चौरासी कोसी परिक्रमा पर भी चला सरकारी डंडा…

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-राजीव गुप्ता||

आगामी 25 अगस्त से अयोध्या-क्षेत्र में प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा को उत्तरप्रदेश सरकार ने अनुमति देने से मना कर दिया. जिसके चलते देश भर में  हर जगह उत्तरप्रदेश सरकार के इस रवैये का विरोध हो रहा है. चुनाव के नज़दीक आते-आते शांत रहने वाला अयोध्या एक बार फिर से सियासत की आग की चपेट में आ गया है. उत्तरप्रदेश के प्रमुख गृहसचिव आरएम श्रीवास्तव के अनुसार अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को चैत्र पूर्णिमा से बैशाख पूर्णिमा तक (25 अप्रैल- 20 मई) पारंपरिक तरीके से इस वर्ष में संपन्न करवा दिया गया है तो इसका क्या यह अर्थ लगाया जाय कि अब इस वर्ष कोई भी अयोध्या की चौरासी-कोसी परिक्रमा नही कर सकता ? क्या शासन व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं पर भी नियंत्रण करेगा ? सौभाग्य से मेरा जन्म अयोध्या के चौरासी कोसी परिक्रमा क्षेत्र के समीप ही हुआ है और हम अपनी-अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं के अनुरूप बचपन में वर्ष में दो-तीन बार भी अयोध्या जी की चौरासी-कोसी परिक्रमा करते थे. अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा का अनुष्ठान अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार वर्षभर में कोई भी, कभी भी और कई बार भी कर सकता है. संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता के चलते प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार दिया है और सत्ता की यह जवाबदेही होती है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन न होने दे. इसके लिए ही देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने हेतु केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने अर्द्धसैनिक बलों का गठन किया गया है.chorasi kosi

उत्तरप्रदेश सरकार का यह तर्क गले नही उतरता है कि उसे इस प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा से अगर राज्य में कानून व्यवस्था भंग होने का अन्देशा है. अगर राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने हेतु उसके पास पी.ए.सी के जवान कम पड रहे है तो वह अन्य राज्यों अथवा केन्द्र से अधिक संख्या में अर्द्धसैनिकों की मांग कर सकती है. अगर उत्तरप्रदेश सरकार अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए इस विषय पर स्थानीय स्तर पर ही संभाल लेती तो इस विषय का समाधान वही हो जाता और इसका सीधा असर उसकी छवि पर भी पडता. सरकार के इस रवैये के चलते किसी भी समुदाय के लोगों को किसी भी प्रकार की आपत्ति नही होती साथ ही समाज़-सत्ता के टकराव को भी रोका जा सकता है. परंतु उत्तरप्रदेश सरकार ने ऐसा न करके अब इस विषय को देशव्यापी बनाते हुए इसका राजनीतिकरण कर दिया है. जिसके फलस्वरूप उत्तरप्रदेश सरकार के इस तानाशाही रवैये के चलते देश की कानून-व्यवस्था ही दांव पर लग गई है. अत: अब देश की कानून – व्यवस्था भंग न हो इसके लिए केन्द्र सरकार को अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उत्तरप्रदेश सरकार को यह आश्वासन देते हुए कि उसे पर्याप्त संख्या में अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध करवाये जायेंगे, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जनित उसके इस तनावपूर्ण फैसले पर हस्तक्षेप करते हुए उसे अपने फैसले को वापस लेने के लिये बाध्य करे. ताकि देश में तनाव बढने की बजाय एक सकारात्मक सन्देश जाए.

अगर उत्तर प्रदेश सरकार चौरासी कोसी परिक्रमा को इजाजत दे देती, तो क्या बिगड़ जाता? जिस तरह संतों के साथ वार्ता में सहमति देकर भी मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने आज़म खां के दबाव में आकर संत्तों की यात्रा पर रोक लगायी है, वह संविधान के भी धर्मनिरपेक्ष निर्देशों का उल्लंघन है. एक बार मेरी बात फिर सही साबित हो गयी है कि आज़म खां के आगे मुख्यमंत्री की भी नहीं चलती. आज़म समाजवादी चोले में साम्प्रदायिक व्यक्ति है, उसका मकसद प्रदेश में यात्रा पर पाबन्दी लगवा कर हिन्दू-मुस्लिम फसाद कराना है. अत: यदि मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी का भला चाहते हैं, तो उन्हें आज़म के दबाव से बाहर निकलना होगा. आज़म खां मुसलमानों के नेता हैं, यह भी एक बहुत बड़ी गलत फहमी सपा मुखिया पाले हुए हैं… कँवल भारती

उत्तरप्रदेश सरकार ने विहिप की प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा पर अब तक चली आ रही चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर नई परंपरा डालने का आरोप लगाया. दरअसल इसी विषय पर अपना मत स्पष्ट करने हेतु ही संतो की अगुआई में अशोक सिंहल समेत एक दल मुलायम सिंह यादव से 10 अगस्त को मिला था और मुलायम सिंह यादव ने उन्हे इस चौरासी कोसी परिक्रमा के अनुष्ठान को पूर्ण करने की मौखिक स्वीकृति भी दी थी. वास्तव में यह विवाद बारबंकी के टिकैतपुर से लेकर गोंडा तक के कुछ किमी. तक नये मार्ग को लेकर है. ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान समय में सरयू नदी का जलस्तर बढ जाता है जिससे सरयू नदी को नाव की सहायता से पार करना संभव नही है. इसलिये विहिप ने एक विकल्प के रूप में नया मार्ग चुना. अगर उत्तरप्रदेश सरकार को विहिप के इस वैकल्पिक नये मार्ग से कुछ परेशानी है तो इस बारे में विहिप ने लचीला रूख अपनाया है. उत्तरप्रदेश सरकार को बजाय चौरासी कोसी परिक्रमा रोकने के विहिप को संवाद हेतु आमंत्रित कर इस समस्या का हल ढूंढना चाहिए.

अगर यह टकराव जल्दी ही नही खत्म नही हुआ तो अयोध्या की इस चौरासी कोसी परिक्रमा का भी राजनीतिकरण होना तय है. जिसका असर आने वाले चुनावों पर भी पडेगा. उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उठाये गये इस तानाशाही कदम से विशुद्ध रूप से राजनैतिक कदम है क्योंकि इस टकराहट से हिन्दू और मुस्लिम वोंटो का जबरदस्त ध्रुवीकरण होगा. जिसका लाभ भाजपा और सपा दोनो ही दल उठायेंगे. भाजपा बहुसंख्यंको को रिझाने का प्रयास करेगी और सपा अल्पसंख्यकों पर डोरे डालेगी. इससे पहले भी अयोध्या का राजनीतिकरण हो चुका है. ध्यान देने योग्य है कि मुलायम सिंह यादव जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन्होने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था तबसे लेकर आजतक बहुसंख्यक समाज मुलायम के साथ मन से नही जुड पाया है. लोग कुछ इसी तरह भाजपा पर भी विश्वासघात का आरोप लगाते है. वे तर्क देते है कि भाजपा राममन्दिर निर्माण के मुद्दे पर ही सत्ता में आयी थी और सत्ता में आते ही उसने सबसे पहले अपने एजेंडे में से राममन्दिर-निर्माण के मुद्दे को ही निकाल दिया. यहाँ यह स्पष्ट होना चाहिए कि भाजपा के एजेंडे में आज भी राममन्दिर – निर्माण का विषय है. अटल जी की अगुआई में सरकार एनडीए की बनी थी न कि भाजपा की. भाजपा ने देश को स्थायी सरकार देने हेतु ही एनडीए का गठन किया था. एनडीए गठन के समय यह तय किया गया था कि अगर विवादित विषय धारा 370, राम-मन्दिर निर्माण जैसे विषयों को अलग कर दिया जाय तो देश को एक स्थायी सरकार मिल सकती है. इसी को ध्यान रखते हुए भाजपा ने सभी विषयों को यथावत अपने एजेंडे मे ही रखा और एनडीए के एजेंडे में से सभी विवादित विषयों को हटा दिया था. जिसके चलते लोग आज भी भाजपा पर विश्वासघात का आरोप लगाते है. अयोध्या में राममन्दिर निर्माण का विषय इस समय देश की सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है. अत: आस्था के इस विषय पर राजनीति करने का अधिकार किसी भी राजनैतिक दल को नही है. राममन्दिर निर्माण के नाम पर देश का ध्यान भटकाने की अपेक्षा उत्तरप्रदेश सरकार जल्दी से जल्दी अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा पर अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे. क्योंकि समाज-सत्ता का टकराव किसी भी सूरत में देश-हित के लिए ठीक नही होता और दोनो पक्षों को टकराव की बजाय आपस में संवाद कर  इस समस्या का हल  निकालना चाहिये.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “चौरासी कोसी परिक्रमा पर भी चला सरकारी डंडा…

  1. सांप्रदायिक लोगों की सांप्रदायिक सरकारे जिनमें आजम खान जैसे लोग और आ जाये तो उनसे और अधिक उम्मीद क्या की जा सकती है.आजम खान जैसे अपराधी लोगों को नेता बन अपनी बात बनवाने के लिए मुलायम जैसे सिधान्त विहीन,सत्तालोलूपजाती आधारित राजनीती करने वाले तथाकथित जन तांत्रिक लोग ही मिलते हैं जो पुरे देश की छवि बिगड़ देते हैं.आज उअदि आजम खान को अकेला छोड़ दिया जाये तो उनका मुहं देखने वाला कोई बंदा नहीं मिलेगा. पर हमारा ,यू पी का दुर्भाग्य है की हम ही नाकाबिलों की तरह ऐसे लोगों को वोट देकर तव्जय प्रदान करते हैं.

  2. सांप्रदायिक लोगों की सांप्रदायिक सरकारे जिनमें आजम खान जैसे लोग और आ जाये तो उनसे और अधिक उम्मीद क्या की जा सकती है.आजम खान जैसे अपराधी लोगों को नेता बन अपनी बात बनवाने के लिए मुलायम जैसे सिधान्त विहीन,सत्तालोलूपजाती आधारित राजनीती करने वाले तथाकथित जन तांत्रिक लोग ही मिलते हैं जो पुरे देश की छवि बिगड़ देते हैं.आज उअदि आजम खान को अकेला छोड़ दिया जाये तो उनका मुहं देखने वाला कोई बंदा नहीं मिलेगा. पर हमारा ,यू पी का दुर्भाग्य है की हम ही नाकाबिलों की तरह ऐसे लोगों को वोट देकर तव्जय प्रदान करते हैं.

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