मेरे सम्पादक , मेरे संतापक: धीमी आंच के तंदूर नकवी…

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मेरे सम्पादक , मेरे संतापक -28                                              पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

मा – बदे – हुस्नो – मोहब्बत 

ट्रेन के ऐ सी फर्स्ट क्लास कूपे में हमारा दल इलाहबाद को चला. अब तक मेरे पिता सुंदर लाल बहुगुणा के निजी प्राकृतिक चिकित्सक डाक्टर चन्द्र शेखर शर्मा भी हमें ज्वाइन कर चुके थे. कूपे के गेट पर भारी पुलिस बल तैनात था . इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर एस्कोर्ट हमें लेने को प्रस्तुत थी.naqwi

सर्किट हाउस पंहुचते ही डी एम दिलीप कोटिया का फोन आया – कोई दिक्क़त तो नहीं है ? दिलीप मेरे मित्र प्रदीप कोटिया के अग्रज थे. बाद में वह उत्तरांचल कैडर में शिफ्ट होकर देहरादून आकर एक दिन मुझसे अफसर शाही झाड़ने लगे. तुम मुझे भूल गए क्या दिलीप? मैंने चेतावनी दी. इलाहबाद मेरे दो गुरुओं , हेमवती नंदन बहुगुणा तथा फ़िराक गोरखपुरी की पुन्य भूमि थी

अय दोस्त तेरे हाथों में जस

हाथ से धुले सफ़ेद वस्त्र पहने हमने कोर्ट में प्रवेश किया . मई तब तक सदा कपड़े पहनना ही पसंद करता था . यद्यपि मेरे सम्पादक रह चुके कमर वहीद नक़वी मुझे चटक रंग के भड़कीले वस्त्र पहनने को उकसाते . नकवी कम बोलने वाले धीमी आंच के तंदूर हैं. भीतर तक सिकाई कर देते हैं. भड़कीले वस्त्र विन्यास के सिवा उनमें एक मुसलमान होने के कोई लक्षण नहीं हैं. शायद ही कभी मैंने कभी नक़वी को ऊंची आवाज़ में बात करते देखा हो. मैं कई प्रधान मंत्रियों, राष्ट्रपतियों और संपादकों के नजदीक रहा हूँ, लेकिन राजेन्द्र माथुर और नकवी के सिवा मैंने कभी किसी के पांवों को स्पर्श नहीं किया

( जारी )                                          अगली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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