साझा संस्कृति की विरासत हैं रामलीलाएं…

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-अनिल शुक्ल||

यद्यपि इस बात का कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन यह एक आमफहम मान्यता है कि सबसे पहली रामलीला 17वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत ने चित्रकूट में खेली. बहरहाल इतिहास में भले ही यह विवाद हो लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उत्तर भारत की हिन्दी बोलियों और बाद की हिन्दुस्तानी जब़ान में खेले गए सभी आधुनिक लोक नाटकों की जनक रामलीला ही है और सभी प्रकार की रामलीलाओं का आधार गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस है.ramlila

जहां तक दस्तावेजों का सवाल है.

पहली रामलीला होने का उल्लेख वाराणसी के रामनगर में सन् 1830 में मिलता है. इसके प्रवर्तक तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदितनारायण सिंह थे. बनारस के मीलों लंबे इलाके को ‘लीला’ के प्रदर्शन स्थल के रूप में विकसित किया गया. अलग-अलग जगहों पर अयोध्या वनवास और लंका कांड प्रदर्शित होते. ‘यूनेस्को‘ के मुताबिक बनारस के रामनगर की रामलीला अभी तक चलने वाला संसार का एक मात्र लोकनाट्य है, जहां प्रदर्शन स्थल अलग-अलग स्थानों पर होते हैं और दर्शक घूम-घूमकर इन प्रदर्शनों का लुत्फ उठाते हैं. इसके बाद के दशकों में समूचे उत्तर भारत में रामलीलाओं की बाढ़ आ गई. आगरा की रामलीला 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में शुरू की गई.  इसी दौरान अयोध्या, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना, मधुबनी आदि स्थानों पर लीलाओं का चलन शुरू हुआ. दिल्ली की प्रसिद्ध रामलीला की शुरूआत अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ‘जफर‘ के जमाने से हुई. बादशाह प्रायः इसकी प्रस्तुतियों का आनन्द उठाने पहुंच जाया करते थे.

रामलीला की शुरूआत एक धार्मिक क्रियाकलाप के तौर पर की गई. इसके दर्शक रामभक्त होते थे, और प्रस्तुति देने वाले कलाकार भी. 1857 के विद्रोह के बाद भारतीयों के तुष्टिकरण के तौर पर अंग्रेजों ने जो अनेक सुधारात्मक कार्रवाईयां की थीं उनमे रामलीलाओं के लिए समुचित बड़ा स्थान मुहैया कराना व दूसरे इंतजामों में  सहयोग करना भी शामिल है. देशभर में ज्यादातर रामलीला मैदानों के आवंटन 19 वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में हुए हैं. जहां तक आगरा का ताल्लुक है, कचहरी घाट से शुरू होकर यह रामलीला मौजूदा किले के सामने वाले मैदान में काफी बाद में पहुंची है.

अपनी शुरूआती समझ में अंग्रेज भी इसे हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखते थे, लेकिन जैसे-जैसे इन लीलाओं के प्रदर्शन का इतिहास लंबा होना शुरू हुआ, इनके प्रदर्शन के लिए खुले और बड़े स्थान उपलब्ध होने लगे, इसकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ने लगा. 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध के चरम तक पहुंचते-पहुंचते देश के अनेक स्थानों पर दूसरे धर्मों के मतावलंबी भी इसमे शरीक होने लगे. 20 वीं सदी के शुरूआती दशकों तक उनका यह जुड़ाव महज दर्शक के रूप में था. जैसे-जैसे समय गुजरा लीलाओं में नाटकीयता बढ़ती गई. 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ज्यादातर स्थानों पर होने वाली इन लीलाओं में पारसी नाटक परम्परा बेतरह अपना असर डालने लगी.

बेशक ज्यादातर प्रदर्शनों का आधार गोस्वामी तुलसीदास की चौपाईयां और दोहे हुआ करते थे लेकिन शुरुआती सपाट चेहरों वाले प्रस्तुतिकर्ताओं की तुलना में बाद के अभिनेताओं के ‘भाव‘ बदलते चले गए. अब उनके चेहरे, भावों के उतार चढ़ाव का स्पष्ट प्रदर्शन करते और शरीर, गतियों और अभिनय से लबरेज़ होते थे. ऐसी नाटकीयता प्रधान लीलाओं ने विराट दर्शक वर्ग का मनोरंजन करना शुरू कर दिया. यही वजह है कि दोपहर बाद से सरेशाम तक चलने वाली इन  प्रस्तुतियों में दर्शकों के रूप में हिन्दू भी होते, मुसलमान, पारसी, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई भी. अनेक प्रस्तुतियों में अंग्रेज अधिकारी भी अपने परिवारों के साथ दर्शक के रूप में मौजूद होते. पहली सहस्त्राब्दी से ही जिस तरह की गंगा-जमुनी तहजीब भारत में थी, वहां देखते-देखते रामलीला सभी धर्म वालों का प्रधान मनोरंजन बन गई. ब्राह्मण पुत्रों के अलावा आगे चलकर दूसरे सवर्ण और पिछड़ी जातियों के बच्चे भी लीलाओं में अभिनेता बनने लगे.

कालांतर में अनेक स्थानों पर दूसरे धर्मावलंबी भी लीला का हिस्सा बन गए. छोटे छोटे गांवों और कस्बों से लेकर बडे बड़े शहरों वाले समूचे देश के अनेक स्थलों में यह सिलसिला अभी भी जारी है. इस तरह देखते-देखते 20 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रामलीलाएं धर्मनिरपेक्ष भारत का सजीव प्रतिनिधित्व करने लगीं. आगरा की रामबरात जो प्रयाग के कुंभ के बाद, एक शहर में, एक रात में होने वाली देश की सबसे बड़ी सांस्कृतिक घटना है, उसमे आज भी बड़ी संख्या में बारातियों से लेकर झांकियों का निर्माण करने और उन्हें लेकर चलने वालों में अनेक धर्मों के लोग होते हैं. विरासतों के अपने इतिहास में ‘यूनेस्को‘ ने भारत की रामलीलाओं को विश्व की सबसे बड़ी बहुजातीय, बहुधर्मी और बहुनस्लीय सांस्कृतिक विरासत का ‘ईवेंट’ माना है.

श्रीराम वैदिक धर्म के सच्चे उपासक माने जाते हैं. उनका चिंतन लेकिन इतना विराट था कि अपनी सेना में उन्होंने न सिर्फ गैर हिन्दू बल्कि गैर मानव नस्लों को भी तरजीह दी. रीछ और वानरों की उनकी विशाल फौजों ने न सिर्फ लंका का किला ध्वस्त किया बल्कि दुराचारी रावण और उसके सहयोगियों का संपूर्ण नाश किया. अपनी शुरूआत से लेकर आज तक देश भर की रामलीलाएं राम के इसी विराट चिंतन का प्रतिनिधित्व करती आईं हैं. मजेदार बात यह है कि गुजरी सदी के 80 के दशक के बाद से जब समूचे देश में धार्मिक उन्माद बढ़ते जा रहे थे, तब बहुत चाहकर भी रामलीलाओं के प्रदर्शनों की ऐतिहासिक परम्परा संर्कीर्ण हिन्दूवादी खांचे में सीमित नहीं की जा सकी. बहुत सारी जगहों पर इन कोशिशों का ऐसे लोगों ने भी जमकर विरोध किया जो बिलानागा सुबह सवेरे घर में या कम्युनिटी स्थलों पर जाकर ‘मानस‘ का पाठ किया करते थे. ऐसे सभी लोग ‘खांटी हिन्दू‘ होने के बावजूद वैचारिक स्तर पर गंगा-जमुनी तहजीब को अपना आदर्श मानते थे. जिस तरह की सांस्कृतिक साझा विरासत आज तक देश भर की रामलीलाएं परोसती आई हैं, ज़रूरत उन्हें और भी सुदृढ़ करने की है. नवरात्रों के उपवासों में तमाम संकल्पों के साथ हम यदि इस साझा विरासत को सुदृढ़ करने का संकल्प भी लेते हैं तो यह राम और विजयदशमी- दोनों के प्रति हमारे सच्चे विश्वास का प्रतीक साबित होगा.

(लेखक वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी और ‘भगत‘ लोकनाट्य् के पुनर्जागरण आंदोलन से जुड़े हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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