क्या अशोक गहलोत बाबूलाल नागर को बचाने की फ़िराक में है…

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 नौकरी के बदले अस्मत लूट लेने के मामले में राजस्थान सरकार के डेयरी मंत्री बाबूलाल नागर ने हालाँकि यह कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया है कि उनके मंत्री रहते हो रही तफ्तीश को प्रभावित करने का आरोप न लग जाये इसलिए इस्तीफ़ा दे रहे हैं.BABULAL-NAGAR

मगर पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि जिस एडीशनल एसपी वी.के. गौड़ को इस प्रकरण की जाँच सौंपी गई है, वह खुद बाबूलाल नागर के चहेते अफसर रहे हैं और एडीशनल एसपी वी.के. गौड़ की सिफारिशें भी करते रहे हैं. ऐसी स्थिति में यह सवाल उठाना लाजिमी है कि जिस पुलिस अफसर पर बाबूलाल नागर मेहरबान रहे हों, वह पुलिस अधिकारी अपने आका को बचाएगा या जेल जाने देगा?

गौरतलब है कि बाबूलाल नागर पर लगे दुष्कर्म के आरोप की जांच सीआईडी सीबी के एडीशनल एसपी वी.के. गौड़ कर रहे हैं. गौड़ वही अफसर हैं, जिन्हें नागर ने अपनी डिजायर पर दूदू में एडीशनल एसपी लगवाया था. गौड़ मई 2001 से सितंबर 2003 तक दूदू में रहे. उस समय भी अशोक गहलोत की सरकार थी और बाबूलाल नागर दूदू से कांग्रेस विधायक थे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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