विधायक पेन्शन के विरोध मे वरिष्ठ पत्रकार तथा पत्रकार हमला विरोधी कृति समिति के अध्यक्ष एस.एम. देशमुख और मराठी पत्रकार परिषद के अध्यक्ष किरण नाईक द्वारा दाखिल एक जनहित याचिका पर आदेश देते हुए मुंबई हाईकोर्ट के न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ और न्यायाधीश महेश सोनक की बैंच ने आज महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल को शो कॉज नोटिस जारी किया है और 29 नवंबर तक इस नोटिस का उत्तर देने का आदेश दिया गया है.Bombay-High-Court-Mumbai-1

गौरतलब है कि महाराष्ट्र विधानसभा के अधिवेशन के आखरी दिन महाराष्ट्र के भूतपूर्व विधायकों के पेन्शन में 25 हजार से 40 हजार रुपये की बढोतरी करने का निर्णय लिया गया था. यह प्रस्ताव महज़ एक मिनट मे पारित  कर दिया गया था. इससे महाराष्ट्र सरकार के खजाने पर 30 करोड का अतिरिक्त बोझ पड रहा है. महाराष्ट्र सरकार पहले से ही भूतपूर्व विधायकों पर सालाना 100 करोड की राशि खर्च कर रही है.

सरकार के इस निर्णय़ की महाराष्ट्र मे काफी आलोचना हुई थी. लोकभावना की कद्र करते एस.एम. देशमुख और किरण नाईक ने 23 अगस्त को एक जनहित याचिका दायर की थी. इस पर आज न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड और न्यायाधीश महेश सोनक की बैंच के सामने सुनवाई हुई. देशमुख के वकील प्रदीप पाटील ने अपनी दलील कोर्ट के सामने रखते हुए कहा कि समाज के पिछडे वर्ग के ढेर सारे सवालों की अनदेखी करनेवाली सरकार विधायकों की पेन्शन की जब बात आती है तब उसपर कोई भी बहस न करते हुए एक मिनट मे पेन्शन बिल पारित कर देती है, यह जनता के प्रति द्रोह है. पिछले तेरह साल मे महाराष्ट्र में सात बार पूर्व विधायकों की पेन्शन मे बढोतरी की गई है. सांसद को सिर्फ 20 हजार की मासिक पेन्शन मिलती है. जबकि महाराष्ट्र के विधायकों को 40 हजार रूपयों की पेन्शन मिलती है.

फ़रियादी पक्ष की दलीलें सुनने के बाद न्यायाधीश चंद्रचूड और न्यायाधीश सोनक ने राज्य के एडवोकेट जनरल को नोटिस थमा कर अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखने को कहा है. इसके लिए 29 नवम्बर तक की मोहलत दी गई है. सरकार अब क्या रूख अपनाती है यह 29 नवम्बर को स्पष्ट होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 thoughts on “विधायकों को पेंशन के विरोध में पत्रकारों की जनहित याचिका…”
  1. सांसद और विधायक अपना वेतन खुद बढ़ा लें, सरकारी कर्मचारी आन्दोलन कर वृद्धी करा लें पर आम आदमी जो ठेला लगा,या दिन भर फूटपाथ पर बैठ कर कुछ कमाता है,उसके वेतन में बढ़ोतरी कौन करेगा क्योंकि इनकी पगार बढ़ते ही बाज़ार भी उतना ही महंगा हो जाता है, इस बात की चिंता इन जन सेवकों को नहीं,जब ये करोड़ों रूपये खर्च क़र जन सेवा के लियेआते हैं तो इन्हें वेतन पेंशन की आखिर जरूरत क्या है?

  2. सांसद और विधायक अपना वेतन खुद बढ़ा लें, सरकारी कर्मचारी आन्दोलन कर वृद्धी करा लें पर आम आदमी जो ठेला लगा,या दिन भर फूटपाथ पर बैठ कर कुछ कमाता है,उसके वेतन में बढ़ोतरी कौन करेगा क्योंकि इनकी पगार बढ़ते ही बाज़ार भी उतना ही महंगा हो जाता है, इस बात की चिंता इन जन सेवकों को नहीं,जब ये करोड़ों रूपये खर्च क़र जन सेवा के लियेआते हैं तो इन्हें वेतन पेंशन की आखिर जरूरत क्या है?

  3. कोई पञ्च साल के लिए विधायक बनता है पूरी जिन्दगी पेन्सन का अधिकार हो जाता है जब की इएस अबाधि में वेतन भत्ते कई सुबिधाये उपचार आदि भी लेता है जब की कोई कर्र्मचारी २० साल से कम सेवा होने पर ये सुबिधा नहीं ले पता है अब तो इ प फ योजना लागू हो जाने से वो भी समप्पत हो गए है ये कोण सा तरीका हूया की म ल अ विधाय] को पेन्सन देनी चाहिए ये तो लूटने का तरीका हूया कियो की आप के पास विधान बाबाने की ताकत है ये इएस परिस्थिति का ना जाईज़ लाभ उठाने का सद्यन्त्र है ये धोखे वाजी है जब तक आप प्रतिनिधि रहे तो आप सुभिधा ले सकता है पूरी जिन्दगी का सबल समझा मई नहीं आतता

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