एक रुका हुआ सा साफ्टवेयर…

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-आलोक पुराणिक||

पूरे विश्व के लिए इंडिया से पेश किये जानेवाले किसी आइटम की इमेज-नाम क्या हो, यह सवाल दरपेश है. इंडिया के रुपये-आधारित बांड पूरे विश्व में जारी हों, तो उनका नाम क्या हो, जापान के ऐसे बांड का नाम समुराई बांड है. ब्राजीलवालों को अपने सांबा डांस पर बहुत फख्र है, सो उनके बांड का नाम सांबा बांड है, आस्ट्रेलियावालों के बांड का नाम कंगारु बांड है, इंडिया के बांड का नाम क्या हो.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

तंदूरी बांड-ना, ये बहुत बदनाम टाइप का नाम हो गया, नैना शर्मा-तंदूर-हत्या कांड के बाद.

ओके, इंडिया की नयी पाजिटिव छवि को भुनाने के लिए नाम रखते हैं-साफ्टवेयर बांड, इंडिया साफ्टवेयर में ताकत है, सो साफ्टवेयर बांड नाम ठीक लगता है. ना, ना, ना, साफ्टवेयर कंपनियां मंदी में हैं, मंदीवाला नाम रखना ठीक शगुन ना है. साफ्टवेयर चल कम रहा है, रुक ज्यादा रहा है. रुका हुआ साफ्टवेयर-ये नाम सटीक और तार्किक हो सकता है. पर रुका हुआ साफ्टवेयर किसी प्रयोगधर्मी फिल्म का नाम लगता है. बात फिल्म की नहीं हो रही है, रुपये-आधारित बांड की हो रही है.

बिल्डर बांड कैसा नाम है, सुनकर बाडी-बिल्डर पहलवान टाइप की इमेज उभरती है, बिल्डर यानी नयी-नयी बिल्डिंगें बनानेवाले बिल्डर, दरअसल ये मुल्क अब बिल्डरों का हो लिया है, भारत-भूमि के दो भाग ही हो सकते हैं, एक जो बिल्डर हासिल कर चुके हैं, दूसरा हिस्सा वह, जो देर-सबेर बिल्डरों के कब्जे में आना है.

नहीं बिल्डर, जमता नहीं है.

ओके, लीडर बांड कैसा रहेगा, लीडर बोले तो पालिटिकल लीडर.

ना, इंडियन लीडरान की जो इमेज है, उसके चलते लीडर बांड फ्लाप हो जायेगा.

ओके, बिजनेस बांड कैसा रहेगा, इंडिया की प्रोग्रेस में बिजनेसमैन लोगों का बहुत योगदान है.

ना बिजनेस पूरे भारत का एक हिस्सा है. एक हिस्से के आधार पर नाम कैसे हो सकता है.

राइट, भारत के बांड का नाम बाबा बांड होना चाहिए, क्योंकि सफल बाबा एक साथ बिल्डर, लीडर और बिजनेसमैन हुए रहते हैं.

पर बाबा पूरी इंडिया कैसे हो सकते हैं.

बाबा पूरा ब्रह्मांड हुए पड़े हैं इंडिया में, यह अलग बात है कि उनमें से कुछ फिलहाल जेल में पड़े हुए हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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