सत्याग्रह अब थिएटर में…

santoshmaurya
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-संतोष मौर्य||

सत्याग्रह पर उसके निर्देशक प्रकाश झा का कहना है कि उन्होंने एक अच्छी फिल्म बनायीं है, वो चाहते हैं की देश का युवा जागे और व्यवस्था परिवर्तन में हिस्सा ले. देखने के बाद भी लगता है की फिल्म एक अच्छा प्रयास है जी भी फिल्म को देखेगा एक बार सोचने पर विवश हो जायेगा कि हम कैसे देश में रहते हैं. सत्याग्रह में सच को दिखाने का प्रयास जरुर किया है प्रकाश जी ने, और वे बहुत हद तक उसमे सफल भी रहे हैं.satyagraha

फिल्म कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के विरुद्ध बढ़ रहे जनाक्रोश को भुनाने का प्रयास भी है और उसे रुपहले परदे पर उतारने का भी काम निर्देशक ने भली भांति किया है. फिल्म में राजनीतिक उठापटक भी अच्छी प्रकार से दिखाई गयी है. फिल्म में यह भलीभांति दिखाया गया है कि कैसे एक आदमी व्यवस्था में सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटता रहता है, और कैसे उससे प्रसाद के रूप में भीख की तरह घूस मांगी जाती है. रिश्वत वो प्रसाद है जिसे खरीदने के लिए सभी को अच्छी अच्छी कीमत चुकानी पड़ती है, चाहे आप कितने बड़े व्यक्ति, प्रतिष्ठित व्यक्ति, वरिस्ट नागरिक क्यूँ न हों पर आपको अपना काम करवाने के लिए घूस तो देनी ही पड़ेगी. फिल्म समाज के पिछड़ेपन, गरीबी और भुखमरी सभी मुद्दों को छूती है. और फिल्म समाज के वैचारिक एवं सामाजिक स्तर दोनों रंगों को व्यावहारिक तरीके से प्रस्तुत करती है.

फिल्म में कई और महत्वपूर्ण बिन्दुओं को अच्छी तरह फिल्माया गया है, जैसे कि कैसे राजनेता अपने निकट सम्बन्धियों को बचाते हैं, इसमें मनोज बाजपेयी का अभिनय प्रसंसनीय है, उन्होंने भ्रष्टाचारी नेता की भूमिका पूरे समर्पण के साथ निभायी है. अजय देवगन ने भी पुरे समर्पण के साथ कार्य किया है और फिल्म में अपने आपको जमाये रखा है, वे एक बड़े व्यापारी की भूमिका पूरे समर्पण से निभाई है और जब वह व्यापारी अपनी पूरी संपत्ति को लात मारकर वापस आता है तब लगता है, शायद भारत की व्यवस्था बदल देगा. वह संपत्ति जो उसने जैसे तैसे बड़ी तिकड़म से कमाई थी, वह उसे अपने सहयोगियों को बाँट देता है. फिल्म में करीना कपूर मीडिया का केंद्र दिखाया गया है, और मीडिया की संदिग्ध भूमिका को भी रेखांकित किया गया है. इसमें दिखाया गया है कि कैसे मीडिया वहीँ भागती है जहाँ उसे भीड़ दिखाई देती है, कैसे पहले एक पत्रकार इस मुद्दे को छोटा जानकर उसे कवर करने से मना कर देती है, फिर फेसबुक पर हजारों लोगों की भीड़ देखकर वो अन्दोलान को कवर करने और टीवी पर दिखाने को दौड़ पड़ती है. अमृता राव भी अच्छा अभिनय करती नजर आयीं हैं, उन्होंने फिल्म में अच्छा अभिनय किया है और साबित किया है कि वो एक अच्छी अभिनेत्री है.

फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण दो भूमिकाएं हैं अमिताभ बच्चन और अर्जुन रामपाल की, इसमें अमिताभ एक मूल्यों के प्रति समर्पित पिता की भूमिका में हैं जो अपने बेटे, अपने समाज, अपने घर में सभी को नैतिक और मूल्यों के प्रति समर्पित देखना चाहता है पर यह तंत्र लगातार उसे तंग करता है कभी पेंशन के लिए तो कभी उसके अपने अधिकारों के लिए.

इसमें दिखाया गया है कि कैसे ईमानदार व्यक्तियों को मौत की भेंट चढ़ा दिया जाता है, उनकी या तो सुपारी दे दी जाती है या फिर ट्रक से कुचलवा दिया जाता है. और उनके माता पिता बच्चे, पत्नी कैसे सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटते रहते हैं उन्हें न्याय नहीं मिलता. फिल्म दिखाती है कि यदि कोई इस कुतंत्र के विर्रुध अपना सुर प्रखर करता है, तो उसकी आवाज को बहुत से प्रपंच और षड़यंत्र रचकर दबा दिया जाता है.

आम आदमी भूखा मरता रहता है और राजनीति चलती रहती रहती है,. अर्जुन सिंह जैसे नेता, जिस भूमिका में अर्जुन रामपाल है जनता का साथ होने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाते. क्यूंकि धन बल के माध्यम से बड़े दलों के नेता आसानी से चुनाव जीत जाते हैं. और मंत्री बन जाते हैं और बाद में जनता को ही दुखी करते हैं. इस फिल्म में अर्जुन रामपाल द्वारा निभाई गयी भूमिका एक आस जगाती है क्यूंकि वह कहता है कि आग पानी कुछ भी हो हम जनता के लिए सदैव तैयार रहते हैं. अंत में यह आन्दोलन भी बिना किसी हल के समाप्त हुआ है सरकार अपने स्वामी अर्थात जनता के निर्देश मानने से मना कर देती है, और एक व्यक्ति आक्रोश में आत्मदाह कर देता है जिसकी शव यात्रा के दौरान दंगे हो जाते हैं. इसी बीच सरकार का मंत्री द्वारका आनंद अर्थात अमिताभ बच्चन को मरवा देता है और आन्दोलन समाप्त हो जाता है. जनांदोलनों का यही हश्र होता है पर इससे लोग जागते है और राष्ट्र में चल रहे विभिन्न घटनाक्रमों पर अपना मत प्रकट करते हैं. शायद यही मंतव्य है इस फिल्म का. फिल्म में एक प्रार्थना भी है जो हमे आगे बढ़ने को प्रेरित करती है –

अब तक धीरज रखा था, प्रभु अब धीरज मत देना

सहते जाएँ सहते जाएँ ऐसा बल भी मत देना

उठकर करने हैं कुछ काम, रघुपति राघव राजाराम

फिल्म का एक उद्देश्य तो साफ़ है कि अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम नहीं करता तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है, तो अगर हमारी सरकार अच्छा काम नहीं करती तो जनता को पूरा अधिकार है की वो ऐसी सरकार को तुरंत निकाल दे. और पूरी फिल्म का एक सर्वश्रेष्ठ संवाद है जब अमिताभ बच्चन ने कलेक्टर से यह कहते हुवे थप्पड़ मारा है कि “नौकर हैं आप हमारे”.

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