अभिमन्यु अनत को साहित्य अकादमी मानद महत्तर सदस्यता…

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-न्यूज़ीलैंड से रोहित कुमार, ‘हैप्पी’||

अभिमन्यु अनत को साहित्य अकादमी ने मानद महत्तर सदस्यता (ऑनरेरी फेलोशिप) का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया है.अभिमन्यु अनत

सक्रिय विकास के लिए कार्य करनेवाली एक राष्ट्रीय संस्था है, जिसका उद्देश्य उच्च साहित्यिक मानदंड स्थापित करना, भारतीय भाषाओं में साहित्यिक गतिविधियों को समन्वित करना एवं उनका पोषण करना तथा उनके माध्यम से देश की सांस्कृतिक एकता का उन्नयन करना है.

अकादमी द्वारा भारतीय साहित्यकारों को प्रदान किया जाने वाला ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ भारत में दिए जाने वाले सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों में से है. इसके अतिरिक्त साहित्य अकादमी किसी लेखक का सर्वोच्च सम्मान उसे अपना ‘महत्तर सदस्य’ चयनित करके करती है. यह सम्मान विशिष्ट साहित्यकारों के लिए सुरक्षित है और एक समय में 21 महत्तर सदस्य हो सकते हैं.

अकादमी ने अपनी 23 अगस्त 2013 की चेन्नै बैठक में अभिमन्यु अनत को यह सदस्यता देने का निर्णय अकादमी के संविधान अनुसार श्रेष्ठ विदेशी लेखको के निर्वाचन कर सकने के अंतर्गत लिया था.

अकादमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवासराव द्वारा प्रेषित पत्र में कहा गया है कि श्री अभिमन्यु अनत को ‘सम्मानित करते हुए साहित्य अकादमी स्वयं सम्मानित हो रही है.’

श्री अभिमन्यु अनत ने हिंदी शिक्षण, रंगमंच, हिंदी प्रकाशन आदि अनेक क्षेत्रों में कार्य किए हैं और लाल पसीना, लहरों की बेटी, एक बीघा प्यार, गांधीजी बोले थे आदि उपन्यासों, केक्टस के दाँत, गुलमोहर खोल उठा इत्यादि कविता संग्रहों तथा अपने सम्पादकीय व अन्य आलेखों के माध्यम से गत 5० वर्षो से हिंदी साहित्य को एक वैश्विक पहचान देने के लिए प्रयासरत रहे हैं.

अभिमन्यु अनत को अपनी साहित्य सेवा के लिए इससे पूर्व भारत, मॉरीशस और विश्व स्तर पर अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं . सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, यशपाल पुरस्कार, जनसंस्कृति सम्मान तथा उप्र. हिंदी संस्थान पुरस्कार के अतिरिक्त अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है.

मॉरीशस स्थित विश्व हिंदी सचिवालय ने मार्च 2013 में मॉरीशसीय हिंदी साहित्य शताब्दी समारोह के अंतर्गत अभिमन्यु जी को विशेष सम्मान प्रदान किया था.

अभिमन्यु अनत का साहित्य अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में सम्मलित है तथा उनपर अनेक शोधकार्य किए जा चुके हैं. उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, फ्रेंच सहित अनेक भाषाओं में किया गया है.

लेखक न्यूज़ीलैंड से प्रकाशित भारत-दर्शन (इंटरनेट पर विश्व की पहली हिंदी साहित्यिक पत्रिका) के संपादक हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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