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-डॉ. लक्ष्मी नारायण वैष्णव||

भोपाल; देश के पांच राज्यों में आगामी माह में होने वाले विधान सभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है प्रत्येक राजनैतिक दल के नेता अपनी अपनी जीत के दावे करते हुये जनता के मध्य ताल ठोक रहे हैं उनकी अपनी अपनी योजना है जिसको लेकर वह मैदान में उतरने तैयार दिखलायी देते हैं . गत चुनावों की भांति इस बार भी जाति एवं वर्ग के आधार पर टिकिटों के वितरण और विजय प्राप्त करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है.वर्ग और जाति की राजनीति

हालांकि इस बात को लेकर अधिकांश दलों के नेता इंकार करते हुये अपनी पार्टी के कार्यों एवं भविष्य की योजनाओं को ही आधार बतलाते हैं तो वहीं अच्छी सामाजिक एवं राजनैतिक छबि वाले नेताओं को मैदान में उतारने का दंभ भरते देखे जा सकते हैं. परन्तु जो सूत्र बतलाते हैं उनकी बात कुछ उक्त बात सच्चाई में परिवर्तित करते देखी जा सकती है. हम फिलहाल मध्यप्रदेश में बनते बिगडते जातिगत समीकरणों पर चर्चा करने जा रहे हैं जिसकी महत्वपूर्ण भूमिका पिछले चुनावों में रही है. देखा जाये तो राज्य में प्रत्येक वर्ग और समुदाय के नागरिक निवासरत हैं और उनका अपना स्थान और प्रभाव भी है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. इसी को आधार मानकर उनके नेता टिकिट मांगने एवं राजनैतिक दल जीत का दावा भी करते हैं.

राजनैतिक पंडितों की माने तो आगामी विधान सभा चुनावों में उक्त मामले को लेकर राजनीतिक दल सक्रियता ही नहीं दिखायेंगे अपितु सामाजिक संगठन भी एक निर्णायक भूमिका निभाने के लिए देखे जा सकेंगे. राज्य में विधानसभा चुनाव का शंख नाद हो चुका है तथा उक्त मामले को लेकर भी सुगबुगाहट प्रारंभ हो चुकी है. गत कुछ महिनो पूर्व से ही प्रारंभ हुये उक्त सिलसिले ने गति को तेज कर दिया है जिसके चलते पार्टी के शीर्ष पर बैठे नेताओं एवं कार्यालय के सामने शक्ति प्रर्दशन कर अपनी दावेदारी प्रस्तुत करने का क्रम भी जारी है. उक्त मामले में देखा जाये तो लगभग हर जाति एवं वर्ग के लोग अपने अपने दावों को प्रस्तुत कर रहा है वहीं नेता भी दावों का आंकलन करने में लगे हुये देखे जा सकते हैं . हम आपको इस संबध में अवगत कराना चाह रहे हैं कि प्रदेश में किन किन विधान सभा क्षेत्र में किस किस जाति ,वर्ग की बहुलता है और वहां उसका क्या फायदा राजनैतिक  रूप में मिल सकता है . हम बात करेंगे सर्व प्रथम ब्राम्हण समाज की जो लगभग जिले में कम से कम एक टिकिट की मांग को लेकर कार्य कर रहा है .

देखा जाये तो कुछ सीटों को छोडकर प्राय:यह वर्ग उपेक्षित सा दिखलायी दे रहा है इसके पीछे का कारण साफ है वह है एक नहीं अनेक मंचों का होना . बात करें बुंदेलखंड के पूर्व में दमोह पन्ना लोक सभा क्षेत्र की जो हाल ही में कुछ सीटों को जोडकर एवं छोडकर दमोह लोक सभा के रूप में पहचाना जाता है में ब्राम्हणों की सर्वाधिक संख्या होने के बाद भी किसी भी राजनैतिक दल ने इनको टिकिट नहीं दिया. जबकि इनकी भूमिका निर्णायक रही है और आने वाले समय में भी रहेगी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. भाजपा ने तो यहां पर संगठन का झुनझुना पकडा कर जैन या अन्य को सत्ता का सुख भोगने के लिये आगे किया है तो कांग्रेस भी इसमें पीछे नहीं कही जा सकती है. हालांकि इस बात का चिंतन राजनैतिक दलों के साथ ही ब्राम्हण वर्ग को भी करने की आवश्यकता होने की बात को जानकार बतलाते हैं. वहीं सूत्र बतलाते हैं कि इनकी अनदेखी भारी पड सकती है .

इसी क्रम में देखे तो पिछडा वर्ग ने भी अपना मोर्चा खोल दिया है इनका मिलकर राजनैतिक मंच का एक फोरम बनाना इसी रणनीति का हिस्सा कहा जा सकता है. सूत्रों की माने तो इस मंच की बैठकों में यह निर्णय लिया गया है कि समस्त राजनैतिक दलों से पिछडे वर्ग के उम्मीदवारों को टिकिट देने की मांग की जाये . वह राज्य के २३० में से लगभग ९८ विधानसभा क्षेत्रों में अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं. बात करें राजपूत समाज की तो सूत्र बतलाते हैं कि समाज के पदाधिकारियों ने राज्य की 230 विस सीटों में से लगभग ३ दर्जन से अधिक  सीटों समाज के उम्मीदवार उतारने के लिये मांग की है . बतलाया जाता है कि  चंबल, मालवा-निमाड़, विंध्य, विदर्भ सहित लगभग सभी क्षेत्रों में क्षत्रियों का दबदबा है. वहीं क्षत्रिय लोणारी कुनबी समाज बैतूल, छिंदवाड़ा, भोपाल, इंदौर, पीथमपुर, देवास आदि में से समाज के लोग राष्ट्रीय दल से चार-चार सीटों की मांग कर रहे हैं.  भोपाल में भेल क्षेत्र में कुनबी समाज की अधिकता बतलायी जाती है. इसी क्रम में अग्रवाल समाज ने भी कांग्रेस एवं भाजपा से इस बार 15-15 सीटों की मांग की है. समाज के लोगों और नेताओं के दावे हैं कि समाज के लोगों की चुनाव में आर्थिक भूमिका सर्वाधिक होती है.

सूत्रों की माने तो प्रदेश में करीब तीस लाख मतदाता अग्रवाल समाज के बतलाये जाते  हैं. राज्य में  230 विधानसभा क्षेंत्रों में से लगभग 5 दर्जन एैसी सीटें हैं जहां अग्रवाल समाज की संख्या ज्यादा हैं. इसी क्रम चौरसिया समाज ने भी अपनी ताकत को सम्मेलनों को करके दिखला दिया है वह प्रदेश की  महाराजपुर, गुढ़, सागर, ग्वालियर में अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रही है . बात करें स्वर्णकार समाज की तो वह राज्य की सिवनी-मालवा, नरसिंहपुर सहित पांच विधानसभा सीटों टिकटों की मांग कर रहा है. बाल्मीकि समाज की बात करें तो वह लगभग पांच छै सीटों पर दावेदारी प्रस्तुत कर रही है. खटीक समाज की बात करें तो कुछ क्षेत्रों में 2008 में इनका अच्छा प्रदर्शन देखते हुये उत्साह का माहौल होने को लेकर 1 दर्जन सीटों पर टिकिट की दावेदारी प्रस्तुत की जा रही है. वहीं प्रदेश की चार विस सीटों पर सिख समाज दावेदारी कर रहा है.  प्रदेश की इंदौर, जबलपुर सहित चार सीटों पर समाज के मतदाताओं की संख्या ज्यादा बतलायी जाती है. इसी क्रम में सिंधी समाज इंदौर, जबलपुर, भोपाल, कटनी, उज्जैन, सतना की विस सीटों पर सिंधी समाज अपनी दावेदारी कर रहा है. बात करें मसीही समाज की तो समाज के लोगों के लिए प्रदेश में कम से कम चार विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवारों को टिकिट देने की मांग कर रहा  है. बात करें वैश्य समाज की तो  अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन के प्रदेश अध्यक्ष व गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने समाज के लिए किसी राष्ट्रीय दल से टिकट देने की मांग करने की मना ही कर दी है परन्तु सुगबुगाहट चलने की जानकारी मिल रही है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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