इतिहास महज सन तारीख नहीं बल्कि एक रंगमंच है…

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भारत, भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद  …2

-दीप पाठक||

सहिष्णुता का दावा करने वाले हिंदूओं की अभी तक मौजूद एक पीढ़ी ने आधी सदी पहले सन् 47 में भयंकर रक्तपात देखा है जिसमें 7 लाख लोग मारे गये थे. श्याम श्वेत मूक फिल्मों में हम रेल में भरे मुसाफिर देखते हैं, जलते घर धुवां आदि दिखते हैं, चूकि श्याम श्वेत फिल्मों में लाल खून नहीं दिखता, जैसे हिंदू धर्म की सहिष्णुता की बातों के पीछे हिंसा नहीं दिखती.PARTITION

कटार छाप मूछों वाले मुचड़े से गरम कोट और गंवार पगड़ी पहने आदमी और सावित्रीबाई नुमा औरत और ब्लैक ऐंड व्हाईट कैमरे लायक बच्चे वाले परिवार की फोटो हमें दिखाती है कि ये परिवार पाकिस्तान से आकर बसे थे. मजे की बात जो भी बंटवारे के बाद भारत आया उसकी तो लग गयी. फिर वो कोई परिवार गरीब नहीँ रहा और जो यहीं रहे वो दलिद्दर ही रहे.

सफेद टोपी लगाये खद्दरधारी कांग्रेसी नेता इन श्याम श्वेत फिल्मों में दिखते हैं तो हमारी पीढ़ी को स्वयमेव श्रद्धा फील होती है पर ये लोग महा रंगीन तबीयत और अय्याश थे. आज हमारी चकाचौंध कैलाइडोस्कोपिक नजर, ग्लेज पेपर पर धधकती पत्रिकाओं अखबारों के दौर मेँ हर ब्लैक ऐंड व्हाईट को सादा और सीधा व श्रद्धेय समझ लेती है. हमारे गाँव की कहावत भी है “अनदेखा चोर मां बाप बराबर”.

इंदिरा गांधी की युवा समय की तस्वीर और नेहरु के वायसराय की पत्नी के किस्से दिमाग में गड्ड मड्ड हो जाते हैं. पल्लू सर पे रखी इसी इंदिरा गांधी और उसका बेटा संजय गांधी राज्य की खुली गुंडागर्दी की मिसाल था. जैसे सद्दाम के बेटे उदै और कुसै के किस्से हम बढ़ा चढ़ा कर सुनते हैं, वैसा ही संजय गांधी भी था पर वो प्लास्टिक के चौड़े ओल्ड फ्रेम वाला चशमा आज तक उसके व्यक्तित्व को भ्रमित करता है.

इमरजेंसी से पूर्व 47 से 69 तक भारत का राजनैतिक समय दर्ज तो है पर सब श्रद्धेय सा ही लगता है पर अब इस ऐतिहासिक समय को वर्चुअल रियलीटी टच देने की जरुरत है ताकि इस श्याम श्वेत समय की पाकीजा कट रंगीनियाँ सामने आ सकें. (तीरे नजर देखेंगे जख़्मे जिगर देखेंगे)

संघ जनसंघ के आज चौराहों पर स्थापित लाखों की मूर्ति वाले धोतीधारी आदर्श जिनके नाम पर चलने वाली योजनाओं में करोड़ों का घपला होता है तब सुदामा जैसी राजनैतिक विवशता और मजबूरी के संत थे अगर राजनैतिक सत्ता रुपी कृष्ण न मिले होते तो इनके लिए समय ही ब्लैक ऐंड व्हाईट होता ये टाइम स्पेस कर्व से इतर संताप की डायमेंशन होती. ये तात्या टोपे और झलकारी बाई के समय से बाहर न आ पाते. प्रमोद महाजन और उसके बेटे राहुल महाजन की मरभुख्खों की तरह अफारा होने तक तमाम आधुनिकता पी लेने के पीछे इनकी अतृप्त इच्छाऐं झांकती हैँ.

संघ जनसंघ से भाजपा और आज की आधुनिक बीजेपी जिसके फनी नारे “चप्पा चप्पा भाजप्पा” टाईप तक आने का इतिहास बड़ा मजेदार है. गीताप्रेस की पुस्तकों से इसको समझने की कोशिश करेंगे और कोशिश करेंगे ये दिखाने की कि इतिहास महज सन तारीख नहीं बल्कि एक रंगमंच है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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