पत्रकार राजेश वर्मा की मौत कैमरे में कैद, IBN 7 ने वसूली कीमत…

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-जितेन्द्र प्रताप सिंह||
मीडिया के एयर कंडीशन्ड स्टूडियो में भांग पीकर हिस्टीरियाई अंदाज में चिल्लाने वाले दलालों मठाधीशो को ये नहीं भूलना चाहिए कि जिन खबरों को ये मसाला मारकर चाशनी में डुबाकर सारा दिन स्टूडियोज में खेलते रहते हैं और बाकी वक्त किसी महिला एंकर को अपनी आंखों से नापते जोखते रुदालिया करते रहते हैं.वो खबर किसी दूर दराज के स्ट्रिंगर राजेश वर्मा जैसे लोग अपनी जान की बाजी लगाकर लाते हैं..rajesh verma

इन राजेश वर्माओं को नोयडा के आलिशान स्टूडियो में किसी आसाराम की तरह मठाधीश बने राजदीप सरदेसाई या आशुतोष जैसे लोगों की तरह भारी भरकम सैलरी और हर खबर पर नफा नुकसान बताकर राजनीतिक लोगों से वसूली जाने वाली दलाली में हिस्सा नहीं मिलता… उन्हें तो बस उसी खबर पर पैसे मिलते हैं जिसे चैनल टेलीकास्ट करता है ..

ताज्जुब की बात है की जिस चैनल के पत्रकार को दंगाईयों ने खबर कवर करते समय मार डाला वो उस खबर को वो चैनेल सिर्फ एक स्क्राल दिखाकर खत्म कर देता है? सूत्रों में पता चला है कि कैमरामैन ने पत्रकार राजेश वर्मा की मौत के एक-एक पल को अपने कैमरे में कैद किया है, किस तरह मुस्लिम दंगइयों ने उन्हें गोली मारी …लेकिन चर्चा है कि चैनल में मठाधीशो ने उस फुटेज की पूरी कीमत उसे न दिखाने के लिए समाजवादी पार्टी से वसूली है…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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