-आलोक पुराणिक||

एक बहुत भ्रष्ट अफसर का श्राद्ध कराके आया हूं. पिछले साल वह दिवंगत हुए थे.

श्राद्ध पक्ष शुरु होने से पहले भ्रष्ट अफसर पत्नी के सपने में आकर गुहार लगाते थे-डीयर श्राद्ध में पूड़ी-खीर खिलाने भर से काम ना चलेगा,खूब खिलाना, सब कुछ खिलाना.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

दिवंगत अफसर की पत्नी परेशान. क्या खिलायें-मैंने पूछा -दिवंगत किन-किन विभागों में कार्यरत रहे, कमीशन-रिश्वत कितने परसेंट खाते थे.

सब पता करके श्राद्ध पैकेज मैंने बनाया-एक थाली में किताब-कापी आधी फाड़कर, एक आधे टूटे हुए पुल की फोटू, एक टूटी नाली की फोटू, एक बच्चों के खिलौने की जीप का आधा हिस्सा सजाया, खाऊ मंदिर के तौर पर एक स्विस बैंक की फोटू लगायी थाली में.

दिवंगत अफसर शिक्षा विभाग में रहे थे, कापी-किताब खरीद में घोटाला करके पचास परसेंट कमीशन खाया, फिर पीडब्लूडी में रहकर आधा पुल खा गये थे रिश्वत में. नाली भी आधी गड़प की थी उन्होने, जीप खरीद घोटाले में पचास परसेंट कमीशन उन्होने खाया था.

वही उन्हे श्राद्ध में खाने को दिया गया. ओम खा हा, ओम खा हा, करके श्राद्ध संपन्न किया. भ्रष्ट अफसर ने पत्नी के सपने में आकर थैंकू बोला.

साहब ऐसे-ऐसे विकट खाऊ इस धरा पर अवतरित हुए हैं, पूड़ी-खीर से कहां निपटेंगे ये. कुछ नये रचनात्मक श्राद्ध पैकेज लाये जाना जरुरी है.

नेताओं के श्राद्ध में कुछ इस किस्म के पैकेज हो सकते हैं-किसी दिवंगत नेता के श्राद्ध में मोबाइल फोन रखा जाये, गुरु ने टेलीकाम घोटाले में खाया था. किसी दिवंगत नेता के श्राद्ध में थाली में तरह-तरह कोयले सजे हुए हैं, आपने कोयला-खदान में कांड में किये थे.

कोयला प्रतिपदा-कोयला खाऊओं का श्राद्ध, हैलीकाप्टर द्वितीया-हैलीकाप्टर घोटालियों का श्राद्ध, प्याज पंचमी-प्याज के निर्यात-आयात में घोटालियों का श्राद्ध, ऐसा नया श्राद्ध कैलेंडर आ सकता है.

जिसके रिश्वत कांडों के बारे में पक्की जानकारी ना हो, उसका श्राद्ध सर्वपित्री अमावस्या को करा जाये. छोटे-बड़े हर अज्ञात खाऊ का निपटारा इस दिन हो. जिन जजमानों को अपने पुरखों की मृत्यु तिथि के बारे में पक्की आश्वस्ति नहीं होती, उनके पुरखों का श्राद्ध सर्वपित्री अमावस्या के दिन होता है.

नये खाऊ-श्राद्ध कैलेंडर में इसे सर्वखाऊ अमावस्या घोषित किया जा सकता है.

By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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