कौन साम्प्रदायिक नहीं है…

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-क़मर वहीद नक़वी||

भारत में कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं है, जो साम्प्रदायिक और जातीय राजनीति न करता हो और वोट बैंक के लिए जिसने तमाम तरह के हथकंडे न अपनाये हों.Indira_Gandhi
काँग्रेस को ही ले लीजिए. पंजाब में पहले अपने राजनीतिक स्वार्थों के चलते काँग्रेस ने भिंडराँवाले को खड़ा क्या, बाद में जब आतंकवाद का नासूर फैल गया तो इंदिरा गाँधी ने उसके विरुद्ध हिन्दुत्ववाद की राजनीति को हवा देनी शुरू की और देश भर में सिखों के विरुद्ध माहौल बनाना शुरू किया. इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद देश भर में भड़के सिख विरोधी दंगे इसी का नतीजा थे क्योंकि उसके पहले कई साल तक देश में सिखों के विरुद्ध हिन्दू जनमानस को भड़काये रखने की राजनीति चलती रही.
उसके बाद उनके पुत्र राजीव गाँधी ने शाहबानो मामले में मुसलिम वोट बैंक के लालच में अपने ही एक मंत्री आरिफ़ मुहम्मद खाँ को अपमानजनक तरीक़े से कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. आरिफ़ खुलेआम शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का समर्थन कर रहे थे. बाद में क़ानून बना कर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को निष्प्रभावी कर दिया गया. इससे हिन्दुओं में बड़ा ग़ुस्सा फैला तो उन्हें बहलाने के लिए राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने की चाल चली गयी और फिर बड़ी धूमधाम से सरकारी संरक्षण में मन्दिर के शिलान्यास का समारोह आयोजित किया गया. तब काँग्रेस के नारायणदत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. लेकिन इस सबका कोई फ़ायदा काँग्रेस को नहीं हुआ और इससे हिन्दुत्ववादी ताक़तों व बीजेपी को जनसमर्थन बढ़ गया. नारायणदत्त तिवारी काँग्रेस के आख़िरी मुख्यमंत्री थे और तभी से काँग्रेस उत्तर प्रदेश में उठ नहीं पायी.

(कमर वहीद नकवी की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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