जीरो परसेंट इंट्रेस्ट स्कीमों पर रोक…

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क्रेडिट कार्ड से टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, कंप्यूटर, मोबाइल खरीदने पर कंपनियों की तरफ से चलाई जा रही ‘जीरो पर्सेट इंट्रेस्टं’ स्कीमो पर रिजर्व बैंक [आरबीआइ] ने रोक लगा दी है. केंद्रीय बैंक का कहना है कि ऐसी स्कीमों की आड़ में ग्राहकों को धोखा दिया जा रहा है, क्योंकि प्रोसेसिंग फीस सहित कुछ अन्य शुल्क तो पहले ही वसूल लिए जाते हैं. इसके साथ ही डेबिट कार्ड से बड़ी खरीदारी करने पर दुकानदारों की तरफ से डेढ़-दो फीसद की अतिरिक्त फीस वसूलने पर भी रोक लगा दी गई है.zero percent emi scheme1

बुधवार को रिजर्व बैंक ने इस बारे में विस्तृत अधिसूचना जारी कर सभी बैंकों को पालन का निर्देश दे दिया है. बैंकों को कहा गया है कि वे क्रेडिट कार्ड के जरिये खरीद पर ब्याज नहीं लेने की कंपनियों की स्कीमों को बंद करें. इन स्कीमों के तहत बेचे गए उत्पाद की राशि को समान मासिक किस्त (छह महीने, नौ महीने या एक वर्ष) में तब्दील कर दिया जाता है. कंपनियों का दावा होता है कि वे इस पर कोई ब्याज नहीं ले रही हैं. लेकिन आरबीआइ का कहना है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. इसकी आड़ में कई बार ग्राहकों को चूना लगा दिया जाता है. मसलन, प्रोसेसिंग शुल्क लिया जाता है.

इसी तरह केंद्रीय बैंक ने डेबिट कार्ड से भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क वसूलने वाले दुकानदारों पर भी सख्ती बरतने का निर्देश बैंकों को दिया है. बैंकों से कहा गया है कि जिन दुकानों में ऐसा किया जाता है वे उनके साथ कारोबारी संपर्क नहीं रखें. इससे आम लोगों को काफी राहत मिलने की संभावना है क्योंकि कई बार उत्पाद के अधिकतम बिक्री मूल्य (एमआरपी) से ज्यादा कीमत अदा करनी पड़ती है.

दुकानों में बड़े इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद की खरीद पर ग्राहकों से एमआरपी से डेढ़-दो फीसद ज्यादा राशि ले ली जाती है. इनका तर्क होता है कि यह राशि उनसे बैंक वसूलता है. अब आरबीआइ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बैंक ऐसी कोई फीस नहीं वसूलते.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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