बेमुहुर्त चौरासी कोसी परिक्रमा से अपने-अपने हित साधने की जुगत…

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उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चौरासी कोसी परिक्रमा को रोकने की कवायद के बाद अभी तक शांति से बिना किसी जानकारी के होती आती परिक्रमा पर भी विवाद के बादल छा गए हैं. अब इसमें कोई दोराय नहीं कि आने वाले समय में रामजन्मभूमि मंदिर की तरह ये यात्रा भी विवादित होकर बंद सी हो जाये. इस पूरे विवाद में सीधे-सीधे दो पक्ष सामने हैं. एक तरफ विहिप, साधू-संत हैं जो यात्रा करने पर अड़े हैं, दूसरी तरफ प्रदेश सरकार है जो परिक्रमा रोकने पर आमादा है. सरकार द्वारा कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए यात्रा रोकने के प्रयास किये गए हैं. प्रयास भी इस तरह से जैसे किसी आतंकी कार्यवाही से निपटने की तैयारी हो. बहरहाल इन दोनों पक्षों को पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना समझने की आवश्यकता है.SANT_SIYASAT_OR_SANGRAM

सरकार सम्बन्धी पक्ष —

पहले तो सरकार का पक्ष देखा जाना चाहिए, जिसने अभी तक पिछले कई वर्षों से जारी इस चौरासी कोसी परिक्रमा में अवरोध पैदा किया है. सरकार ये तो कह रही है कि इस परिक्रमा से कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है पर वो स्पष्ट नहीं करती कि किस तरह? कुछ सौ-दो सौ साधू-संतों की गाते-बजाते, रामधुन गाते यात्रा करने से किस तरह का माहौल बिगड़ता, किस तरह कानून व्यवस्था ध्वस्त होती, कौन से अपराध बढ़ जाते इस बात को किसी भी तरह स्पष्ट नहीं किया गया है. यदि किसी सुरक्षा एजेंसी के हवाले से ऐसी कोई रिपोर्ट आई थी कि इस परिक्रमा से प्रदेश की शांति व्यवस्था को, सुरक्षा को, नागरिकों की जान-माल को खतरा है तो सरकार उस रिपोर्ट को भी सबके सामने रखकर सन्देश को दूर कर सकती थी, पर ऐसा भी नहीं किया गया. पिछली तमाम यात्राओं में भी ऐसा याद नहीं पड़ता कि परिक्रमा लगा रहे साधू-संतों ने कभी भी गैर-हिन्दू धर्मावलम्बियों को आहत किया हो, प्रदेश में अराजकता फैलाई हो, कहीं उत्पात-दंगा जैसे हालात पैदा किये हों. यदि ऐसा कभी हुआ भी था तो सरकार को उसके बारे में भी स्पष्ट रूप से सबके सामने अपना पक्ष रखना चाहिए था.

mulayam with vhpदरअसल प्रदेश की सपा सरकार यादव मतों के साथ-साथ मुस्लिम मतों पर अपनी राजनैतिक नौका पार लगाती है. प्रदेश में अभी तक सपा द्वारा मुस्लिम वर्ग को आश्वासन दिया जाता रहा था कि वो अयोध्या में विवादित परिसर में राममंदिर नहीं बनने देगी, वहां मुस्लिमों को भी अधिकार मिलेगा. (इसका प्रमाण स्वयं मुलायम सिंह द्वारा कारसेवकों पर करवाई गई गोलीबारी की स्वीकारोक्ति से मिलता है.) विगत वर्ष में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा रामजन्मभूमि मामले में दिए गए अपने निर्णय से सपा के हाथ से ये तीर तो निकल चुका था. उसे लग रहा है कि कहीं मुस्लिम मतदाता उसकी झोली से छिटक कर किसी और की झोली में न चला जाये. मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में रोके रखने की योजना के अंतर्गत कभी मुस्लिम आतंकवादियों को जेल से रिहा करने की, मुक़दमे वापस लेने की बात की जाती है, कभी अल्पसंख्यक के नाम पर आरक्षण की राजनीति की जाती है, कभी मुस्लिम नेताओं से आपराधिक मुक़दमे वापस लेने की कवायद की जाती है. सपा सरकार इस परिक्रमा को रोककर विहिप या भाजपा पर निशाना नहीं साध रही है बल्कि मुस्लिम मतदाताओं में विश्वास पैदा कर रही है कि सपा आज भी हरहाल में मुस्लिमों के पक्ष में और भाजपा के विरोध में, हिन्दू के विरोध में है. यात्रा को रोकना कानूनी व्यवस्था, शांति व्यवस्था से अधिक राजनैतिक व्यवस्था से प्रेरित है.

परिक्रमा आयोजकों का पक्ष —

अब यदि इस विवाद का दूसरा पक्ष देखा जाये तो वो विहिप और साधू-संत हैं जो किसी भी कीमत पर अपनी चौरासी कोसी परिक्रमा को शुरू करने पर अड़े हैं. यहाँ भी राजनीति ही स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. यात्रा समर्थकों का कहना है कि वे रामनाम लेते हुए प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी यात्रा करना चाहते हैं, तो इसमें आपत्ति क्यों है? होनी भी नहीं चाहिए पर एक बात इनको भी स्पष्ट करनी होगी कि यात्रा के लिए यही समय क्यों? सूत्र बताते हैं कि पूर्व की कोई यात्रा, परिक्रमा इस समय नहीं की गई (हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद में) फिर वर्तमान में ऐसी जिद किस बात के लिए. वैसे भी हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वर्तमान समय चातुर्मास का होता है जबकि माना जाता है कि भगवान विश्राम की अवस्था में चले जाते हैं. इस समयावधि में किसी भी धार्मिक आयोजन करने की परम्परा हिन्दू रीति-रिवाजों में नहीं रही है. साधू-संतों की, विहिप की मानें कि वे सिर्फ रामधुन गाते हुए, नाचते-गाते परिक्रमा को पूरा करना चाहते हैं, कोई बहुत बड़ा धार्मिक कर्मकांड नहीं है तो फिर ऐसा तो कभी भी किया जा सकता है. यदि विहिप की और तमाम साधू-संतों की इस बात को स्वीकार कर भी लिया जाये कि इस परिक्रमा से मोक्ष मिलता है तो जैसा कि हिन्दू मान्यताओं में वर्णित है कि मुहूर्त के अनुसार किये गए धार्मिक कर्मकांडों से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है. अब ये परिक्रमा ऐसे समय में की जा रही है जबकि भगवान शयन अवस्था में हैं तो इस धार्मिक कृत्य का कोई पुण्य तो मिलने वाला नहीं है. और जब कोई पुण्य ही नहीं मिलना है तो मोक्ष की सम्भावना भी शून्य हो जाती है. ऐसी परिस्थिति में सिवाय विवाद पैदा करने और भविष्य के लिए परिक्रमा को संदेहास्पद बना देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं होने वाला.

दरअसल चुनावी वर्ष को देखते हुए ही विहिप तथा विभिन्न साधू-संतों ने इस परिक्रमा की भूमिका बनाई है. ये सभी को स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि विहिप और साधू-संतों की जमात प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं. ये बात सभी के संज्ञान में है कि नरेन्द्र मोदी के हाथ में चुनाव की कमान आने से हिन्दू मतदाताओं का ध्रुवीकरण हो सकता है, जो भाजपा के लिए लाभकारी है. इसके अलावा कांग्रेस के प्रति देशव्यापी असंतोष भी भाजपा में सत्ता के प्रति आशा की किरण जगा रहा है, वहीं प्रदेश में सपा सरकार के प्रति उपजता जन-असंतोष, उसके शासन में आये दिन होती आपराधिक गतिविधियों ने भी भाजपा को अधिक से अधिक सीटें प्राप्त करने की राह दिखाई है. भाजपा समर्थकों को भी भली-भांति ज्ञात है कि इस यात्रा का होना उतना लाभकारी नहीं होगा जितना कि इस यात्रा का विवादित होना, न होना उनको लाभ देगा. संत समाज, विहिप भले ही यात्रा करने पर आमादा हो पर उसे भी सपा सरकार का वो गोलीकांड भली-भांति याद है और ऐसे में किसी भी तरह की जिद विहिप या संत समाज द्वारा नहीं दिखाई जाएगी. ये बात सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनैतिक स्थिति ही प्रधानमंत्री की राह स्पष्ट करेगी, ऐसे में भाजपा-सपा आदि सहित कोई भी अपनी कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहता है. कहीं न कहीं राजनैतिक लाभ की लालसा से ही विहिप और संत समाज द्वारा परिक्रमा की भूमिका बनाई गई है.

अंतिम सत्य —

पक्ष कुछ भी हो, सत्य कुछ भी हो, राजनीति कुछ भी हो, भले चौरासी कोसी परिक्रमा से प्रदेश का माहौल न बिगड़ रहा हो; भले ही किसी तरह की कानूनी व्यवस्था ध्वस्त न हो रही हो; आपसी भाईचारे में कोई वैमनष्यता न फ़ैल रहा हो पर ये तो स्पष्ट है कि अब इस परिक्रमा को रोकने से, संत समाज के-विहिप के जिद पर अड़ने से प्रदेश में माहौल तनावपूर्ण होगा. अभी तक जितनी सच्चाई सामने आई है उसको देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि किसी मुस्लिम संगठन ने, मजहबी संगठन ने, गैर-हिन्दू धर्मावलम्बी संगठन ने इस परिक्रमा को रोकने की कभी आवाज़ नहीं उठाई थी. अब सपा सरकार द्वारा इस तरह का कदम उठाये जाने के बाद से कहीं न कहीं उन फिरकापरस्त ताकतों को बल मिलेगा जो समाज में हिन्दू-मुस्लिम विवाद को हवा देना चाहते हैं, अराजकता फैलाना चाहते हैं, धर्म के नाम पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण करना चाहते हैं. प्रदेश सरकार को और चौरासी कोसी परिक्रमा आयोजकों को आपसी बातचीत से सुलह का रास्ता निकलना चाहिए था. बेमतलब के विवाद को हवा देने से और नया विवाद खड़ा करने से बचना चाहिए था. मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए किसी दूसरे धर्म की साधारण सी गतिविधि को संदिग्ध बनाकर भविष्य के लिए संकटग्रस्त बनाने से बचना चाहिए था. सरकार को समझना चाहिए कि विवाद से किसी विवाद का समाधान नहीं होता. यात्रा को बलपूर्वक रोककर विवादित बनाने से बेहतर था कि परिक्रमा स्थलों पर ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की जाती कि कोई अराजक तत्त्व प्रदेश का माहौल बिगाड़ ही न पाता. अंतिम सत्य कुछ भी हो पर ये स्पष्ट हो गया कि राजनीतिक लाभ के लिए कुछ भी किया जा सकता है.

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About Post Author

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन। सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य। सम्पर्क - www.kumarendra.com ई-मेल - [email protected] फेसबुक – http://facebook.com/dr.kumarendra, http://facebook.com/rajakumarendra
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