हिंदी का खून किया संस्कृत के कठमुल्लाओं ने…

admin 1
0 0
Read Time:3 Minute, 57 Second

भारत, भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद-4

-दीप पाठक||

एक समय फिल्मों में शुद्ध हिंदी के गानों को लिखने की कोशिश बड़े जतन से की गयी, कुछ बन पाए और कुछ हास्यास्पद हो गये. “यक चतुर नार..” हो या “प्रिय प्राणेश्वरी..”. भाषायी बौद्धिक उलटबांसियों का यही हश्र होता है. लोक से चीजें सीखने के बजाए नितांत व्यक्तिगत प्रयोगों का नतीजा आप समझ रहे हैं?hindi-ki-bindi

आजादी के बाद शिशु मंदिरों और हिंदी संस्थानों ने मूल परिष्कृत हिंदी बनाने और जुबान पर चढ़ाने की खूब कोशिश की पर वे भारतेंदु, दिनकर, महादेवी, सुमित्रानंदन, निराला और मुक्तिबोध को कितना समझ पाऐ? आप उनकी संघ-भाजपा की हिंदी देखें तो खुद ही उनकी अधकचरी भाषाई दरिद्रता पर आपको हंसी आयेगी. याद कीजिये पाञ्चजन्य का कालम “ऐसी भाषा कैसी भाषा?”.

सरकारी कामकाज की भाषा में जबसे क्रमश: उर्दू को विस्थापित कर हिंदी को बढ़ाया गया तो कोई भी सरकारी फार्म भरना खानदानी हिंदीभाषी के लिए भी एक आफत हो गयी. फिल्मों से “ताजिराती हिंद दफा फलाना” “कानूनी किताब के पहले सफे पर” जैसे संवाद गायब हुए और जख़्म के नीचे की बिंदी गायब और वो सतही जख्म हो गया. वरना तो आप जानते हैं जख़्म गहरे और बाज दफा जानलेवा भी हुआ करते थे.

भाषा का परिष्कार, गठन, सृजन कामकाजी जनता का मुंह करता है, कोई भाषा संस्थान नहीं करता. पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ‘कृ और ट्र’ न लिख पाने वाले संघ प्रचारकों को ये बात कौन समझाए?

सत्तर से अस्सी के दस सालों में बेहूदे राजैतिक प्रयोग थे और देश के जनमानस में बेहद क्षोभ और संताप था. अस्सी के बाद संजय, इंदिरा, राजीव परिघटना के बाद रहा सहा स्वदेशी तत्व भी खतम हो गया. राजीव गांधी ने एक जंग लगा ताला खोला और जंग लगी खूनीं शमशीरें हिंदुत्व के नये ठेकेदारों ने लपक लीं खुट्टल सांस्कृतिक और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद को खाद पानी मिल गया.

बाकी बची कसर मनमोहन ने आर्थिक उदारता के दरवाजे खोल कर पूरी कर दी. हमें इसी देश में देशी से “नेटिव” बना डाला. कामकाजी आदमी गिरमिटिये मजूर हो गये और ठलुए अगंभीर लंपट सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पथ प्रदर्शक. एक देश का भीतरी और बाहरी तौर पर सांस्कृतिक सत्यानाश करने के लिए और क्या चाहिए?

नेहरु ने कहा था- “कल कारखाने आधुनिक भारत के मंदिर हैं.” आडवानी कह रहा था- “राम मंदिर आधुनिक भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कारखाना है. “और हमें ‘पाश’ की कविता याद आती थी- “ये सब हमारे समय में ही होना था?”.

जब घर का सयाना अशक्त हो जाय तो नालायक उड़ाउ, बेटे झरता पलास्तर संभालने की बजाए बांट-बखरे की सोचते हैं यही देश का हाल था. आधुनिकता की आंधी थी पाउडर नकद और आटा उधार था.

(जारी)

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

One thought on “हिंदी का खून किया संस्कृत के कठमुल्लाओं ने…

  1. pathak ji is lekh mien aap ne kya kahne ki koshish ki kyon aaj kal longo ko likhne ka shouk chada hua hai likhna kya hai pata nahi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

आसाराम का भीलवाड़ा में अवैध कब्ज़ा कर बनाया गया आश्रम धराशायी...

आसाराम के नाबालिग छात्रा के यौन उत्पीड़न मामले में फंसने के बाद आसाराम की मुसीबतें लगातार बढ़ती जा रही हैं. अब विभिन्न राज्यों में आसाराम द्वारा अवैध रूप से ज़मीने कब्ज़ा कर बनाये गए आश्रमों पर भी कानून का ग़ाज़ गिर रही है. अभी उत्तराखंड के आश्रमों की जांच चल […]
Facebook
%d bloggers like this: