जोगी का लंगोट…

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 -प्रकाश शर्मा||

सच मानिए लंगोट कमाल का ऐतिहासिक पुरुष परिधान है. इसे धारण करने से न केवल शरीर के न दिखाने वाले अंग छुप जाते हैं बल्कि बेहद आरामदायक भी होता है. वैसे इसे पहलवानों का वस्त्र माना जाता है. अखाड़े में मल्ल इस एकमात्र पोशाक को पहन कर उतरते हैं. इससे कुश्ती लडऩे में सहुलियत होती है. रामभक्त हनुमान का यह प्रिय लिबास रहा है. श्रीमद् भागवत के अनुसार हनुमान जी आज भी जीवित हैं और तीनों लोकों में विचरण कर रहे हैं लिहाजा हनुमान जी आज भी लंगोटधारी हैं.ajit_jogi

प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने दो दिन पूर्व अपने मुख से जुबानी तीर छोड़ते हुए कहा था कि प्रदेश में उनका लंगोट घूम रहा है. यह डायलॉग न केवल गजब का है बल्कि गूढ़ार्थ लिए हुए है. यह तीर ऐसे समय में छोड़ा गया है जब तमाम राजनीतिक पार्टियां विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई हैं. खास तौर पर कांग्रेस संगठन सत्तासीन भाजपा से मुकाबला करने चुनावी रणनीति बनाने में माथापच्ची कर रही है. प्रत्याशी चयन के लिए कवायदें की जा रही है. ऐसे में जोगी संगठन से अलग अपना लंगोट घूमा रहे हैं.

संत-महात्माओं के खड़ाऊ घूमाने की बातें खूब सुनी हैं लेकिन लंगोट यात्रा का पहली बार पता चला है. दशरथ नंदन भरत ने राम के वनवास के बाद उनकी चरण पादुका को सिंहासन पर रखकर उसे ही राजा माना था. उस युग में भी राम के स्थान पर उनके किसी भी व को राम के विकल्प के रुप में माना नहीं गया था. खड़ाऊ मंत्री या अध्यक्ष भी बनाए जाते रहे हैं. लंगोट की भाषा पहली बार सामने आई है. सबसे रहस्यपूर्ण सवाल यह है कि जोगी जी ने कभी लंगोट पहना है या नहीं?

यह एक तरह से अंत: वस्त्र है लिहाजा इसका जवाब जोगी जी स्वयं ही दे सकते हैं. वैसे आजकल तरह-तरह के अंडर वियर का जमाना है. पहले लट्ठे का कपड़ा खरीदकर ढीली ढीली चड्डी सिलवाते थे. अब ब्रांडेड कंपनियों व डिजायनर अंडरवियर का समय है. खैर बात लंगोट की हो रही थी. यहां यह भी बताना जरुरी होगा कि हाइड्रोसिल के मरीजों को एलोपैथिक डॉक्टर भी लंगोट पहने की हिदायत देते हैं. यह भी उपचार का एक हिस्सा है. इस बात को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भलीभांति जानते होंगे, क्योंकि वे चिकित्सक भी हैं. प्रदेश में जोगी द्वारा अपने लंगोट घूमाना काफी गंभीर व चिंतनीय बात है. एक तो एक ही लंगोट भारी पड़ रहा है वहां लंगोट घुमाए जा रहे हैं.

जोगी द्वारा लंगोट घूमाने का सीधा-सीधा मतलब यह है कि इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वे संगठन से पृथक अपने चुनावी पहलवान तैयार कर रहे हैं. उनका आलाकमान को संदेश है कि चुनावी अखाड़े में उनके ज्यादा से ज्यादा लंगोटधारी पहलवानों को उतारा जाए वरना वे मुकाबले के लिए तैयार हैं. लंगोट कस लेने का साफ अर्थ है कि युद्ध या कुश्ती के लिए तैयार हो जाना. इतना ही नहीं जोगी ने अपने विरोधियों को आंखें फोड़ लेने व हाथ पैर काट देने की चेतावनी भी दी है. यानी हमसे जो टकराएगा चूर-चूर हो जाएगा. जानकार कहते हैं जोगी की यह लंगोटवाणी भाजपा के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस संगठन के लिए है. जोगी अपने पाजामा-कुर्ता, पेंट-शर्ट, जीन्स-टी शर्ट, कोट-टाई भी घूमाने की बात कह सकते थे. लंगोट ही क्यों कहा?

दरअसल लंगोट से कठोर चेतावनी उद्भुत होती है. संगठन में अपनी उपेक्षा से तिलमिलाए जोगी को लंगोट का सहारा लेना पड़ा है. जिज्ञासु किस्म के कांग्रेस नेताओं की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि जोगी अपना लंगोट घूमा रहे हैं तो वे खुद क्या पहन रहे हैं? इसका भी जवाब जोगी ही दे सकते हैं. चर्चा यह भी है कि जोगी की लंगोटगिरी व लंगोटबाजी की खबर कांग्रेस आलाकमान के कानों तक जा पहुंची है. आलाकमान भी जोगी के लंगोट घूमाने के पीछे उद्देश्य की खोजबीन करा रहा है. वैसे जोगी प्रदेश में न केवल जनाधार को मजबूत बना रहे हैं बल्कि अपनी लोकप्रियता को परख रहे हैं. जोगी लंगोट घूमाकर अपना शागिर्द तो तैयार कर ही रहे हैं कांग्रेस के `पंजा’ की छत्रछाया के बिना वे राज्य में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं. जोगी बाकी नेताओं को यह संदेश दे रहे हैं कि पूरे संगठन के मुकाबले वे अकेले ही दम रखते हैं. उन्हें छोड़ा गया, उपेक्षा की गई या उनकी पसंद का ख्याल नहीं रखा गया तो वे गुरु हनुमान की भूमिका में आने से चूकेंगे नहीं.

लंगोट के दम पर ही वे जोगी एक्सप्रेस चलाकर इसमें ज्यादा से ज्यादा यात्रियों (वोटरों) को बैठाने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेसी ही कह रहे हैं कि पार्टी में जोगी एक्सप्रेस है तो महंत-लोकल व चौबे पैसेंजर भी है. कुछ ट्रेने रद्द भी चल रही हैं. एक्सप्रेस ट्रेन में टिकिट (आरक्षण) लेना जरुरी होता है तभी मंजिल तक पहुंच सकते हैं वरना जेल की हवा खानी पड़ती है या जुर्माना देना होता है. लोकल या पैसेंजर में बिना टिकिट यात्रा कर मंजिल तक पहुंचने की गुंजाईश ज्यादा रहती है. बहरहाल बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस दर्शकों की जोरदार भीड़ खींच रही है. यह जरुर खोज का विषय हो सकता है कि फिल्म देखकर बाहर आ रहे दर्शक माथा पीट रहे हैं या तारीफ कर रहे हैं.

लेखक छत्तीसगढ़ के प्रथम दैनिक समाचार पत्र महाकोशल के संपादक हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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4 thoughts on “जोगी का लंगोट…

  1. 36garh me log B.J.P. ke chuthbaiya netao se pareshan hai udhar jogi ke purane 3 saal ke cm giri ko yaaad kar bjp ke loot ko hi jari rahne dena chahte hai congress ko chahiye jogi ke pichwade par char lagaye aur iski aukat dikha de 5 saal aur bina satta ke gujar le.

  2. जोगीजी भी अभद्र भाषा को बोलने में क्यों पीछे रहें?अब यह भाषा भी चलन में आ जाएगी. वैसे भी जोगीजी का हौंसला काबिले तारीफ़ है.चूके हुए नेता भी ऐसे बयां दे तो हंसी ही आती है.d

  3. जोगीजी भी अभद्र भाषा को बोलने में क्यों पीछे रहें?अब यह भाषा भी चलन में आ जाएगी. वैसे भी जोगीजी का हौंसला काबिले तारीफ़ है.चूके हुए नेता भी ऐसे बयां दे तो हंसी ही आती है.d.

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