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अब की दफा कहीं प्याज न हो जाये पूजा के फूल…

By   /  September 24, 2013  /  No Comments

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-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

बंगाल में दुर्गोत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं. पंडाल सारे थीम आधारित हैं. ज्यादातार पूजा अबकी दफा सत्तादल के मंत्रियों और नेताओं से जुड़ी हैं. जाहिर है कि तैयारियों में कोई कमी नहीं है. इस बार पहली दफा पर्यटन के नजरिये से दुर्गोत्सव की मार्केटिंग भी कर रही हैं राज्य सरकार. खास पंडालों में विदेशी पर्यटक भी पूजा आयोजन के हिस्सा बनेंगे.durgapuja

पचास हजार, एक लाख की साड़ियां

बाजारों में धूम है. मंहगाई और मुद्रास्फीति को धता बताते हुए पचास हजार एक लाख रुपये तक की साड़ियों की पूजा और दिवाली के मौसम में खूब बिक्री हो रही है. सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले बोनस और महंगाई भत्ते की पूरी रकम बाजार में खपने के पूरे आसार हैं.

विदेशी अतिथियों के स्वागत के लिए भी चाहिए फूल

उलटी गिनती शुरु हो चुकी है. महालया से लेकर काली पूजा तक बाजारों में रौनक होगी. इस दरम्यान सबसे ज्यादा मांग जाहिर है कि फूलों की रहेगी. बिना फूल आस्था अभिव्यक्त होती नहीं है. विदेशी अतिथियों के स्वागत में भी चाहिए अच्छे किस्म के फूल.फूल चाहिए स्वागत, सजावट के लिए. घरेलू खपत फूलों की बहुत बढ़ चुकी है. अब फूलों को उपहार देने का फैशन है तो फूलों के निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाने की होड़ भी है.बंगाल के फूल उत्पादक त्योहारी मौसम में देशभर में भेजते हैं फूल.जिससे घरेलू बाजार में फूलों की कीमतें आसमान छूने लगी है.

कमल से लिपटी नागिन

बंगाल में हाल में हुई अतिवृष्टि से फूलों की फसल को भी नुकसान हुआ है. जिसकी भरपायी मुश्किल है. बाढ़ के हालात के कारण आपूर्ति कम है. लागत भी बढ़ गयी उत्पादन की. जोखिम और ज्यादा. त्योहारी मौसम में जिस कमल की सबसे ज्यादा मांग होती है, वह पानी में होता है और उसकी पौध से साथ लिपटी रहती हैं जहरीली नागिन. जान पर खेल कर फूल तोड़कर लाते हैं लोग बाजार तक.

कमल और जोबा की सबसे ज्यादा मांग

प्लास्टिक फूलों का अलग बाजार जरूर है लेकिन पूजा के लिए वास्तविक फूल का अलग महत्व है. काली पूजा के लिए जोबा फूल (अढ़ऊल, चाइना रोज) की बिक्री पर नजर है. काली पूजा में मांकाली को कम से कम एक सौ एक जोबा फूल चढ़ाये बिना भक्तों को चैन नहीं आता. प्लास्टिक और कागज के पूलों से सजावट के काम साधे जरुर जा सकते हैं.लेकिन दुर्गोत्सव से लेकर कालीपूजा तक सबसे ज्यादा जरुरी हैं कमल और जोबा फूल.जो इस बार बहुत मंहगे मिलने वाले हैं और आशंका है कि पूजा के फूल अब की कहीं प्याज न हो जाये!

मेदिनीपुर और हावड़ा के फूलों की तो देश विदेश में भारी मांग

बंगाल में पूर्व मेदिनीपुर,कोलाघाट,मेचेदा,पांशकुड़ा और हावड़ा में फूलों की खेती वाणिज्यिक है. दक्षिण और उत्तर 24 परगना से लेकर नदिया और मुर्शिदाबाद से बी फूल आते हैं कोलकाता के पूजा बाजार में. मेदिनीपुर और हावड़ा के फूलों की तो देश विदेश में भारी मांग है.

कंसावती का कहर

कंसावती बांध टूट जाने से कोलागाटौर पांशकुड़ा में फूलों की खेती चौपट है.बंगाल की क्या कहें,इस त्योहार में तो देशभर में हावड़ा और मेदिनीपुर की बारिश और बाढ़ की गूंज फूल बाजार में खूब सुनायी पड़ने वाली है. पांसकुड़ा में बाढ़ के हालात सुधरे तो तमलुक ब्लाक में व्यापक इलाकों में बाढ़ की वजह से फूलों के खेत तबाह हो गये हैं.

खिले नहीं हैं फूल

बंगाल फूल व्यवसायी व किसान समिति के सचिव नारायण नायेक के मुताबिक कोलाघाट और पांशकुड़ा ब्लाकों के जानाबाड़, महतपुर, वृंदावनपुर, रपरमानंदपुर जैसे फूल उत्पादक गांवों में खेतों में फूलों के पौधे सड़ जाने से कहीं फूल खिले ही नहीं हैं. इसी वजह से फूलों के भावों में दोगुमा तिगुमा बढ़ोतरी होने लगी है. त्योहारी मौसम में भावों पर कयास ही लगाये जा सकते हैं.

देशभर में फूलों की खेती कम होने लगी

देश में फूलों का सालाना उत्पादन 1,000 टन का है. अनुमानत: देश में 65,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फूलों का उत्पादन हो रहा है. कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश प्रमुख फूल उत्पादक राज्य हैं. घरेलू बाजार में बूम के साथ फूलों की खेती के तहत भूमि में कमी से भी इसका कारोबार प्रभावित हो रहा है. उन्होंने कहा कि बहुत से ऐसे किसान हैं जो कभी फूलों का उत्पादन करते थे, आज की तारीख में आर्थिक रूप से ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों की ओर रुख कर चुके हैं.

जमीन बेच दी बिल्डरों को

यही नहीं बहुत से फूल उत्पादकों ने अपनी जमीन क्षेत्र के बिल्डरों को बेच दी है. कोलकाता के आसपास तमाम फूल बागान अब आवासीय और बाजार इलाके हैं. कोलकाता के आसपास बीसियों मील तक फूलों की खेती अब नहीं होती.

निर्यात भी बढ़ा है

देश से मुख्य रूप से अमेरिका, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन और इथियोपिया को फूलों का निर्यात होता है. फूलों से जुड़े विशेषज्ञों को भरोसा है कि पिछले एक दशक से पुष्प उद्योग सालाना 10 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है. घरेलू बाजार की मांग पूरी करने के साथ-साथ फूलों के वैश्विक बाजार में भी यह अच्छी तरह अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है. भारतीय फूलों का निर्यात दुनिया की सबसे बड़ी फूल मंडी हॉलैंड को किया जाता है और यहां से इसका पुनर्निर्यात दुनिया के विभिन्न हिस्सों में होता है. वास्तव में फूलों का पारंपरिक वैश्विक केंद्र अब हॉलैंड, अमेरिका और जापान से एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका की ओर चला गया है. चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पुष्प उत्पादक है.

घरेलू खपत बहुत ज्यादा

साथ ही यह दुनिया का इकलौता ऐसा बाजार है जहां घरेलू स्तर पर फूलों का बाजार सबसे तेजी से आगे बढ़ रहा है. इस साल फूलों की बिक्री तीन हजार करोड़ रुपये को छू जाएगी,ऐसी उम्मीद भी है. फूलों के बड़े बाजार बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और चंडीगढ़ में हैं.कई राज्य फूलों के मुख्य उत्पादक जोन के रूप में उभरे हैं. इनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और नई दिल्ली शामिल हैं. तमिलनाडु में जहां फूलों की खेती का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा है वहीं उत्पादकता के मामले में बिहार अव्वल है (हालांकि यह छोटा उत्पादक राज्य है) और इसके बाद हरियाणा का नंबर आता है. कुछ ऐसे भी राज्य हैं, खास तौर से दक्षिणी राज्य, जो उम्दा किस्म के फूलों के उत्पादन में जुटे हुए हैं. इनकी घरेलू और निर्यात बाजार में अच्छी खासी मांग है.

हवाई उड़ान पर फूल

कुछ प्रमुख हवाई अड्डों मसलन नई दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम और कोच्चिं में कोल्ड स्टोर्स व कार्गो की सुविधा उपलब्ध कराई गई है ताकि जल्दी नष्ट होने वाली सामग्री मसलन फूलों को बचाया जा सके. इसके अलावा फूलों की नीलामी के लिए आधुनिक सेंटर बेंगलुरु, कोलकाता, मुंबई और नोएडा में सामने आ रहे हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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