बलराज पासी के सिक्खों की पगड़ी पहनने पर विवाद…

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-अयोध्या प्रसाद ‘भारती||

सिखों का एक धड़ा आजकल भाजपा नेता पूर्व सांसद बलराज पासी का पगड़ी का अपमान का आरोप लगाते हुए विरोध कर रहा है. मालूम हो कि विगत दिनों मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में रुद्रपुर आए थे विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलनरत बलराज पासी मुख्यमंत्री का विरोध करने जा रहे थे लेकिन विरोधियों को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम स्थल तक नहीं जाने दे रही थी, तो पासी ने पगड़ी बांधकर भेस बदला था, ताकि पुलिस गच्चा खा जाए. इस पर सिखों का कहना है कि पासी ने पगड़ी का अपमान किया है. सिखों का एक धड़ा पगड़ी के अपमान पर पासी से माफी मांगने की मांग कर रहा है. इस पर सपा जिलाध्यक्ष तजिंदर सिंह विर्क का कहना है कि पूर्व सांसद बलराज पासी का पगड़ी पहनने के मुद्दे को राजनैतिक रंग देने वाले लोग कांग्रेस के एजेंट हैं. प्रेस को जारी बयान में विर्क का कहना है कि जो लोग पासी का पुतला फूंक सौहार्द बिगाड़ने का काम कर रहे हैं वे वेवजह धर्म को राजनीति से घसीटने का काम कर रहे हैं. जनहित में कार्य करने के लिए पगड़ी पहनना कोई गलत बात नहीं है. कहा कि यदि कोई व्यक्ति पगड़ी पहनकर हिम्मत का काम करता है तो यह तो सिख समाज के लिए और भी सम्मान की बात है.balraj pasi

सिखों का दूसरा धड़ा पासी और गदरपुर विधायक अरविंद पांडे को इसी कथित पगड़ी के अपमान पर सम्मानित कर रहा है उनका तर्क है पासी जनहित का काम कर रहे हैं. इस संबंध में कुछ मांगों के बहाने जल्द ही एक बड़ा आयोजन करने की पासी और पांडे ने एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है. धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल पर अक्सर ही विरोध के सुर सुनने को मिलते हैं. दूसरों पर उनके अपमान का आरोप लगाया जाता है. सभी धर्मों के राजनीतिक लोग धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करते आये हैं, पासी ने भेस बदलने मात्र के लिए पगड़ी बांधी थी. वे लोकसभा चुनाव लड़ने के आकांक्षी हैं और जनता का ध्यान आकर्षित करने, प्रचार पाने का हर संभव हथकंडा अपनाना चाहते हैं. व्यापार और राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हर धर्म के लोग कर रहे हैं. नहीं तो क्या कारण है कि जमीन के व्यापार का गलीज धंधा करने वाले अपनी फर्म का नाम ‘नानक प्रॉपर्टीज’, मां दुर्गा प्रॉपर्टी डीलर या और धर्मों के लोग अपने आराध्यों के नाम फर्म के नाम में जोड़ लेते हैं और कहीं कोई विरोध का सुर सुनाई नहीं देता. धर्म की आड़ में लगभग सभी बुरे काम हो रहे हैं. और समाज के लोग देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं. अपने फायदे के लिए समाज का बहुलांश धर्म और धार्मिक प्रतीकों, नामों का उपयोग करता है. हर आदमी को चिंतन करने की जरूरत है कि अपनी जरूरतों और शौक को पूरा करने के लिए उसने कब क्या किया. फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और अनेक मंचीय कार्यक्रमों में कलाकार पगड़ी पहने एक से बढ़कर एक भौंडी प्रस्तुति देते हैं, उनका विरोध क्यों नहीं होता?

1980 के दशक में देश सिख आतंकवादियों से बुरी तरह त्रस्त था. खालिस्तानी आतंकवादी हमलों में हजारों लोग मारे गये और अरबों रुपये की सार्वजनिक और निजी संपत्ति बर्बाद हुई. 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्देश पर ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के अंतर्गत अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में भारतीय फौज घुसी थी, जिसमें खालिस्तानी आतंकवाद के मुखिया जरनैल सिंह भिंडरावाले और कुछ आतंकवादियों को मारा गया. तब खबरों में बताया गया था कि उनके पास से लड़कियां और शराब की बोतलें भी बरामद हुई थीं. फौजी बूट पहन कर स्वर्ण मंदिर में कैसे घुसे इसे लेकर सिख संगठनों ने विरोध जताया और मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला को चेतावनी दी कि वे इसके लिए जिम्मेदार हैं अगर वे सजा नहीं भुगतते तो उन्हें तनखैया (पथ विरोधी) घोषित कर दिया जाएगा. तब बरनाला ने सजा भुगतने के तौर पर जूते आदि साफ किए थे. बरनाला द्वंद्व में थे. एक तरफ राज्य के मुखिया होने के नाते राजधर्म निभाने की जिम्मेदारी थी तो दूसरी ओर अपने धर्म की चिंता.

अगर कुछ सिख पासी के कृत्य को सिख पंथ विरोधी कृत्य मानते हैं तब वे उन सिखों को क्या मांनते हैं जो पासी के समर्थक या सहयोगी हैं. पहले पासी का विरोध कर रहे सिखों को यही तय करना चाहिए. यह भी ईमानदारी से सोचने की जरूरत है कि पासी का उनका विरोध वास्तव में धार्मिक है या राजनीतिक ?

एक चीज नोट करने की है कि मनुष्य स्वभाव से बहुत स्वार्थी और लालची है, वह अपने धर्म की शिक्षाओं, नियमों, मर्यादाओं का पालन वहीं तक करता है जब तक वे स्वार्थ सिद्धि में आढ़े नहीं आती, अन्यथा वह सामान्यतया सारे धार्मिक मूल्य, मर्यादा, नियमों की रोज धज्जियां उड़ाता है. ऐसा सभी धर्मों के लोगों के साथ है और मनुष्य ने अपनी शुरुआत से ही ऐसा किया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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