भारत पाक विभाजन की पीड़ा नासूर बन पस उगल रही है…

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-सिकंदर शेख||

आज सुबह के समय जैसलमेर में पाक विस्थापितों की भील बस्ती की रेशमा के घर में चुल्हा जल रहा है. रेशमा अपने परिवार के पेट की भूख मिटाने की तैयारी कर रही है साथ ही में उसका छोटा बेटा उसके साथ खेल रहा है. आँखों में एक सूनापन साफ़ देखा जा सकता है कि वो किसी अपने का इंतज़ार कर रही है.Reshma

चूल्हे पर रोटियाँ बनाती रेशमा को जलती लकड़ी के धुंए से नहीं वरन अपनी आत्मा के अन्दर की जलन से उठी हुक के धुंए से आँखों में जलन हो रही है. आज के दिन अपने भाइयों के इंतज़ार में अपनी आँखें पथराये बैठी रेशमा का पूरा परिवार पकिस्तान में रहता है लेकिन सीमाओं के पहरे की वजह से पिछले कई सालों से इनका मिलना नहीं हुआ. रेशमा के भाइयों की कलाई हर साल आज ही के दिन रेशमा का इंतज़ार कर रही है.

ये इंतज़ार कब ख़त्म होगा, ये तो वक़्त ही बताएगा मगर भारत पाक बॉर्डर पर रहने वाले लोगों को विभाजन के साथ ही ये तो पता था कि हम लोग अलग हो रहे हैं मगर ये नहीं पता था कि इतने अलग हो जायेंगे की सूरत देखने को तरस जायेंगे,

हुक्मरानों के तालूकात पर निर्भर रहने वाले ये दिलों के रिश्ते, आज आंसूं बहा रहे हैं, सरकार के कड़े वीसा नियमों से सरहद तो मजबूत हो रही है मगर दिलों के रिश्ते तार तार हो रहे हैं ,,,

जैसलमेर में बसे भील परिवारों में ये केवल एक उदाहरण नहीं है जो अपने भाईयों के लिये आंसू बहा रही है. इसी बस्ती के नाथूराम भील की कहानी भी ऐसी ही है जिसकी बहिन की शादी पाकिस्तान में की हुई है और वीजा और अन्य अनुमतियों के पचडे के चलते न तो ये भाई पिछले कई वर्षों से अपनी बहिन से मिल पाये है और न ही वो बहिन अपने भाईयों के पास भारत आ पाई है. ऐसे में रक्षा के बंधन के त्यौहार पर बहिन की तस्वीर देख कर आंखे नम करते भाईयों के लिये यह त्यौहार किसी पीड़ा से कम नहीं है.

रंग बिरंगी राखियों से सजी कलाईयां देख कर बचपन की यादों के सहारे इस त्यौहार को मनाने को मजबूर ये परिवार ही असल में पीड़ा भोग रहे हैं. सीमाओं पर खींची दरारों की ओर उम्मीद भरी नजर से ताक रहे हैं कि कोई तो दिन ऐसा अवश्य ही आयेगा जब ये दरारें भरेंगी और प्यार के रंग इन सीमाओं पर भारी पडेंगे और भाई बहिनों से व बहिनें भाईयों बेखौफ मिल सकेंगी और त्यौहारों के रंग इनकी दुनियां में भी खुशियां बिखेरने वाले हो सकेंगे.

त्यौहार रिश्तों की खूबसूरती को बनाये रखने का एक बहाना होते हैं. यूं तो हर रिश्ते की अपनी एक महकती पहचान होती है लेकिन भाई बहिन का रिश्ता एक भावुक अहसास होता है जिस पर रक्षाबंधन के त्यौहार के छींटे पडते ही एक ऐसी सौंधी सुगंधित बयार लाता है जो मन के साथ साथ पोर पोर को महका देती है लेकिन भील बस्ती के इन परिवारों की पीड़ा देख कर ये शब्द बेकार से लगते हैं जहां भाई बहिन के प्यार पर सीमाओं का पहरा लगा है और मजबूर है ये भाई और बहिन राखी पर राखी बांधने व बंधवाने के लिये सीमा पार बसे  भाई बहिनों से.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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