किराना घराना देने वाला मुजफ्फरनगर मज़हबी सरहदों से ऊपर रहा है…

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मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगे को अपनी अलग निगाह से देखा है पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता तथा चिन्तक मयंक सक्सेना ने अपनी फेसबुक वाल पर..

-मयंक सक्सेना|

13 सदी पुरानी ही बात है…लेकिन उसी दौरान शायद एक दरबारी संगीतज्ञ ध्रुपद की ख़याल गायकी के जन्मदाता गोपाल नायक ने दुनिया की सबसे मशहूर संगीत परम्परा में से एक और भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे अहम घराने, किराना घराने की नींव रखी…लेकिन इससे भी अहम बात जो आज होनी चाहिए, वो ये है कि वो जगह कौन सी थी, जहां ये हुआ…बात करेंगे, उस पर भी बात करेंगे…ख़ैर सुनते जाइए, अगली पीढ़ी थी नायक भन्नू और नायक ढोंढू की…और तीसरी पीढ़ी का किराना घराना पहचाना गया ग़ुलाम अली और ग़ुलाम मौला के नाम से…इनके शिष्य और चौथी पीढ़ी के संगीत के वाहक थे उस्ताद बंदे अली खान…फिर आने वाली पीढ़ी में आए इस घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खान…आपको बताऊं यहीं से इस घराने का नाम पड़ा किराना घराना…लेकिन नाम क्यों पड़ा इस पर तो आगे बात करनी है न…abdulkarim
दुनिया भर में किराना घराने के शास्त्रीय गायक जाने-पहचाने हो गए…संगीत दुनिया को मज़हबों से अलग कर के भी जोड़ रहा था…सुनिएगा ग़ौर से इसकी अगली पीढ़ी में उस्ताद अब्दुल वाहिद खान और सवाई गंधर्व जैसे गायक भी थे, तो सुरश्री केसरबाई और रोशनआरा बेग़म जैसी गायिका भी…अगली पीढ़ी के नामों में से थे Begum Akhtar, Hirabai Badodekar, Gangubhai Hangal, भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी…
ठीक अगली पीढ़ी का शाहकार थे Mohd Rafi
अब मैं नाम गिनाते हुए थक रहा हूं, सीधे मुद्दे पर आ जाता हूं…आपको पता है कि किराना घराने का नाम कैसे पड़ा…कभी मुजफ्फरनगर और शामली में आने वाले एक कस्बे का नाम है कैराना….
उस्ताद अब्दुल करीम खान कैराना के रहने वाले थे…और उसी वजह से इस घराने को किराना घराना कहा गया…
इस घराने की मूल स्थापना एक हिंदुओं जैसे नाम वाले गुरू ने की थी…इसकी औपचारिक स्थापना का श्रेय एक मुस्लिमों जैसे नाम वाले उस्ताद को गया था…इस घराने से हर तरह के नाम वाले गायक और संगीतज्ञ निकले…कभी इस घराने ने संगीत की दीक्षा देने में कोई भेदभाव नहीं किया…सब गुरु भाई और गुरु बहन थे…क्योंकि वो सब जानते थे संगीत दुनिया को जोड़ता है…तोड़ता नहीं…
आपको पता है कि दुनिया भर को किराना घराने का संगीत जोड़ता रहा है…देश भर को भी…
लेकिन आपको पता है न कि इसी इलाके में मज़हब के नाम पर लोग एक दूसरे का ख़ून बहाते चले जा रहे हैं…ये अपील किराना घराने समेत सारे घरानों के संगीतज्ञों से भी है…और मुजफ्फरनगर और शामली के सभी लोगों से भी है…
क्या आप दुनिया को जोड़ने के लिए आगे आएंगे…क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि ये दंगे रुकेंगे…या फिर हम सिर्फ देखते रहेंगे इंसानियत का खून बहते हुए…
मुझे राजनीति और समीकरण से मतलब है लेकिन ज़्यादा मतलब इस बात से है कि ये दंगे रुकने चाहिए…रूहे तामीर को और ज़ख्म खाते क्या आप देख पाएंगे…सच बोलिए क्या देख पाएंगे…आप इंसान हैं या कुछ और हैं…?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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