मेरे संपादक, मेरे संतापक: एक भयावह प्रसंग…

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मेरे संपादक, मेरे संतापक – 17                                                             पिछली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा|| 

बार – बार बिजली जाती और रूम हीटर बंद होने से कूल कूल हुए जा रहे नीरज ने मुझसे पूछा – आखिर तुम लोग टिहरी बाँध बनने क्यों नहीं देते यार? उन्हें इस बाँध से मिलने वाली ऊर्जा और उजाले के पीछे निहित अँधेरे और धुंए का गणित समझाया तो मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत कवि कन्वींस हो गया – ओह ये बात है, फिर तो सर्दी गरमी झेल लेंगे यार. मुझे तब तक एहसास नहीं था की इस बाँध के विरोध का संघर्ष भविष्य में हमें एक आग के दरिया से गुज़ारने वाला है.Shri-Sunder-Lal-Bahuguna

१९९५ में जून महीने की एक आधी रात के बाद मैं, उच्च न्यायालय के वक़ील सुधांशु धुलिया और टिहरी के कांग्रेस नेता कीर्ति सिंह नेगी आस पास के गांवों का दौरा कर लौटे. मेरे पिता के अनशन को पचास दिन से ऊपर हो गए थे. हमारे विश्वसनीय और घोर बाँध विरोधी कीर्ति सिंह नेगी ने मुझे कहा – भुला, यूँ खंख्लू की बतु म नि ल्ह्ग्णु. यूँ कु क्या जांदू, छोप्लू ता त्वे पैरण पड़लू. (अनुज इन लम्पटों की बातों में न आओ. इनका क्या जाता है ? छोप्ला अर्थात पिता की मृत्यु पर सर पर पहने जाने वाला अशुभ वस्त्र तो तुझे पहनना पड़ेगा). हम तीनों ने तय किया की आज से ठीक एक सप्ताह बाद आर – पार की लड़ाई लड़ी जाए.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

अपार जन समूह को बाँध क्षेत्र में घुसा कर बाँध का काम ठप्प करवा कर मेरे पिता सुन्दर लाल बहुगुणा का अनशन तुडवा कर उनकी जीवन रक्षा की जाये. इसी गुप्त रणनीति के तहत हम तीनों गांवों का दौरा कर आधी रात के बाद लौटे थे. अभी आँख भी न लगी थी की दरवाज़े पर जोर की दस्तक हुयी. घड़ी देखी. भोर के तीन बज रहे थे. दरवाज़े पर हमारे सहयोगी देवेन्द्र बहुगुणा बदहवास गिरे हुए थे. उन्हें संभाला तो बिलखती हुयी मेरी बहन भी पंहुंच गयी. पिता जी को बहुत बुरी तरह ले गए भुला, मेरी बहन इतना ही कह पायी, और फफ़क पड़ी. बदहवास हम चारों अपने खेमे में पंहुचे. करीब चौथाई किलोमीटर का रास्ता पुलिस छावनी बना हुआ था. जगह जगह हमें रोका गया, और रोकने वालों को धकियाते – लतियाते हम किसी तरह अपने कैम्प में पंहुंचे. वहाँ अफरा – तफरी का माहौल था. विलाप कर रही मेरी माँ को उनकी सर्वोदयी सहेली राधा भट्ट संभाल रही थीं. पता चला कि प्रधान मंत्री नर सिम्हाराव के आदेश पर मेरे पिता को, जब वह सिर्फ एक कच्छे में अर्ध निर्वस्त्र सो रहे थे, सुरक्षा बल अपहृत कर कहीं ले गए. इस अपहरण के दौरान मार पीट, छीना  झपटी भी हुयी थी. प्रशासन और पुलिस के कई आला अफसर भी वहां विद्यमान थे. वह भी डरे हुए थे. कोई बताने को तैयार नही था कि कहाँ ले गए, क्यों ले गए. मैंने वहां मौजूद एक एस. डी. एम का गिरेहबान थाम कर झकझोरा, गांडू, आज मेरे पिता की मृत्यु हुयी तो तुझे फांसी लगवाऊंगा. बता कहाँ ले गया उनको ? दबंग वकील सुधांशु धूलिया ने भी ललकारा – कोर्ट में जब तुझे खींचूँगा, तो पानी भी नहीं मांग पायेगा बेटा.

( जारी रहेगा )                                                                                   अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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