चुनावी सर्वेक्षण या किसी पार्टी विशेष की हवा बनाने का फंडा…

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-अनुराग मिश्रा||

हाल ही में एक न्यूज चैनल द्वारा किये गयें चुनावी सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृतव में एनडीए सबसे बडे राजनैतिक दल के रूप में उभरेगा. सर्वेक्षण में बताया गया है कि यूपी और बिहार में भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी का जादू चलेगा साथ ही भाजपा के लिए दिल्ली अभी दूर है इसके साथ ही सर्वेक्षण में कहा गया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए का कद घटेगा. सर्वक्षण के मुताबिक इस बार सत्ता की चाबी क्षेत्रीय दलो के हाथ में होगी. यानि साधारण शब्दों में कहा जाये तो इस रिपोर्ट का सार यही है कि इस बार दिल्ली की सत्ता कांग्रेस के हाथों से गयी.desh_ka_mijaz

हालाकि पिछलें दो तीन चुनावों में मीडिया सर्वेक्षणों के इतिहास को देखा जायें जो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है. सबसें पहले बात करते है लोकसभा चुनाव 2009 की.

ये वो दौर था जब भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पूरी भाजपा पार्टी दिल्ली की सत्ता पर आसीन होने के लिए बेताब थी. उस दौरान आने वाले लगभग हर मीडिया सर्वेक्षण में यह बात कही जा रही थी कि काग्रेंस शासित यूपीए का ग्राफ गिर रहा है और सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने की डगर काफी कठिन है. यह बात अलग है कि उस समय कोई भी मीडिया हाउस यह खुलकर नही बोल रहा था कि भाजपा सत्ता में आयेगी पर हर रिपोर्ट का निष्कर्ष लगभग में यही होता था कि भाजपा सत्ता में आ रही है. पर जब लोकसभा चुनाव 2009 के परिणाम आयें तो वह अप्रत्याशित थे. काग्रेंस शासिसत यूपीए दुगनी ताकत के साथ सत्ता में आया.

अब बात करतें है यूपी विधानसभा चुनाव 2012 की. लोकसभा चुनावों के लिहाज से अत्यन्त महत्वपूर्ण इस विधान सभा चुनाव में जो चुनावी सर्वेक्षण परिणाम आ रहे थे उनमें सपा को लीडिंग दल के रूप में तो दिखाया जा रहा था पर साथ यह भी कहा जा रहा था कि यूपी विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम त्रिशंकु होगें किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नही मिलेगा. पर जब परिणाम तो सारे मीडिया सर्वेक्षण धरे के धरे रह गये और सपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आयी. ऐसे तमाम चुनाव परिणाम है जहाँ मीडिया सर्वेक्षण की हर रिपोर्ट झूठी साबित हुयी. ऐसे में बेहद अहम सवाल यह खडा होता है कि आखिर ऐसे चुनावी सर्वेक्षण होते क्यों है ?

वास्तव में ऐसे सर्वेक्षण मीडिया टीआरपी के खेल को बढाने और एक दल विशेष को अनुग्रहित करने का फंडा मात्र है. जहाँ सर्वक्षण रिर्पोट के माध्यम से उस राजनैतिक दल को यह दिखाया जाता है कि हम आपके साथ हैं, साथ ही यह भी अहसास कराया जाता है कि सबसे ज्यादा दर्शक सर्वेक्षण रिपोर्ट को ही देख रहे हैं परिणाम स्वरूप उस राजनैतिक दल से चैनल को अपार धनलाभ प्राप्त होता है.

लोकसभा चुनाव 2014 के लिहाज सें चैनलो के लिए अपार धन वर्षा करनें वाला राजनैतिक दल भाजपा ही है जो अपनें पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में र्वचुअल दुनिया व टेक्नालोजी के प्रभाव पर यकीन करने लगा है. लिहाजा वह हर मीडिया हाउस पर अपने नेता के मार्फत आपार धन वर्षा कर रहा है परिणाम स्वरूप हर मीडिया हाउस मोदी और भाजपा की बढत लोकसभा चुनाव 2014 में दिखा रहा है.

आज यूपी में नरेन्द्र मोदी की पहली विजय शंखनाद रैली है. इस रैली को जितना भाजपा और मोदी सफल नही बनायेंगे उससें ज्यादा मीडिया घराने इसे सफल बनायेंगें. हर चैनल पर मोदी चालीसा का पाठ पूरी तल्लीनता के साथ किया जायेगा.

मोदी को दिखाना मीडिया वालो के लिए इसलिए भी जरूरी है क्योकि वर्चुवल दुनिया में मोदी एक ब्रांड नेम है, जिसके साथ असंख्य संख्या में युवा जुडा हुआ है. पर वास्तविकता के धरातल पर यह संख्या कितनी होगी यह तो लोकसभा चुनाव 2014 ही बतायेगा. वैसे भी चुनाव अनिश्चिताओं को खेल है जहाँ हर पल हवा का रूख बदलता रहता है.

जहाँ तक बात नरेन्द्र मोदी की है तो फिलहाल उनके लिए अभी सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि अभी तो हैं इम्तिहान बाकी कि आप रहबर हैं या राहजन हैं, जम्हूरियत का चिराग हैं या इसी सियासत के एक फन हैं.

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