जोधपुर जेल प्रशासन आसाराम प्रकरण में मीडिया को गुमराह कर रहा है…

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जोधपुर जेल प्रशासन मीडिया को गुमराह कर रहा है और मीडिया से कह रहा है कि आसाराम को सामान्य कैदियों की तरह रखा गया जबकि सच्चाई इससे बिलकुल इतर है. मीडिया दरबार के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आसाराम को जोधपुर जेल में वीवीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है. जेल अधीक्षक देवेन्द्र सिंह ने जेल बंद हो जाने के बाद भी जेल खुलवाई और अपने कमरे में आसाराम को बुलवाया तथा उसके आश्रम से आया खाना भी खिलवाया. यही नहीं आसाराम ने जोधपुर जेल के भीतर से अपने पुत्र नारायण साईं और अपने करीबी समर्थकों से टेलीफोन पर भी बातचीत की और कुछ निर्देश दिए. जबकि जेल मेनुअल के अनुसार जेल से बंदी को फोन नहीं करने दिया जा सकता. पर देवेन्द्र भये कोतवाल तो फिर डर काहे का. asram-jail

जेल मेन्युअल के अनुसार जेल का मुख्य दरवाजा हर शाम छह बजे बंद कर दिया जाता है और जेल के तमाम बैरक भी तमाम कैदियों की गिनती कर बंद कर दिए जाते हैं. इसके बाद सिर्फ जेल अधीक्षक किसी आपातकाल के चलते ही जेल के दरवाज़े खुलवा सकता है. मगर आसाराम के साथ ऐसा कौन सा आपातकालिक कारण आ जुड़ा था जो, शाम सात बजे जेल का मुख्य द्वार दुबारा खोला गया.

यही नहीं, नियमों के विपरीत जेल अधीक्षक  ने आसाराम को अपने कमरे में लाकर आसाराम के आश्रम से आया खाना ही खिलवाया बल्कि देर रात तक आसाराम को जेल परिसर स्थित अपने कक्ष में बिठाये रखा गया. जहाँ जेल अधिकारीयों के परिवारजन आसाराम को धोक देते रहे. करीब दो घंटे आसाराम का दरबार जोधपुर जेल अधीक्षक देवेन्द्र सिंह के कमरे में लगा रहा.

आसाराम ने जब देवेन्द्र सिंह से अपने थक जाने की बात कही तो उसे फिर से जेल अस्पताल के एयर कूल्ड वार्ड में पहुंचा दिया गया. जहाँ पहले आसाराम के आश्रम से मंगवाए गए चद्दर और बिस्तर उनके लिए बेड नंबर दो पर लग चुके थे. इसी वार्ड में आसाराम ने अपनी रात गुजारी मगर जेल प्रशासन मीडिया को बता रहा है कि आसाराम को सामान्य कैदियों की तरह रखा गया और रात भर आसाराम को मच्छर काटते रहे.

जेल प्रशासन द्वारा मीडिया को इस तरह गुमराह कर सच्चाई छुपाने से साफ़ ज़ाहिर हो गया है कि जोधपुर जेल के अधीक्षक देवेन्द्र सिंह से आसाराम की कोई बड़ी डील हो गई है, जिसकी अविलम्ब जाँच होनी चाहिए और जाँच अवधि तक जेल अधीक्षक समेत जोधपुर जेल के सभी अधिकारीयों को निलम्बित किया जाना चाहिए ताकि जाँच निष्पक्ष हो. इसी के साथ आसाराम को भी जेल के साधारण बैरेक में भेजना चाहिए.

इसी के साथ इस प्रकरण से यह भी साबित हो गया है कि भारी भरकम खर्च से चलने वाले मीडिया संस्थानों का नेटवर्क कितना कमज़ोर है कि वह जेल के अंदर की वास्तविक खबर भी नहीं निकाल सका.  यही नहीं, इन मीडिया संस्थानों के जोधपुर में मौजूद सभी संवाददाताओं की क़ाबलियत भी सामने आ गई कि कैसे साधारण जेल अधिकारीयों द्वारा दिए गए फीडबैक के आधार पर खबरें प्रसारित कर एक बारगी तो मीडिया के मुंह पर कालिख ही पोत दी और साबित कर दिया कि इन संवाददाताओं को कोई भी मुर्ख बना सकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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