उत्तराखंड में सरकार का झूठ, मीडिया का साथ…

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-मयंक सक्सेना||

मैं और मेरे ज़्यादातर साथी 21 जून और उसके बाद जब उत्तराखंड में ग्राउंड ज़ीरो पर काम करने पहुंचे तो उस में मेरी या बूंद की ओर से की गई फेसबुकिया अपील का सिर्फ उनको जोड़ने या साथ लाने भर का ज़रिया थीं, लेकिन दरअसल उन सभी के मन में ये भावना जगाने का असल काम हिंदी और अंग्रेज़ी मीडिया ने किया. उस में भी ज़्यादा योगदान हिंदी टीवी और प्रिंट मीडिया का.vijay-bahuguna

मैं भी शायद अगर एक टीवी चैनल में काम न करता होता तो कभी भी इस विभीषिका से इस कदर विचलित न होता या यूं कहें कि मुझे इसकी सच्चाई भी ठीक से न पता होती…लेकिन ख़ैर हम में से ज़्यादातर ने उत्तराखंड की असल तस्वीरें अपनी अपनी टीवी स्क्रीन्स पर देखीं और शायद ये असर अखबारों और टीवी की कवरेज का ही था कि दिल्ली, सोनीपत, मणिपुर, जौनपुर, बनारस, लखनऊ, लखीमपुर, कोलकाता, पटना, अम्बाला, केरल, महाराष्ट्र, लखीमपुर, दरभंगा, उज्जैन समेत 21 राज्यों के 100 से ऊपर लोग बूंद के साथ काम करने उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इलाकों में अपनी जान जोखिम में डाल कर आ पहुंचे.हम वहां का असल हाल देख रहे थे और देख रहे हैं…सच्चाई ये है कि वहां हालात अभी तक इतने खराब हैं कि शायद सब कुछ सामान्य होने में एक दशक से भी अधिक लग जाए या फिर कभी भी सब कुछ सामान्य न हो पाए.

uttrakhand RTI advलेकिन साथ ही हम ये भी देख रहे थे कि शुरुआत के कुछ दिनों के बाद ही मीडिया का रवैया अचानक से बदलने लगा था…न केवल त्रासदी की असल तस्वीरें टीवी और अखबारों से गायब होती जा रही थी बल्कि गांवों के असल हाल और बर्बादी के साथ-साथ सरकार की उपेक्षा की ख़बरों की जगह एक साफ तौर पर निश्चित एजेंडे के तहत सोनप्रयाग के बह जाने या केदारनाथ के मलबे या फिर फौज के जांबाज़ रेस्क्यू मिशन में तीर्थयात्रियों के बच जाने के मसालेदार स्कूप ही परोसे जा रहे थे. यहां तक कि भूतप्रेत-जादूटोने वाले चैनल के पत्रकार एक ऐसे गांव में तो जा पहुंचे जो पुरोहितों का गांव था और वहां सबसे ज़्यादा जनहानि हुई थी लेकिन वो पास की ही दलित बस्तियों में नहीं गए, जहां मरने वाले सभी लोग बेहद गरीब दिहाड़ी मजदूर थे. समाचार चैनल और अखबार या तो सिर्फ नाटकीय विज़ुअल्स दिखा रहे थे या फिर तीर्थयात्रियों के रेस्क्यू या फिर सरकार के बयान…हम लोग टीवी से दूर थे लेकिन जब भी कभी टीवी देखने को मिलता तो यही दिखता. इसके बाद इस रणनीति का अगला चरण शुरु हुआ, अभी तक भी न्यूज़ कंटेंट से अटे पड़े इन इलाकों की ख़बरें टीवी से गायब हो गई, अखबारों के राष्ट्रीय संस्करणों से भी और फिर ख़बरें लौटी लेकिन तब जब सरकार ने सब कुछ ठीकठाक दिखाने का एक और नाटक रचा…वो था 11 सितम्बर को पूजा शुरु करवा कर बाहर के लोगों को ये धोखा देना कि सरकार ने सबकुछ संभाल लिया है. किसी भी समाचार चैनल ने इस ढोंग का पर्दाफ़ाश नहीं किया बल्कि इसकी जगह इस पूजा के लाइव टेलीकास्ट के लिए ओबी वैन रुद्रप्रयाग पहुंच गई, हां..आखिरी वक्त में मौसम खराब हो गया और ये नहीं हो पाया…uttrakhand RTI adv5
लेकिन क्या किसी ने ये स्टोरी देखी या सुनी कि सरकार ढोंग के लिए पूजा करवा रही है? क्या एक बार भी उन सड़कों को ख़बर बनाया गया, जिनको सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए मिट्टी भर कर ठीक कर देने का ढोंग हुआ? क्या आपने टीवी पर देखा कि इन सड़कों पर चलना अभी तक जान जोखिम में डालना है? क्या किसी अखबार में आप ने पढ़ा कि पूरे रुद्रप्रयाग इलाके में लगातार जगह जगह लैंड स्लाइड जारी है और तमाम गांवों के लोग अपने घरों को भूस्खलन की ज़द में पाकर कहीं और जाकर बस गए हैं? क्या एक बार भी किसी स्टार टीवी रिपोर्टर ने बांधों और हेलीकॉप्टर सेवा और इस आपदा के सम्बंध को लेकर कोई पीस टू कैमरा की? अगर याद हो तो बताइए कि केदरानाथ में पूजा करवाने पहुंचे टीवी चैनलों ने पता किया हो कि विस्थापित ग्रामीणों का क्या हाल है? वो कैसे रह रहे हैं? बिना सड़कों के लोग अस्पताल कैसे पहुंचते हैं? कालीमठ इलाके के लोग रात को अपने घरों में क्यों नहीं सोते हैं और चंद्रपुरी नाम के गांव के दलित अभी तक तम्बुओं में किस हालत में रह रहे हैं?
uttrakhand RTI adv3हम भी वहां काम कर रहे थे और स्थानीय लोग लगातार अपनी इन समस्याओं से हमको अवगत कराते रहे और ये शिकायत भी करते रहे कि आप तो मीडिया से हैं…आखिर मीडिया हमारी ख़बर क्यों नहीं दिखाता है? वो बहुगुणा का बयान दिखाता है तो बहुजन का क्यों नहीं? ज़ाहिर है मेरे पास इसका जवाब नहीं था, लेकिन अब शायद सबके पास इसका जवाब है…अब तक की सबसे बड़ी आपदा, ढेरों सवालों और लाखों आहों का जवाब हैं एक ए4 शीट पर दर्ज 22 करोड़ 77 लाख 45 हज़ार और 510 रुपए का आंकड़ा, वो आंकड़ा जो आज के समय में शर्मसार नहीं करता है, सिर्फ एक खुलासा भर है. मैं ये लेख अपने हाथ में आई एक सूचना के अधिकार के जवाब की प्रतिलिपि को देख बेहद मजबूरी में और कई बार आग्रह किए जाने के बाद ऐसे वक्त में लिख रहा हूं, जब शायद दो दिन बाद ही मेरा विवाह है और समय बिल्कुल नहीं लेकिन ये आंकड़े मजबूर करते हैं इस बारे में लिखने को. दो दिन बाद इंटरनेट पर बैठा तो सबसे पहले सामने ये ईमेल थी, जिसमें आरटीआई की कॉपी थी, हल्द्वानी के आरटीआई एक्टिविस्ट गुरविंदर सिंह चड्ढा की आरटीआई का जवाब जिसमें दी गई सूची सिर्फ ये ही नहीं बता रही थी कि आपदा के बाद से उत्तराखंड सरकार ने किस मीडिया संस्थान का कितने लाख का विज्ञापन दिया, बल्कि ये भी साफ था कि आखिर क्यों आपदा आने के कुछ ही रोज़ बाद से ख़बरें गायब हो गई और धीरे धीरे पूरी आपदा ही गायब हो गई..uttrakhand RTI adv2कैसे काम करती है हमारी ईमानदार मीडिया और कैसे सिर्फ पेड न्यूज़ दिखाई और छापी ही नहीं जाती है बल्कि कैसे पेड होते ही न्यूज़ गायब भी हो जाती है…पत्रकारों का ओज और जोश किस तरह से संस्थान का मार्केटिंग विभाग अपने हिसाब से ऊपर नीचे करवाता है और सोचने पर मजबूर करती है कि हिंदी मीडिया में आखिरी ‘सम्पादक’ कौन था क्योंकि फिलहाल तो सम्पादक जैसी संस्था और पत्रकारिता जैसा कुछ भी दिखता नहीं है.
लम्बे समय से टीवी में काम करते रहने के दौरान लगातार हम में से ज़्यादातर पत्रकारों ने इस बात को महसूस किया है कि ख़बरों का मिशन सिर्फ पेशा ही नहीं हो गया बल्कि दलाली भी इसका अहम आयम हो गई है. सरकार और कारपोरेट के नेक्सस में फंसी पत्रकारिता सिर्फ इन दोनों के लिए एक टूल है, जिसका ये अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं और बात न मानने पर या तो अम्बानी की तरह पूरी मीडिया ही खरीद डालते हैं या फिर तमाम और तरीके होते हैं, जिनमें से विज्ञापन रोक देने से लेकर अलग अलग तरीकों से सम्पादकों पर दबाव बनाना भी शामिल है. यही वजह है कि राज्य में ढाई सौ से भी ज्यादा बांधों को मंज़ूरी देकर कारपोरेट को लाभ पहुंचाने वाली उत्तराखंड सरकार ने आपदा के कुप्रबंधन और पर्यावरण से भीषण खिलवाड़ की सच्चाई छुपाने, राज्य में दलितों-वंचितों की हालत का सच सामने न आने देने, आपदा में मौतों का सही आंकड़ा छुपाने के लिए हिंदी मीडिया पर 22 करोड़ रुपए खर्च कर दिए. मंदी के दौर में राजस्व की कमी से ज़्यादातर चैनल्स घाटे से जूझ रहे हैं और अखबारों के सम्पादक किसी तरह नौकरी बचा रहे हैं. ऐसे में उनके पास भी इस सौदे को स्वीकर लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.
uttrakhand RTI adv4अगर आप सिर्फ बड़े चैनल्स की ही सूची देख लें तो आपकी आंखे शायद हमेशा के लिए खुल जाएंगी. मुकेश अम्बानी की मिल्कियत हो चुके ईटीवी को 1 करोड़ 78 लाख से भी ज़्यादा, महा ईमानदार सुब्रत राय के सहारा समय को लगभग 41 लाख रुपए, ज़ी न्यूज़-यूपी/यूके को 36 लाख रुपए, साधना न्यूज़ को 61 लाख, आज तक को लगभग 22 लाख, आईबीए7 को 14 लाख, एबीपी न्यूज़ को 23 लाख, एनडीटीवी इंडिया को 12 लाख, इंडिया टीवी को 43 लाख रुपए, न्यूज़ 24 को 11 लाख से ज़्यादा, ज़ी न्यूज़ को 14 लाख और इंडिया न्यूज़ को 22 लाख रुपए से भी ज़्यादा रुपए के सरकारी विज्ञापन और संदेश इस बीच दे कर उपकृत किया गया. यही नहीं टीवी 100 जैसे दोयम दर्जे के चैनल को लगभग 80 लाख रुपए का फायदा पहुंचाया गया.
सूची बहुत लम्बी है लेकिन सच बहुत संक्षिप्त कि किस तरह से उत्तराखंड सरकार ने अपनी नाकामी ही नहीं उपेक्षा, लापरवाही और असंवेदशीलता को छुपाने के लिए लगातार मीडिया को विज्ञापन के नाम पर एक तरह से घूस दे कर चुप रहने का इशारा कर दिया. पहले उत्तराखंड की ही न्यूज़ की जगह उत्तराखंड के ही लेकिन सिर्फ नॉन न्यूज़ और सेलेबल विज़ुअल्स ने ले ली और फिर धीरे धीरे उत्तराखंड ही परिदृश्य से गायब हो गया. लोग हम से लगातार पूछते थे कि अब तो उत्तराखंड में सब कुछ ठीक है फिर वहां क्या काम कर रहे हो…लोगों की गलती शायद उनकी ये नासमझी है कि इस तरह की आपदा के बाद सबकुछ किसी पौधे के कटे तने की तरह हफ्तों में ही दोबारा उग नहीं आता बल्कि पुनर्वास के काम में कई साल लग जाते हैं. लेकिन मीडिया की गलती नहीं है, अपराध है कि सारे टीवी चैनल्स से लेकर अखबारों के तमाम रिपोर्टर्स ने सारी असलियत देखी है, उन्होंने देखा है कि वहां के हालात अभी भी बहुत अच्छे नहीं हैं, वो जानते हैं कि हालात सुधरने में सालों लगेंगे, वो जानते हैं कि उत्तराखंड 50 साल पीछे चला गया है, लेकिन वो सरकार के इस ढोंग में शामिल हो गए कि 50 दिन में ही सब ठीक हो गया है. ख़ैर मैं, मेरे साथी और उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों में काम कर रहे तमाम एक्टिविस्ट वहां के हालातों को अपनी आवाज़ में लगातार चर्चा में लाने की कोशिश करते रहे, हम कोशिश करते रहे की वहां का सच लोगों के सामने हो…लेकिन मीडिया को ही सच मान लेने वाले सुविधाभोगी समाज के सामने इस तरह का सच सामने आना ज़रूरी था…बेहद ज़रूरी कि हम सच भले ही न कह रहे हों…मीडिया झूठ बोल रहा था और उत्तराखंड सरकार झूठ से भी कुछ ज़्यादा. गुरविंदर आपको आभार, कि आप ये सच सामने लाए…इसलिए नहीं कि इससे हमें मदद मिलेगी बल्कि इसलिए कि लोगों की आंखें खुलेंगी…कुछ लोगों की तो खुलेंगी…हां, सवाल ये है कि इस आरटीआई के खुलासे से आखिर क्या बिगड़ेगा पैनल में बैठ कर चीखने वाले सम्पादकों का…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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