छटनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी मौजूद…

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मीडिया में जारी छटनी और पत्रकारों की समस्याओं को ध्यान में रख आयोजित की गयी पत्रकार एकजुटता मंच (जर्नलिस्ट सोलिडेरिटी फोरम- जेएसएफ) की पब्लिक मीटिंग 31 अगस्त को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में सम्पन्न हुई. इस बैठक में मौजूद वरिष्ठ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओ और वरिष्ठ वकीलों ने मीडिया पर कॉर्पोरेट के बढ़ते प्रभाव और उससे पैदा हो रही समस्याओं पर सबका ध्यान आकर्षित किया. IMG_0105
गौरतलब है की बीती 21 अगस्त को जेएसएफ ने दो समाचार चैनलों सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन-7 से एकमुश्त 320 पत्रकारों की हुई छटनी के विरोध में फिल्मसिटी नोएडा में प्रदर्शन भी किया था. उसी के बाद इस बैठक की रूपरेखा तयार की गयी थी. बैठक में मुख्यतः पत्रकार श्रमजीवी कानून-1955 और मजीठीया आयोग की मांगों को लागू करना, मीडिया इंडस्ट्री में व्याप्त कांट्रैक्ट सिस्टम का विरोध करना, मीडिया क्रॉस होल्डिंग से उपज रहे खतरे, प्रेस कमीशन को मजबूत करना और पत्रकारों के लिए मौजूदा काम के हालात जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई. बैठक की शुरुआत करते हुए जेएसएफ सदस्य और वरिष्ठ मीडिया आलोचक भूपेम सिंह ने कहा कि आज पत्रकारों के पास इतने अधिकार भी नहीं बचे हैं कि वे मालिकों के सामने नौकरी जाने कि हालत में भी किसी तरह का विरोध डेज करा सकें. एक तरफ जहां पत्रकारों कि वर्किंग कंडीशन दिन पर दिन बदतर होती जा रही है वहीं इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए पत्रकारों कि योग्यता या याओग्यता के लिए परीक्षा जैसे सुनियोजित किस्म कि बातें कि जा रहीं है.
बैठक में बतौर वक्ता भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने मीडिया में काम कर रहे सीनियर पत्रकारों कि जमकर खबर ली. उर्मिलेश ने कहा कि छटनी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ये सारे आइकोनिक पत्रकार ही सबसे पहले कन्नी काटते नज़र आते हैं. उर्मिलेश ने मीडिया संस्थानों में यूनियनों को फिर से बहाल करने को लेकर भी ज़ोर दिया. उर्मिलेश ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध पार्लियामेंट कि स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को भी पढ़ने कि सलाह दी. उन्होने कहा कि यह एक संवैधानिक रिपोर्ट है और इसी को आधार बनाकर जेएसएफ पत्रकारों के हक़ कि लड़ाई को आगे ले जा सकता है. वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल ने भी अंबानी परिवार के नब्बे के बाद से मीडिया में बदते आ रहे दखल पर कई महत्वपूर्ण बातें की. उन्होने ऑब्जर्वर समाचार पत्र कि यूनियन का अध्यक्ष होने के अपने अनुभवों को भी साझा किया और इतिहास कि गलतियों से सबक लेने को कहा.
भारतीय जन संचार संस्थान में अध्यापक वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान ने भी जेएसएफ कि इस पहल कि प्रसंशा करते हुए इस मुहिम से अपनी एकजुटता जाहिर की. उन्होनें श्रमजीवी पत्रकार कानून का दायरा बढ़ाने और इसमें संशोधनों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. अभियान से बाकी मीडिया संस्थानों और लोगों को जोड़ने कि सलाह देते हुए आनंद प्रधान ने कहा कि कानून को लागू करने के बाबत राज्य सरकारों द्वारा बरती गयी उपेक्षा पर भी बात कर इस बारे में और जानकारियाँ जुटानी चाहिए. दैनिक भास्कर से जबर्दस्ती निकाले गए पत्रकार जीतेन ने भी अपना अनुभव साझा करते हुए मीडिया में जारी भ्रष्टाचार पर बात करने कि ज़रूरत को रेखांकित किया. भास्कर के जनसम्पर्क विभाग के हेड राज अग्रवाल की बतौर पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ की गयी 11 यात्राओं पर भी उन्होने ही सवाल उठा रहे हैं साथ ही उस पर कानूनी कारवाई कि मुहिम जितनी आगे बढ़ा रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने भी पूरी लड़ाई को सिर्फ छटनी के विरोध पर केन्द्रित न रख उसे आगे अधिकारों की बहाली कि लड़ाई में बदलने कि उम्मीद जताई. उन्होने मीडिया में आवाज़ उठाने वालों को निशाना बनाने जैसी घटनाओं के विरुद्ध भी एकजुट होकर आवाज़ उठाने कि उम्मीद ज़ाहिर की. भाषा ने मीडिया में बढ़ रही राइटविंग कैपिटल के प्रति सचेत रहने कि सलाह दी. वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमरिया ने भी विज्ञापन के बढ़ते प्रभाव और उपभोक्तावाद से प्रभावित मीडिया के असल सवालों से रूबरू होने के लिए पत्रकारों कि एकजुटता को ज़रूरी बताया. वरिष्ठ पत्रकार सुकुमार मुरलीधरन ने भी विज्ञापन इंडस्ट्री की ग्रोथ को आर्थिक वृद्धि की तरह एक बुलबुला बताया और इन छटनियों के पीछे कि असल वजहों पर ध्यान देने कि बात कही. उन्होने क़ानूनों को लागू करने और इसके लिए सरकार पर भी दबाव बढ़ाने के लिए जेएसएफ को प्रेरित किया. वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मीडिया के फाइनेंशियल स्वरूप पर सव्वल उठाते हुए इसे बदले बिना बाकी बातों के व्यर्थ साबित होने पर ज़ोर दिया. प्रशांत ने वैकल्पिक मॉडल कि तरफ ध्यान देने और कई को-ओपरेटिव मॉडलों का उदाहरण देते हुए संभावनाओं को तलाशने कि बात भी कही. वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता ने मुहिम से एकजुटता दिखाते हुए क्रॉस मीडिया ओनरशिप के खिलाफ कड़े कानून बनाने कि मांग पर ज़ोर दिया. उन्होने बिड़ला, अंबानी और ओसवाल के उदाहरण देते हुए साफ किया कि किस तरह ये सब अपने दूसरे व्यवसाओं को मीडिया ओनरशिप से फायदा पहुंचा रहे हैं. नीरा रडिया टेप और कोला घोटाले मे इसकी बानगी देखि जा भी चुकी है. वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजलविस ने अपने वक्तव्य में यह साफ किया कि कांट्रैक्ट पर काम करने वाले पत्रकार असला में कांट्रैक्ट पर काम करने वाले मजदूर ही हैं. लेकिन इसके बावजूद अगर कांट्रैक्ट वाले भी 100 से ज्यादा कर्मचारियों को निकाला जा रहा है तो इससे पहले सरकार से अनुमति लेने ज़रूरी है. यह आपका अधिकार है और जो इन चैनलों में हुआ यह सीधे-सीधे कानून का उलंघन है. बैठक में बड़ी संख्या में छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई. बैठक में वरिष्ठ पत्रकार पंकज बिष्ट, अमित सेन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र रंजन, वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह, दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन कि वरिष्ठ पत्रकार सुजाता माधोक, अतुल चौरसिया, यशवंत सिंह, सुधीर सुमन, बृजेश सिंह, प्रियंका दुबे, उमाकांत लखेड़ा, मनीषा पांडे, मुकेश व्यास, अभिषेक पाराशर आदि लोग मौजूद रहे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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