्जाइज्ड।

इंसानी फितरतें हैं साहब, इंसान घर बनवाता है, हंसों का जोड़ा रखवाता है, हंस घर बनवाये, तो किसी इंसान के पास न फटकने न दे।

मैंने फिर कहा,कहा वाह वाह वाह वाह।
पर पता नहीं, क्यों वो थोड़े से खफा लगे।
मुझे लगा कि शायद वाह-वाह में कुछ कमी रह गयी।

मुझसे खिंचे -खिंचे से भी रहने लगे। बात समझ में आयी कि मकान को देखने में चूक हो गयी। कल मैंने यह बात अपने छात्र को बताई, तो उसने कहा-गुरुजी आपके फंडे पुराने हैं। जैसे प्रेम हो चाहे हो या न हो, पर दिखना चाहिए, उसी तरह से किसी के मकान की तारीफ करना चाहें या नहीं, पर तारीफ भरपूर दिखनी चाहिए। वह मुझे ले गया एक नया मकान दिखाने-
वाऊ, बिलकुल वास्तु कंप्यायेंट है-घर में घुसते ही उसने कहा।
मैंने उससे पूछा-तुम वास्तु जानते हो।

वास्तु नहीं जानता, इस मकान के मालिक को जानता हूं कि वह क्या कहने से खुश होगा-उसने बताया।
जी बहुत मेहनत की होगी, आपने ऐसा मकान तलाशने में। आसानी से कहां मिलता ऐसा मकान-मेरे छात्र ने पूछा।

मकान मालिक चौड़ा हो गया और बोला-जी आसानी से कहां मिलता, आसपास के पच्चीस तीस मुहल्ले देख डाले। पहले वहां गया, फिर यहां गया…..मकान मालिक मकान-खोज पराक्रम बताता रहा। मेरा छात्र सुनता रहा।

अच्छा अरे आपका किचन तो बिलकुल फतेहपुरसीकरी में जोधाबाई के किचन की तरह है-मेरे छात्र ने मकान में फतेहपुरसीकरी डाल दी।

आप भी साहब क्या बात है, आपका सेंस और अकबर का सेंस एकदम एक जैसा है। उसने फतेहपुर सीकरी में किचन बिलकुल इसी कोण पर बनायी है और आपने भी। ग्रेट हैं आप। अकबर भी ग्रेट था, पर आप ज्यादा ग्रेट हैं। अकबर के पास तो इतने सारे बंदे थे, उनसे काम करवा लिया होगा। पर आपने अपनी मेहनत से कराया है, वाह क्या बात है। आप ग्रेट हैं जी-मेरे छात्र ने मकान मालिक को अकबर घोषित कर दिया है।

अ हा हा हा हा, वाह क्या बेडरुम है, सर, भाई साहब पता नहीं आपको पता है कि नहीं सिकंदर ने यूनान में अपने हेडक्वार्टर में जो बेडरुम बनाया था, वो ठीक इसी कोण पर था। वाह भाई साहब क्या सेंस पाया है, आपने सेंस आफ सिकंदर। सच में आपका जवाब नहीं। मकान क्या बनवाया है, आपने अकबर सिकंदर की छुट्टी कर दी-मेरा छात्र कह रहा था।

मकान मालिक गदगदायमान था। मिठाईयों की भरमार सामने मेज पर थी। मेरा छात्र धड़ाधड़ खेंचे जा रहा था।

जी आप कुछ नहीं बोल रहे-मकान मालिक मुझसे पूछ रहा है।
जी ये मेरे छात्र हैं, अभी मैं इनकी ट्रेनिंग कर रहा हूं-मेरा छात्र मेरे बारे में बता रहा हैं।

वैसे बताइए कि वह गलत कह रहा है क्या।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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