लक्ष्मणपुर बाथे कांड में आये फैंसले को न्याय की जीत कैसे कह दें…

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-दिनेश राय द्विवेदी||

लक्ष्मणपुर बाथे नरमेध के मुकदमे में पटना हाईकोर्ट का फैसला आ गया है. सब के सब 26 मुलजिम बरी हो गए. पूरा निर्णय पढ़ने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इस निर्णय को न्याय की हत्या नहीं कहा जा सकता तो न्याय की जीत और न्याय भी नहीं कहा जा सकता. यह निर्णय बिहार शासन, उसकी पुलिस, अभियोजकों की नाकामी और ऊंची जाति के भूस्वामियों के साथ उन के गठजोड़ की कहानी को चीख-चीख कर कह रहा है. 1 दिसंबर 1997 की रात को सोन नदी के किनारे बसे गांव में नृशंसता के साथ योजनाबद्ध रीति से किए गए इस नरमेध में कुल 65 लोग घायल हुए थे जिन में से 58 मारे गए. मारे गए लोगों में पांच मछुआरों को छोड़ कर सभी 53 दलित थे.patna high court

बिहार के जहानाबाद जिले के मेहन्दिया पुलिस स्टेशन के सब इन्सपेक्टर अखिलेन्द्र कुमार सिंह ने 2 दिसंबर 1997 की 9:30 पर सुबह बिनोद पासवान के बयान की फर्द तैयार की थी जिसे बाद में इस मामले की एफआईआर के रूप में दर्ज किया गया. इस बयान में अंकित है कि 1 दिसंबर की रात को 10:30 बजे जब वह और उसका परिवार भोजन कर के घर में सोया ही था कि गोलियां चलने की आवाज आने लगी. वह और उसका परिवार इन आवाजों से जागा और अपने कमरों से बाहर निकले थे कि 10-15 हमलावर उस के घर में घुस गए और उस के परिवार के 7 सदस्यों को गोलियों से भून दिया. बिनोद ने किसी तरह खुद को बचाया. हमलावर किसी को बचा न देख कर घर के बाहर निकल गए. आधे घंटे बाद उस ने हमला पूर्ण होने की रणवीर बाबा की घोषणा सुनी. उसने घर की छत पर चढ़ कर देखा कि वे रणवीर सेना के लगभग 150 हमलावर थे, जिस में से 19 को उसने पहचान लिया और नाम दर्ज कराए. हमलावर अपनी विजय का हल्ला करते हुए सोन नदी पार कर उत्तर की ओर गांव छोटकी खड़ाउं की तरफ चले गए. बाद में उसने पड़ोसियों के घरों में जा कर देखा तो सब मरे पड़े थे, 2-4 कराह रहे थे लेकिन रात को उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था. सुबह उसे पता लगा कि नदी के उत्तरी किनारे पर पांच लोगों की गला काट कर हत्या भी की गई थी और कुछ को हमलावर उठा ले गए थे.

सुबह लिया गया यह बयान उसी दिन शाम 4 बजे थाने में एफआईआर के रूप में दर्ज हुआ, लेकिन अच्छी सड़क होने के बावजूद भी केवल 50 किलोमीटर दूर स्थित मैजिस्ट्रेट की अदालत में 4 दिसंबर को पहुंचा. 2-3 दिसंबर को कोई अवकाश भी नहीं था. यह देरी क्यों हुई? इसे चार पुलिस अफसर अदालत को समझाने में असफल रहे. सारे गवाह 2 दिसम्बर को मौके पर पुलिस के पास मौजूद थे लेकिन पुलिस ने उन के बयान उसी दिन दर्ज करने के बजाय चार-पांच दिन देरी से दर्ज किए. हमलावरों के सोन नदी पार कर उत्तरी गावों छोटकी और बड़की खड़ाऊं की तरफ जाने का कोई सबूत अदालत में पेश करना तो दूर, इकट्ठा ही नहीं किया गया. घटना में जिन हथियारों का इस्तेमाल होना बता कर जब्त किया गया उन्हें वैज्ञानिक जांच के लिए भेजा ही नहीं गया. अधिकांश अभियुक्तों को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया अपितु उन्हों ने खुद सरेंडर किया. पुलिस और अभियोजन इस नरमेध का असली इरादा तक साबित नहीं कर सका.

हाईकोर्ट मुकदमे में पुलिस और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सबूतों के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचा कि यह भीषण नरमेध 1 दिसंबर की रात को घटित हो जाने और अगली सुबह ही पुलिस के मौके पर पहुंच जाने के बावजूद 3 दिसंबर को मुख्यमंत्री के घटना स्थल के दौरे के एक दिन बाद 4 दिसंबर को वास्तविक अन्वेषण आरंभ किया. पुलिस और अभियोजन किसी भी तरह से अभियुक्तों का उक्त नरमेध से संबंध ही स्थापित नहीं कर सके.

यह केवल बिहार के एक विशाल जघन्य नरमेध की कहानी नहीं है, अपितु सारे देश की पुलिस के रवैये की आम कहानी है. अपराध घटित होते ही पुलिस के हाथ-पांव फूल जाते हैं. वे सोचने लगते हैं कि इस घटना में कौन राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से शक्ति संपन्न लोग हो सकते हैं? उन्हें बचाने के लिए कैसे-कैसे दबाव उन पर आ सकते हैं? ये सब पता करने में जो देरी होती है उसे बाद में अपने रिकॉर्ड में जानबूझ कर फर्जी बदलाव कर के तथा गवाहों के बयानों को अपनी मर्जी के मुताबिक लिख कर खानापूरी करती है. अन्वेषण होने और वास्तविक अपराधियों का पता लगा कर उन के विरुद्ध सच्चे सबूतों के आधार पर मुकदमा स्थापित करने के स्थान पर पुलिस पहले ही यह निर्णय कर लेती है किन लोगों पर अभियोग चलाना है, और बाद में उन के विरुद्ध सबूत तैयार करने लगती है. इस मुकदमे में हाईकोर्ट को एक भी सबूत विश्वसनीय नहीं लगा.

हाईकोर्ट को अपने फैसले में लिखना पड़ा कि नरमेध हुआ है, लोगों की हत्याएं हुई हैं और घायल हुए हैं. इस कारण से उन्हें मोटरयान अधिनियम की धारा 163-ए के अन्तर्गत मृतकों और घायलों की आय न्यूनतम वेतन के बराबर मानते हुए सरकार प्रभावित लोगों को मुआवजा प्रदान करे. यह एक मरहम हो सकता है. लेकिन सरकार, पुलिस और अभियोजकों का क्या जो इतने बड़े नरमेध के सबूत तक न जुटा सके, ये साबित तक नहीं कर सके कि जिन्हें उन ने अभियुक्त बनाया है उन का इस नरमेध से कोई संबंध तक था.

इससे भी शर्मनाक बात यह है कि यह निर्णय राज्य व्यवस्था की इस नाकामी पर उस के प्रति, इस नाकामी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और व्यक्तियों के प्रति एक शब्द तक नहीं कहता. जिन्होंने यह लापरवाही बरती है या जानबूझ कर वास्तविक अपराधियों को बचाने का कर्म किया है उन के विरुद्ध कोई कार्यवाही किए जाने तक का कोई निर्देश इस निर्णय में नहीं है. इससे ऐसा लगता है कि हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र संस्था न हो कर राज्य की कार्यपालिका और ब्यूरोक्रेसी के पास बंधक निकाय है. यह निर्णय यह संदेश दे रहा है कि बिहार के शक्तिसंपन्न लोग ऐसे नरमेध करते रह सकते हैं और राज्य व्यवस्था के साथ उन का नेक्सस उन का बाल भी बांका नहीं होने देगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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