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भारत, भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद-भाग-3

-दीप पाठक||

पुरानी फिल्मों मेँ अंत तक खलनायक का चरित्र सुधर जाया करता था और इफ्तिखार टाईप पुलिस आफीसर पुलिस डिपार्टमेंट को एक जिम्मेदार छवि प्रदान करता था. फिल्मों में मुस्लिम चरित्र समरस भाव लिये होते थे और गणित की किताबों सवालों में “माना राम के पास चार आम हैं रजिया के पास दो संतरे और हामिद के पास दो केले हैं रोजी के पास दो अमरुद हैं यानि सवाल में धर्मों का भी प्रतिशत था” ये राष्ट्रीय फ्लेवर का कांग्रेसी ब्रांड राष्ट्रवाद था.Sanjay-Gandhi

समाज में मेले भी थे कुंभ भी था, ईद भी थी, रोजे भी थे पर रोजा अफ्तार पार्टियों का ये जलवा तमाशा न था. गीता प्रेस गोरखपुर की धार्मिक किताबें घर घर थीं. पूरी किताब में मात्र एक रंगीन चित्र होता पर बाहर सचित्र लिखा होता था. व्रत कथाऐं थी पर हिंदी पट्टी के हिंदू में ये आज का सांस्कृतिक राष्ट्रवादी उभार न था, हरे भगवे गमछे अभी गले न पड़े थे और कांवरियों का टिड्डी दल न था. पर नागपुरिया संघी राजनीति अपना काम कर रही थी. हिंदू बहुल क्षेत्रों में मुसलमान पर नहीं बल्कि दलितों के प्रति भेदभाव कायम था.

इमरजेंसी का आतंक, संजय गांधी की स्वेच्छाचारिता, जबरिया नसबंदी का प्रभाव मुसलमानों पर कितना पड़ा ये हमें अधिक नहीं पता पर हिंदूओं पर तो ये तिहरी आफत थी पर हिंदूवादी ताकतें इसमें राष्ट्रहित और अनुसासन ढूंढता था.इसमें उनको हिंदूवादी राजनीति की संभावनाऐं जितनी दिखी थी वे सब इस्तेमाल किये.

नसबंदी के बाद रेडियो भी मिलता था. लोगों को मान मनुहार भय लालच दिखाकर नसबंदी करायी जाती थी मुझे याद है एक आदमी गोविंद बल्लभ ने नसबंदी के बाद मिला रेडियो पटक के फोड़ दिया था जबकि उसमें गाना बज रहा था-झिलमिल सितारों का आंगन होगा,रिमझिम बरसता सावन होग.”तब मुझे पता न चला कि उसने ऐसा क्यों किया पर आज में समझ सकता हूं जबरिया नसबंदी किये आदमी की ये गाना मजाक उड़ता सा लगा होगा.

कथावाचक संत बाबाओं के ये दिन स्ट्रगलिंग के थे. अरबों के साम्राज्य वाले ये बाबा लोग खुद किसी महंत के यहां अप्रेंटिस सेवादार साधक थे और महंत इनसे रगड़ के मेहनत करवाता और ये महंत से मन ही मन खुन्नस खाये अपना अलग स्वतंत्र ठीया बनाने की कवायद में लगे थे.

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बाजार धीरे-धीरे विकसित हो रहा था.

(जारी)

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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