देश में जितना “आम आदमी” का शोषण, मीडिया में उतनी ही “आम पत्रकार” की दुर्गति…

admin 3
0 0
Read Time:6 Minute, 3 Second

-अभिरंजन कुमार||

हम मीडिया वाले समूची दुनिया के शोषण के ख़िलाफ़ तो आवाज़ उठाते हैं, लेकिन अपने ही लोगों पर बड़े से बड़ा पहाड़ टूट जाने पर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है.Anuaranjan Kumar

-टीवी 18 ग्रुप में इतनी बड़ी संख्या में पत्रकारों की छंटनी के बाद भी प्रतिरोध के स्वर छिटपुट हैं और वो भी ऐसे, जिनसे कुछ बदलने वाला नहीं है. कई मित्रों से बात हुई. वे कहते हैं कि अब दूसरा कोई काम करेंगे, लेकिन मीडिया में नहीं रहेंगे.

-पहले भी एनडीटीवी समेत कई बड़े चैनलों में छंटनी के कई दौर चले. कहीं से कोई आवाज़ नहीं उठी.

-वॉयस ऑफ इंडिया जैसे कितने चैनल खुले और बंद हो गए. कई साथियों का पैसा संभवत: अब तक अटका है.

-ज़्यादातर चैनलों में “स्ट्रिंगरों” का पैसा मार लेना तो फ़ैशन ही बन गया है. दुर्भाग्य यह है कि “स्ट्रिंगरों” के लिए कोई आवाज़ भी नहीं उठाता, जबकि वे मीडिया में सबसे पिछली कतार में खड़े हमारे वे भाई-बंधु हैं, जो देश के कोने-कोने से हमें रिपोर्ट्स लाकर देते हैं और पूंजीपतियों का मीडिया उन्हें प्रति स्टोरी भुगतान करता है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कई चैनलों में हमारे स्ट्रिंगर भाइयों को एक-एक डेढ़-डेढ़ साल से पैसा नहीं मिला है.

-पिछले कुछ साल में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कई चैनल अपने पत्रकारों से दिहाड़ी मज़दूरों से भी घटिया बर्ताव करते हैं. अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो उसकी सैलरी काट लेंगे. अगर किसी का एक्सीडेंट हो जाए, तो बिस्तर पर पड़े रहने की अवधि की सैलरी काट लेंगे. यानी जिन दिनों आपको सैलरी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, उन दिनों की सैलरी आपको नहीं मिलेगी. न कोई छुट्टी, न पीएफ, न ग्रेच्युटी, न किसी किस्म की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा.

-कई पत्रकारों की सैलरी मनरेगा मज़दूरों से भी कम है. बिहार में इस वक्त मनरेगा मज़दूर को 162 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जो 30 दिन के 4860 रुपये बनते हैं, लेकिन सभी चैनलों में आपको 3,000 रुपये महीना पाकर काम करने वाले पत्रकार मिल जाएंगे. इस 3,000 रुपये में भी उतने दिन की सैलरी काट ली जाती है, जितने दिन किसी भी वजह से वे काम नहीं करते हैं.

-मज़दूरों का शोषण बहुत है, फिर भी फ्री में काम करने वाला एक भी मज़दूर मैंने आज तक नहीं देखा. यहां तक कि अगर कोई नौसिखिया मज़दूर या बाल मज़दूर (बाल मज़दूरी अनैतिक और ग़ैरक़ानूनी है) भी है, तो भी उसे कुछ न कुछ पैसा ज़रूर मिलता है, लेकिन आपको कई मीडिया संस्थानों में ऐसे पत्रकार मिल जाएंगे, जो इंटर्नशिप के नाम पर छह-छह महीने से फ्री में काम कर रहे हैं. कई चैनलों ने तो यह फैशन ही बना लिया है कि फ्री के इंटर्न रखो और अपने बाकी कानूनी-ग़ैरकानूनी धंधों के सुरक्षा-कवच के तौर पर एक चलताऊ किस्म का चैनल चलाते रहो.

-कई चैनलों की समूची फंक्शनिंग इल्लीगल है. ये कर्मचारियों का पीएफ और टीडीएस काटते तो हैं, लेकिन संबंधित विभागों में जमा नहीं कराते. पूरा गोलमाल है और इन्हें कोई कुछ करता भी नहीं, क्योंकि ये मीडिया हाउस जो चलाते हैं! इनसे कौन पंगा लेगा?

-एक तरफ़ सरकारी मीडिया है, दूसरी तरफ़ पूंजीपतियों का मीडिया. आम पत्रकार के लिए कोई रास्ता नहीं. आगे कुआं, पीछे खाई. ज़ाहिर है, जैसे इस देश में हर जगह “आम आदमी” का शोषण है, वैसे ही हमारे मीडिया में “आम पत्रकार” की दुर्गति है.

-हालात ऐसे हैं कि हर पत्रकार अपनी जगह बचाने में जुटा है. भले ही इसके लिए किसी साथी पत्रकार की बलि क्यों न देनी पड़े.

-जनजागरण में मीडिया की ज़बर्दस्त भूमिका है और कभी-कभी लगता है कि आज की तारीख़ में इससे ज़्यादा पावरफुल कोई और नहीं. मीडिया चाहे तो देश के हुक्मरानों को घुटनों के बल ला खड़ा करे. पूरे देश का मीडिया एकजुट हो जाए, तो देश के हालात आज के आज बदल सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया एक गंदे धंधे में तब्दील होता जा रहा है.

ज़रा सोचिए, हम जो अपने लिए आवाज़ नहीं उठा सकते, वे दूसरों के लिए क्या कर सकते हैं? क्या नपुंसक मीडियाकर्मी इस देश को पुरुषार्थी बनाने के लिए संघर्ष करेंगे? देश के नागरिकों को न सिर्फ़ सियासत की सफ़ाई के लिए लामबंद होना है, बल्कि मीडिया की सफ़ाई के लिए भी आवाज़ उठाना होगा. क्या आप इसके लिए तैयार हैं?

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments
No tags for this post.

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

3 thoughts on “देश में जितना “आम आदमी” का शोषण, मीडिया में उतनी ही “आम पत्रकार” की दुर्गति…

  1. जब लम्बी कतारें होंगी रोजगार के लिए तो यही हाल होना है.पढ़े लिखे लोगों का बेरोजगारी इस स्तिथ्ती को बताती है कि सरकार सस्ता गेहूं चावल बाँट केवल लोगों को निकम्मेपम तथा अपराधी बनने का प्रमाणपत्र बाँट रही है,बजाय कि रोजगार के अवसर पैदा करती.अब तक गरीबी हटाओ का नारा दे कर चुनाव जीतती रहीं, और अब खाद्य सुरक्षा कि गारंटी दे कर.असली समस्यों से सर छिपाना अब तक सभी दलों की शुतुरमुर्गी चाल रही है,जो संकट आने पर जमीन में मुहं छिपा उसके जाने का इंतजार करता है.यह हालत पत्रकारिता ही नहीं सभी व्यवसायों में पसरी है.

  2. सच जो बोला पागल कहलाऊंगा
    झूठ निरा बोला है अब तक सहा नहीं जाऊंगा
    पत्रकार बनने की सोची किसने थी
    कलम गहूं हाथ किस्मत फूटी थी
    वो सडक घिर गयी थी
    नाले पर चेयरमेन की दूकान बन रही थी
    बश अड्डे का गेट घिर गया था
    स्कूल मवेशी की जगह लिख गई थी
    डकेती पडी चोरी लिखी गयी थी
    फीस नहीं देने पर वह परीक्षा नहीं दे सकी थी
    निगोड़ी इतनी सुन्दर थी
    की टीचर के मन को भा गयी थी
    गान के जाती विशेष की दादागीरी बढ़ गई थी
    खेत सूख रहे थे …
    सड़कें जगह छोड़ रहीं थीं
    नदियाँ रिश्ते नाते बहन वेटियों
    को न आने दे रही थीं
    पुलों की मांग थी
    डकेत खुले आम विचरण
    व्यापारी पलायत हो रहे थे
    और तो और गाँव का हों हार लड़का
    काम के अभाव में दिल्ली जा रहा था
    मैं नाली डाक्टरी की डिग्री लेने को तैयार नहीं था
    मिशन पर निकल पडा …..
    क्या नहीं झेला ….१० साल की यात्रा का फल था
    कूल्हा टूट चुका था
    मरने से वाचा था …ऊपर से
    फर्जी एस सी एक्ट …..
    से घर के बिजली के बिल का पैसा अदा कर वच सका था ….
    तीन साल में अमर का चार साल में साज का भास्कर की तरह
    उदय हुआ था
    एकबार फिर बड़े घर एटा में दो साल
    मिसन के तहत …
    हूँ आज तक आहत ….
    क्या कहूँ
    मिशन छूट चुका है …
    कलम छोड़ चुका हूँ
    मनरेगा
    सर्व शिक्षा
    मिड दे मील पर
    बहुत कुछ बक चुका हूँ …
    आदमी हूँ नहीं अब वोट बन चुका हूँ

  3. सच जो बोला पागल कहलाऊंगा.
    झूठ निरा बोला है अब तक सहा नहीं जाऊंगा.
    पत्रकार बनने की सोची किसने थी.
    कलम गहूं हाथ किस्मत फूटी थी.
    वो सडक घिर गयी थी.
    नाले पर चेयरमेन की दूकान बन रही थी.
    बश अड्डे का गेट घिर गया था.
    स्कूल मवेशी की जगह लिख गई थी.
    डकेती पडी चोरी लिखी गयी थी.
    फीस नहीं देने पर वह परीक्षा नहीं दे सकी थी.
    निगोड़ी इतनी सुन्दर थी.
    की टीचर के मन को भा गयी थी.
    गान के जाती विशेष की दादागीरी बढ़ गई थी.
    खेत सूख रहे थे…
    सड़कें जगह छोड़ रहीं थीं.
    नदियाँ रिश्ते नाते बहन वेटियों.
    को न आने दे रही थीं.
    पुलों की मांग थी.
    डकेत खुले आम विचरण.
    व्यापारी पलायत हो रहे थे.
    और तो और गाँव का हों हार लड़का.
    काम के अभाव में दिल्ली जा रहा था.
    मैं नाली डाक्टरी की डिग्री लेने को तैयार नहीं था.
    मिशन पर निकल पडा…..
    क्या नहीं झेला….१० साल की यात्रा का फल था.
    कूल्हा टूट चुका था.
    मरने से वाचा था…ऊपर से.
    फर्जी एस सी एक्ट…..
    से घर के बिजली के बिल का पैसा अदा कर वच सका था….
    तीन साल में अमर का चार साल में साज का भास्कर की तरह.
    उदय हुआ था.
    एकबार फिर बड़े घर एटा में दो साल.
    मिसन के तहत…
    हूँ आज तक आहात….
    क्या कहूँ
    मिशन छूट चुका है…
    कलम छोड़ चुका हूँ.
    मंनरेगा
    सर्व शिक्षा
    मेड दे मील पर.
    बहुत कुछ बक चुका हूँ…
    आदमी हूँ नहीं अब वोट बन चुका हूँ.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

रोबर्ट वाड्रा हफ्ता वसूलते हैं: अशोक खेमका

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े गुडग़ांव के विवादित जमीन करार मामले में हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने रविवार को कहा कि सच्चाई को सामने लाने के लिये आपराधिक जांच की जरूरत है. एक टीवी न्यूज चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा, ”यदि आपको […]
Facebook
%d bloggers like this: