IBN 7 और CNN-IBN में छंटनी के विरोध में कल जुटें…

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-पत्रकारिता और पत्रकारों के सरोकारों के लिए पत्रकार एकजुटता मंचयानी  ‘Journalist Solidarity forum’ का गठन

बुधवार 21 अगस्त को IBN 7 और CNN-IBN के दफ्तर के बाहर होगा 300 से भी अधिक पत्रकारों के निकाले जाने के विरोध में प्रदर्शन

– समय दोपहर 2 बजे, स्थान- IBN 7 और CNN-IBN दफ्तर, फिल्म सिटी, नोएडा सेक्टर-16.

विभिन्न संगठनों का समर्थन
– मालिकों और उनके दलाल संपादकों की मनमानी के पूरजोर विरोध और जनता के सामने उनकी असलियत उजागर करने की योजना

16 अगस्त की सुबह के पहले तक IBN 7 और CNN-IBN से निकाले गए पत्रकारों को नहीं मालूम था कि जिस कंपनी में वे बड़ी शिद्दत से काम करते हैं वे एक झटके में उन्हें निकाल बाहर करेगी. इस ग्रुप में भारी पैमाने पर छंटनी होने की सूचना एक माह पहले से ही छन-छन कर बाहर आ रही थी. लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं थी. यहां काम करने वाले पत्रकारों में अंदेशा जरूर था कि किस-किस को निकाला जाएगा. लेकिन इस बारे में सवाल करने या प्रतिरोध की कोई ध्वनि कहीं नहीं दिख रही थी. और आखिरकार वही हुआ. 16 अगस्त को जब हटाए जाने वाले पत्रकार दफ्तर आए तो मैनेजमेंट और संपादकों की टीम ने उन्हें बुला कर बस इतना कहा कि आप इस्तिफा किस तरह देंगे- इमेल करके या प्रिंट आउट पर हस्ताक्षर करके? कंपनी की टीम ने पहले से ही इन पत्रकारों का इस्तीफ़ा तैयार कर रखा था बस हस्ताक्षर बाकी थे.

Journalist Solidarity forum

मीडिया संस्थानों की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि निकाले जा रहे किसी भी पत्रकार ने कोई सवाल नहीं किया और भारी मन से हस्ताक्षर कर गए. सबमें बस यही डर था कि कहीं उनके बकाए पैसे या रिलैक्शेसन मनी में भी अडंगा न डाल दिया जाए. या यही नौकरी तो जा ही रही है, सवाल करने या प्रतिरोध करने पर कहीं उन्हें टारगेट न कर लिया जाए और बाकी संस्थानों में भी नौकरी न मिले. इस बात से साफ है कि मीडिया संस्थानों में काम कर रहे लोगों की रीढ़ कैसे तोड़ दी गई है. जहां एक सवाल करने की तक कि आज़ादी नहीं उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. इससे पहले भी ऐसा ही होता आ रहा है. पिछले 10 सालों में सुनियोजित तरीके से जबरन इस्तिफ़ा लेकर या बंदी करके हजारों मीडियाकर्मियों को निकाल बाहर कर दिया गया है. टीवी 18 ग्रुप के पहले हाल ही में दैनिक भास्कर ने दिल्ली की एक पूरी टीम को निकालने का फैसला लिया है. पिछले सितंबर में एनडीटीवी से 50 से ज़्यादा पत्रकार, दैनिक भास्कर से 16 पत्रकारों, आउटलुक समूह की तीन पत्रिकाओं (मैरी क्लेयर, पीपुल इंडिया और जियो) के बंद होने से पीड़ित 42 पत्रकार झटके में बेरोज़गार हुए. शारदा ग्रुप के भी करीब 1000 से भी अधिक मीडियाकर्मी बेरोजगार हुए. पूरे देश में फुटकर छंटनी होती ही रहती है. लेकिन कहां से कोई प्रतिरोध का स्वर दिखाई नहीं पड़ता है.

टीवी 18 ग्रुप की इस भारी पैमाने पर करीब 300 से भी अधिक पत्रकारों की छंटनी के बाद भी मालिकों और उनके दलाल संपादकों के खिलाफ कोई आवाज या प्रतिरोध का स्वर दिखाई नहीं पड़ रहा था. मीडिया संस्थानो में पत्रकारों को इस कदर रीढ़ विहीन कर दिया गया है कि किसी प्रकार की सांगठनिक एकजुटता या स्वर बिल्कुल नहीं है. मीडिया के नाम पर बनाए गए तमाम संस्थाएं (मसलन BEA, NBSA, EDITORS GUILD, PRESS COUNCIL) का कोई सरोकार नहीं और ये निष्क्रिय पड़ी रहती हैं. इसमें सरकार और मीडिया मालिकों (पूंजीपतियों) के गठजोड़ ने ही ऐसी स्थिति पैदा की है. से हाल में जरूरी है कि एक प्रतिरोध की संस्कृति को खड़ा करने की कोशिश की जाए. इसी सोच के तहत 17 तारीख की आधी रात को कुछ पत्रकारों ने इस मसले पर बातचीत की आवश्यकता को महसूस करते हुए रविवार यानी कि 18 अगस्त को दोपहर 2 बजे जंतर-मंतर पर पत्रकार बंधुओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सांकेतिक विरोध में जुटने और बातचीत के लिए आमंत्रित किया.

Network 18इस छोटे से समय में ही पहले जंतर-मंतर और फिर कॉफी हाउस में 35 पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्ता जमा हुए और उन्होंने पत्रकारों के अधिकारों के साथ-साथ पत्रकारिता की हालत को बेहतर बनाने की कोशिशों के लिए उनके बीच एकजुटता होने की जरूरत महसूस की. फलस्वरूप पत्रकार एकजुटता मंच यानी  ‘Journalist Solidarity forum’  का गठन किया गाय. इस बैनर तले फिलहाल IBN7 और CNN-IBN के सवाल को उठाने का फ़ैसला किया गया. बुधवार को 2 बजे नोएडा, फ़िल्म सिटी में इनके दफ़्तर के सामने प्रदर्शन तय हुआ है. फिर इसके चार दिनों के बाद एक मीटिंग की जाएगी. इसके अलावा अगले हफ्ते एक पब्लिक मीटिंग की योजना है जिसकी घोषणा इस मीटिंग में की जाएगी. इस मीटिंग में सरोकारी पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आंमत्रित करने की योजना है.

एजेंडे में क्या-क्या… मांग क्या है…

रविवार 18 अगस्त की बैठक में जिन बातों पर सहमति बनी-

-हमारी तत्काल मांग यह है कि IBN 7 और CNN-IBN से निकाले गए पत्रकारों को वापस नौकरी पर रखा जाए.

-देश भर के मीडिया संस्थानों से निकाले जा रहे पत्रकारों का डाटाबेस तैयार करने की योजना है.

– मीडिया के मुद्दों पर लिखने-पढ़ने-बोलने वाले लोगों को इस पहल से जोड़ना.

– मीडिया संस्थानों के भीतर यूनियन बनाने के अधिकार की बहाली.

सभी मीडिया हाउसों में श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए तुरंत वर्किंग जर्नलिस्ट ऐक्ट लागू करें.

– इन तमाम मुद्दों पर संबंधित संस्थानों/विभागों को ज्ञापन सौंपने के अतिरिक्त इन प्रश्नों के साथ छात्र संगठनों के    अलावा PUCL और PUDR जैसे संगठनों को जोड़ना प्रमुख है.

– अलग-अलग मीडिया संस्थाओं (मसलन BEA, NBSA, EDITORS GUILD, PRESS COUNCIL) से भी ऐसे हर मुद्दे पर न सिर्फ़ रायशुमारी की जाएगी बल्कि ऐसे हर मुद्दे पर उनके स्टैंड को लोगों के सामने लाया जाएगा.

 

घाटे का बहाना मालिकों की ओर से उछाला गया धोखा है…

IBN-7 और CNN-IBN से पत्रकारों को निकाले जाने का तर्क जो छन कर बाहर आ रहा है, वह यह है कि कंपनी घाटे में है. जबकि यह सरासर झूठ है. वित्त वर्ष 2012-2013 में टीवी-18 समूह को 165 करोड़ रुपए का सकल लाभ हुआ है जबकि बीते साल यही आंकड़ा 75.9 करोड़ रुपए का ही था. 2005 में 106 करोड़ रुपए वाली कंपनी का राजस्व इस समय 2400.8 करोड़ रुपए है। 24 गुना विस्तार पाने के बाद अगर मालिक (मैनेजमेंट) की तरफ़ से घाटे और कटौती की बात आ रही है तो झूठ और ठगी के अलावा इसे और क्या कहा जा सकता है. दूसरी बात यह कही जा रही है कि ट्राई ने अक्टबूर 2013 से एक घंटे में अधिकतम 10 मिनट व्यावसायिक और 2 मिनट प्रोमोशनल विज्ञापन दिखाने का दिशा-निर्देश दिया है. लिहाजा टीवी चैनल का राजस्व कम हो जाएगा. जबकि यह निर्देश 1994 के कानून के तहत ही है और इस निर्देश की समयसीमा टाल कर सितंबर 2014 कर दिया गया है. लिहाजा इन आधारों पर पत्रकारों को हटाना टीक नहीं है.

यह सिर्फ 350 लोगों को नौकरी से निकाले जाने का मसला नहीं…

यह मुद्दा केवल सीएनएन-आईबीएन के लगभग 350 मीडियाकर्मियों को रातों-रात नौकरी से निकाल दिए जाने का ही नहीं है. बल्कि मीडिया के लोकतांत्रीकरण का मुद्दा है. आम जनता से लेकर सरोकार से जुड़े लोगों, पूंजी और सत्ता के गठजोड़ में पीस रहे दलित-दमित लोगों को पत्रकारिता की वर्तमान हालत और पत्रकारों से हज़ार शिकायतें होंगी. इन में सैकड़ों खोट नजर आती होंगी. जो कि जायज भी होती हैं. लेकिन ये खामियां इसी कारण से हैं क्योंकि मीडिया संस्थान मुनाफे की होड़ में घोर अलोकतांत्रिक बना दी गई हैं. लिहाजा वहां काम कर रहे पत्रकारों की हालत से लेकर उनके द्वारा की जा रही पत्रकारिता में भी विरूपताएं भरी पड़ी हैं. मीडियाकर्मियों की छंटनी को केवल उनके जीवन-यापन के संकट में नहीं देखा जाना चाहिए. यह पूरी पत्रकारिता का संकट है. इन छंटनियों के जरिए पत्रकारों के मनोबल को तोड़ा जा रहा है और असुरक्षा की भावना बढ़ाई जा रही है ताकि वे जन सरोकार भूल कर अपने स्वामित्व के प्रति भी रीढ़विहीन होकर काम करें . पत्रकारों में असुरक्षा की भावना से लेकर मालिकों और दलाल संपादकों की मनमानी इनके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है. ऐसे में मीडिया संस्थानों के लोकतांत्रीकरण के बगैर चीजों को सुधारा नहीं जा सकता. यह सोचना अभी असंभव-सा दिखता हो लेकिन इस मंच की कोशिश इसी ओर जाने का है. समान भागीदारी और प्रतिनिधित्व की बातें तभी संभव हो सकती हैं. हमारा संघर्ष केवल छँटनी के मसले तक सीमित नहीं रहेगा. हमें अनुबंध में मनचाही शर्तें डालकर नौकरी पर रखने की व्यवस्था का भी विरोध करना है. हालांकि अभी हमें अपना ध्यान छंटनी के मुद्दे को उठाना है.

विभिन्न जन-सरोकारी संगठनों का समर्थन…

इस मुहिम में हर तरह से जनसरोकारी व्यक्तियों और समूहों का समर्थन मिल रहा है. Delhi Union Of Journalists (DUJ) और People Uinoin For Democratic Rights (PUDR)  ने इस मुहिम को समर्थन दिया है. साथ ही छात्र संगठनों में जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU), All India Students’ Association ( AISA) , Democratic Students’ Union (DSU), All India Students Federation (AISF), Students For Resistance(SFR) (JNU) ने इस मुहिम में हमें समर्थन दिया है. इन सभी ने बुधवार के प्रदर्शन में आने की हामी भरी है. बाकियों से भी हम संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं.

तो आएं और विरोध दर्ज करें…

पहले कदम के रूप में बुधवार 21 अगस्त को दोपहर 2 बजे IBN 7 और CNN-IBN के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन आयोजित है. इसमें तमाम पत्रकारों, जन-सरोकारी लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सहयोग अपेक्षित है और ऐसे कई लोगों ने आने की सहमित दी है. तो आप आएं और पत्रकारिता के लोकतांत्रीकरण में हमारा सहयोग करें. एक बेहतर समाज के निर्माण में भूमिका निभाएं.

पत्रकार एकजुटता मंच यानी Journalist Solidarity forum’ की ओर से जारी

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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