बिहार में पड़ते हैं कला की पीठ पर चाबुक…

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ये जो नंगी पीठ देख रहे हैं, ये है बिहार की कला, और उस पर जो निशान दिख रहे हैं वो है कलाकार को बिहार में उसके कला के बदले में मिलने वाला इनाम, और आगे भी मिलता रहेगा, बेवजह पुलिस के बेल्ट की मार से लाल, हड्डीयाँ टूटी और अरमान कीचड़ चाटते. अब आप ये मत कहिएगा कि ऐसा तो हर जगह होता है. नहीं, ये बिहार में ही होता है.pravin gunjan

ये प्रवीन गुंजन हैं, राष्ट्रीय नाट्य अकादमी से मंच निर्देशन के पढ़ाई करके, बिहार के बेगुसराय में रहकर काम कर रहे हैं. इन्होने कभी दिल्ली और मुम्बई का मोह नहीं किया. जो करना चाहा बेगुसराय और वहाँ पर कला के लिए किया. राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह अपने दम पर करवाते हैं. लेकिन ये घटना बिहार के लिए आम घटना है. ये हंटर के निशान सिर्फ पीठ पर ही नहीं बल्कि बिहार में कला के क्षेत्र में कोइ कुछ भी करना चाहे तो उसके ह्रदय में लगती है. चाक़ू गोद दिए जाते हैं बिहार में एक कलाकार के कला में, वह अपने मन रूपी कैनवास में रंग नहीं, अपने बिहार के लिए कुछ करने की सोच से चोटिल अपने दिल का बहा खून भरता है. मैं जानता हूँ इस हंटर का दर्द, शरीर पर तो नहीं मन पर झेला है.

देख लीजिये बिहारी और गैर बिहारी, ये है बिहार और इसके कलाकार के शरीर पर रात भर मार से उभरे निशान. जिस राज्य के मुख्यमंत्री इस तरह थोक के भाव में जेल जाते हों. युवा हर साल भागते हों. ऊपर से नीचे तक संवेदनहीन किंकर्तव्य विमुढ़ हर कोने में बैठे हों वहाँ कला को कौन पुछता है. क्या संवेदना बची है लोगों में, सरकार में और क्या संवेदना बचेगी प्रवीण गुंजन के मन में अपनी मिट्टी के लिए. सब ख़तम कर देना चाहते हैं वो लोग.

(यह पोस्ट नितिन चन्द्र की फेसबुक वाल से ली गई है, रात अधिक हो जाने से घटना का दिन, समय और कारण पता नहीं चल पाया है)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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