दूध मांगा तो खीर देंगे, काश्मीर मांगा तो चीर देंगे…

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भारत, भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद-6

-दीप पाठक||

अगर ओमप्रकाश केजरीवाल साब की बात मानें तो पच्छिम का कहना था “भारत के पास अतीत है, इतिहास नहीं. “यहां तो वाचिक परंपरा थी और इतिहास बोध के नाम पर मिथकों का महिमामंडन था. अगर सर विलियम जोंस के अथक अध्यवसायी प्रयास न होते बंगाल एशियाटिक सोसाइटी द्वारा इतिहास का संरक्षण न किया गया होता तो आज हम मुगल पूर्व की किसी भी सूचना के लिए तरस गये होते”.Sunny-Deol

तिथि तारीखवार राज के कामकाज के लेखे रखना मुगलों का काम था. इनके तो ये हाल थे कि इनके लिए अशोक की लाट भी भीम की गदा थी, दुनियां भर में द्वारकाऐं थी, जगह जगह सीता की रसोइयाँ थी. इंद्र ने ईर्ष्यावश कुछ किलों को नहरों को नष्ट कर दिया था, जगह जगह अर्जुन अपना गांडीव छुपाता फिरता था आदि आदि.

जैमिनी, बादरायण, कणाद जैसे विज्ञ लोग और न्याय, सांख्य, वैषेशिक और कुछ हद तक जैन दर्शन प्रगतिशील थे पर तर्क-विज्ञान आधारित ज्ञान की इस धारा को बजाए प्रयोगों के जरिये आगे बढ़ाने के टंन टंन टंन पूं पूं पूं कर पूजना शुरु कर दिया अर वैज्ञानिक थ्योरम को मंत्र बताकर प्रवचन करने की बेशर्मी अधकरचरी आस्था पद्धति ही कर सकती है.

जब राम मंदिर के बाद भगवा उभार आया तो अब भगवा गमछों का बाजार बढ़ गया, उधर मुसलमानों में भी पहनावों के प्रति चेतना बढ़ी हरे अमामे वाले दिखने लगे. कंधे में रुमाल पठानी सूट, जिसमें मरियल हडियल शरीर वाला मुसलमान भी अपने आप को अफगान का पठान समझता था. वे अरब के पहनावे की नकल करने लगे बसरा और दमिश्क के मुसलमान जैसा दिखने बोलने के नकलची प्रयास करने लगे और कांग्रेसी सेक्यूलर तिरंगा गमछा डालने लगे. कांवड़ियों के लिए तो कपड़ों की भगवा गारमेंट इंडस्ट्री है. बाकायदा रामदेव नुमा लोग तो भगवा ट्रैक सूट मेँ सुबह दौड़ते हैं. बाजार को तो हर चीज मेँ पैसा दिखता है. यही सरमायेदारी का जीवन मंत्र है.

बाकी धरम वाले क्यों पीछे रहते हर शहर में धार्मिक गोलबंदियां होने लगी झांकियां निकलने लगीं बनियों के अग्रसेन महाराज और जैनियों के फलाना ढिमाका मुनि आदि,

एक बार तो दो एकदम नंगे लोग और उनके पीछे चार पांच सौ महिला पुरुषों की भीड़ गाती नारे लगाती आ रही थी. पहले तो समझ नहीं आया कि ये क्या हुआ? क्या जनता ने नेताओं के ये हाल करने शुरु कर दिये? पर बाद में पता चला कि ये तो दिगंबर जैन मुनि पुष्पदंत सागर और उनके साथी मुनि हैं. एक हजार आठ और दस हजार आठ की उनकी बड़ी छोटी उपाधियां थीं. खैर बाद में पता चला उनकी नग्नता बच्चों जैसी पवित्र थी, पर शरीर बड़े थे. बाद में एक जैन मुनि पर यौन शोषण के इल्जाम लगे. ये साब बाकायदा सेविकाओं के मासिक चक्र के कलेंडर सहेज कर रखे थे.

बाबरी मस्जिद कांड के बाद छिछोरा हिंदूवाद समाज के सामने था. मनोज कुमार यानि भारत कुमार के भारतीय सर्वधर्म साफ्ट देशभक्ति के इतर अब सनी देयोल कट खूंखार देशभक्ति की फिल्में आने लगी- “दूध मांगा तो खीर देंगे, कशमीर मांगा तो चीर देंगे.” जैसे डायलाग भाजपा के दीवारु नारे बनने लगे. “सारे लोग सीमा पर सू सू कर दें तो पाकिस्तान बह जायेगा.” डायलाग वाली सनी देयोल की फिल्मों में खूब सीटीयां बजतीं, दांत किटकिटाता. बबासीर में हगते समय विकृत मुंह हो जाता है, ऐसे मुंह वाला हीरो अब खून खच्चर वाला गालीबाज शोहदा बन चुका था.

(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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