औपनिवेशक कानूनों का अब तक जारी रहना आखिर क्या दर्शाता है…

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-शैलेन्द्र चौहान||

आजादी के बाद से ही भारतीय लोकतंत्र में लोक की यह अपेक्षा रही है कि यहां के लोगों/नागरिकों को सही सुरक्षा और न्याय मिले. आम भारतीय पर्याप्त लंबे समय से न्यायपालिका और पुलिस जिन्हें औपनिवेशिक व्यवस्था में शासन का अंग माना गया था, दोनों ही संस्थानों से आतंकित और हताश है. आज समाज की संवेदनहीनता के कारण आज दुर्घटना और हिंसक अपराधों के पीड़ित दम तोडते रहते हैं. उनकी सहायता करने से तथाकथित सभ्य लोग कतराते हैं. वह इस कारण नहीं कि हम अमानवीय हैं परन्तु इस उत्पीडन कारी आपराधिक न्याय संस्थान व पुलिस के भय के कारण. भारत के आम नागरिक न्यायपालिका और पुलिस की उस कार्य संस्कृति से पूरी तरह से भयभीत हैं जो उसे औपनिवेशिक युग से विरासत में प्राप्त हुई है. इसलिए वे औरों के दुःख-तकलीफ में असंवेदनशील हैं. आज भी देश के करोड़ों भारतीय नागरिकों को शासन का उपेक्षापूर्ण रवैया और अकूत शक्ति अति भयभीत कर रही हैं.संवेदनहीनता

न्यायपालिका लोकतान्त्रिक मूल्यों को नए ढंग से परिभाषित करने के स्थान पर औपनिवेशिक संस्था की तरह तत्कालीन प्रोटोकोल और परम्पराओं को ही आगे बढ़ा रही है और आम आदमी का संस्थागत न्यायिक विलम्ब के निर्बाध कुचक्र के माध्यम से उसका आर्थिक शोषण कर कर रही है. काले कोट वाले अधिवक्ता और पैरवीकार मात्र हानिकारक भ्रष्टाचार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं, जनता का शोषण कर रहे हैं. यह सब पुलिस, प्रशासन और न्याय तंत्र के औपनिवेशिक नजरिये के कारण ही हो रहा है. औपनिवेशिक काले कानूनों और उनकी भाषा का अब तक जारी रहना करोड़ों भारतीयों के लिए आज भी एक सवाल है अतः भारतीय समाज और समुदाय का लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ टकराव जारी है. इन औपनिवेशिक काले कानूनों के माध्यम से किया जाने वाला तथाकथित न्याय हमारे सामाजिक तानेबाने से नहीं निकला है अपितु वह सत्रहवीं और अठारवीं सदी के यूरोप की उपज है जो कि कानून और न्याय के नाम पर बड़ी संख्या में मानवजाति को गुलाम बनाने की पश्चिमी सामाजिक रणनीति रही है. ये समस्त कानून भारतीयों पर थोपे गए एकतरफा अनुबंध मात्र हैं जो प्रभावशाली लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के सिद्धांत पर राज्य की स्थापना करते हैं. पुलिस की ओर से आनेवाली गोलियों को आज भी विशेष संरक्षण प्राप्त है. भारतीय शासकवर्ग इसे बरकरार रखे हुए है, क्यों ? यह लज्जाजनक है.

दुर्भाग्य यह भी है कि आम लोगों को ऐसी भाषा में न्याय दिया जा रहा है जिसे वे जानते ही नहीं हैं. इंग्लॅण्ड में इतालवी या हिंदी भाषा में न्याय देने का दुस्साहस नहीं किया जा सकता किन्तु भारत में 66 वर्षों से यह सब कुछ जारी है. क्योंकि 2 फरवरी 1835 को थोमस बैबंगटन मैकाले ने यह ईजाद किया था कि हमें एक ऐसा वर्ग तैयार करने का भरसक प्रयास करना है जो हमारे और करोड़ों भारतीयों के बीच अनुवादक का कार्य कर सके जिन पर हम शासन करते रहें – एक ऐसा वर्ग जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो परन्तु विचारों, नैतिकता और रूचि से अंग्रेज हो. आज की भारतीय न्याय व्यवस्था मैकाले के सपनों को साकार करने में ही अपना योग कर रही है. आज भी भारतीय न्याय प्रणाली काले उपनिवेशवादी कानूनों, प्रोटोकोल और परम्पराओं को जारी रखे हुए है जिनमें एक गरीब न्यायार्थी की स्थिति मात्र किसी लाचार गुलाम जैसी होकर रह जाती है. अत्याचारी सत्ता, प्रशासन, पुलिस, जो चाहे अत्याचार कर सकते हैं व निर्भीक होकर हत्याएं करा सकते है. ऐसी सभी मनमानी हत्याओं को एक सुरक्षा के आवरण में ढंक दिया जाता है, जैसा कि ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों में लगातार देखा जा रहा है. अफसोस कि इस अन्याय और अत्याचार को न्याय और कानून के समक्ष समानता और लोकतंत्र कहा जाता है. क्या अब छियासठ वर्ष बाद भी इस बात की आवश्यकता नहीं है इस दूषित आपराधिक पुलिस तंत्र और न्याय व्यवस्था को भारतीयों के सम्मान और अस्मिता का ध्यान में रखते हुए तदनुसार बदल दिया जाये? वे भी स्वतंत्रता का अहसास कर सकें. समानता और लोक तंत्र पर विश्वास कर सकें. लेकिन जब यह सब सायास हो रहा हो तो हम ऐसी उम्मीद भी कैसे कर सकते हैं.

आज इस बात की जरूरत है कि आम भारतीय को सत्य की पहचान करनी चाहिए. इस उपनिवेशवादी-मुकदमेबाजी उद्योग की चक्की में पिसते जाने का उसे भरपूर विरोध करना चाहिए ताकि सम्मानपूर्ण जीवन जिया जा सके. स्वतंत्र भारत के सम्पूर्ण काल का जिक्र करना यहां बेमानी हो जाता है जब मात्र 1990 से लेकर 2007 तक के बीच करीब 17000 हजार आरोपी व्यक्ति, यदि पुलिस की अन्य ज्यादतियों और यातनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो प्रतिदिन औसतन 3 व्यक्ति पुलिस हिरासत में मर जाते हैं और एकाध अपवाद छोड़कर शायद ही किसी पुलिसवाले का बाल भी बांका होता हो. यहाँ तक कि यदि प्रमाण स्वरूप घटना का वीडियो भी उपलब्ध करा दिया जाये तो भी पुलिस का कुछ नहीं बिगडता क्योंकि हमारी आपराधिक राजनीति की तासीर और संस्कृति भी वही है जो अंग्रेज आततायियों की थी. आखिर पुलिस अंग्रेजी शासनकाल से आम भारतीयों के दमन और शोषण का एक अचूक हथियार है. हम यह भलीभांति जानते हैं कि पुलिस कोई स्वायत्त संस्था या इकाई नहीं है उसकी मानसिकता शासक वर्ग की मानसिकता का ही प्रतिरूप है. लेकिन अब बहुत हो चुका, अब हमारी इस विकृत, लोकतंत्र  विरोधी और अनुपयुक्त प्रणाली में तुरंत परिवर्तन करने की महती आवश्यकता है. उन समस्त उपनिवेशवादी काले कानूनों और परम्पराओं की पहचान कर निरस्त किया जाना चाहिए जो वर्ग भेद करते हैं व कानून में विश्वास करने वालों में भय उत्पन्न करने वाली पैशाचिक शक्ति और छवि का प्रदर्शन करते हैं और अपराधियों को प्रेरित-पोषित करते हैं.

आज राष्ट्रद्रोह-कानून को चंद सत्ताधारियों की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता जो अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठने वाले स्वरों को दबाने कुचलने लिए जनविरोधी उपनिवेशवादी कानून का उपयोग करते हों. उन सभी उपनिवेशवादी कानूनों के अंतर्गत संज्ञान लिया जाना बंद होना चाहिए जिनका निर्माण शासक वर्ग द्वारा शोषण और अत्याचारों के विरुद्ध उठने वाले विरोधी स्वरों को दबाने के लिए किया जाता है. विशेषतया दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 46, 129, 144, 197 आदि, और वे सब उधर लिए विशेष कानून जो मुट्ठी भर जनविरोधी सत्ताधारियों ने लोगों की स्वतन्त्रता और समानता छीनने के लिए बनाये हों. एक लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्य के ऐसे पक्षपाती आपराधिक कानून कभी भी लोक की सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकते बल्कि वे विशेष लोगों के हित में ही उपयोग में किये जाते हैं. अब तक औपनिवेशक कानूनों का जारी रहना हमारी शोषक और जनविरोधी मानसिकता का प्रतीक हो सकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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