जालौन के छह पत्रकारों को बालू की दलाली में हर माह मिलते हैं सत्तर हजार से एक लाख रुपये…

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 -केपी सिंह||

यूपी का जालौन जिला, जहां बेतवा नदी देश में सबसे उम्दा मौरंग के लिये प्रसिद्ध है. कृपालु बेतवा मां ने खनन के नये अध्याय में माफियाओं को छप्पर फाड़ कर दिया है. साथ ही लोकल पत्रकारों की भी दशा सुधार दी है. दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन के समय उत्तर प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में अवैध खनन का मुद्दा सुर्खियों में छा गया था, जिसके बाद इससे उड़ी गर्द दबाने के लिये राज्य सरकार और उसके साथ जुड़े सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सब्र करना पड़ा. ऊपर के इशारे की वजह से अवैध खनन करने वाले कुछ दिनों के लिये भूमिगत हो गये लेकिन अब लोगों का ध्यान बंटते ही वे पूरी ऊर्जा के साथ अपने काम में पिल पड़े हैं. orai

बेतवा में हर ओर पोकलैंड मशीनों से बालू उठती देखी जा सकती है. बालू का उठान केवल सिल्ट सफाई के मकसद से नहीं हो रहा बल्कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को एक ही दिन में हलाल करने के उत्साह के साथ बेतवा से मौरंग के सफाये की होड़ लगी हुई है. मुख्य सडक़ों पर शाम होते ही मीलों लंबी बालू ट्रकों की कतार खनन की मात्रा की गवाही देते हैं. यदि इतने खनन की रायल्टी भी ईमानदारी से मिले तब भी कोई जिम्मेदार सरकार इसकी इजाजत नहीं देगी. वजह यह है कि एक तो लिफ्टर से बालू निकालने के कारण कछुआ, मछली व सभी मित्र जलचरों की लुगदी बन जाती है जिसे मौरंग के साथ साफ देखा जाता है. इन जलचरों के न रहने से पानी की कुदरती सफाई की व्यवस्था समाप्त हो जायेगी और किनारे कोई फैक्ट्री या महानगर न होने से जो बेतवा अभी भी बड़ी नदियों की तुलना में सच्चे अर्थों में पुण्य सलिला बनी है.

उसका पानी प्रदूषित होकर सडऩे लगेगा. जिससे जनहानि शुरू हो जायेगी. यही असर बेतवा की तलहटी में बालू न रह जाने का होगा. बालू नदी से पाताल के लिये जाने वाले पानी को फिल्टर करने की व्यवस्था है. जाहिर है कि जब फिल्टर नहीं रहेगा तो भूमिगत जल स्रोत प्रदूषित होने लगेंगे जिसके गंभीर दूरगामी परिणाम होंगे. होना तो यह चाहिये कि इस अनर्थ पर मीडिया में धमाकेदार खबरें साया हों लेकिन बालू माफिया पत्रकारों की किस्मत संवारने के पुण्य कर्म का बीड़ा उठा चुके हैं. इसलिये पत्रकारों ने मौन व्रत के जरिये आत्म शुद्धि की आड़ में अपने कर्तव्य बोध से छुटकारा पा लिया है. खबर यह है कि जालौन जिले में पांच-छह बड़े ब्रांड के अखबारों के लोगों को 70 हजार से 1 लाख रुपये तक महीने बांध दिये गये हैं.

इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों को भी खासा पैकेज मिल रहा है. इस रकम से पत्रकार साथी अपने-अपने संस्थान के मुख्यालयों में बैठे आकाओं की सेवा भी बेहतर तरीके से कर पा रहे हैं जिससे उन्होंने भी इस ओर से अपनी आंखें फेर रखी हैं. समझ में नहीं आता कि इतने बेपर्दा ढंग से अपने ईमान को बाजार में बैठा देने वाली मीडिया को क्या यह अहसास नहीं बचा है कि इसके कारण जनमानस में उसकी विश्वसनीयता दो कौड़ी की भी नहीं बची है. मीडिया के पुरोधाओं को इप्टा द्वारा संचालित किये जाने वाले इन्ना की आवाज जैसे नुक्कड़ नाटकों का मंचन जरूर देखना चाहिये. कैसे एक ताकतवर व्यक्ति या संस्थान अपने पुण्य गंवाने के बाद पुनर्मूषको भव की दयनीय गत में जब पहुंचता है तो उसके हाथ में पछताने के अलावा कुछ नहीं रह जाता.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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