सुल्ताना डाकू उर्फ प्याज…

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-आलोक पुराणिक||

वक्त-वक्त की बात है साहब. जिस नयी पीढ़ी ने ए के राजा के टेलीकाम घोटाले में अरबों-खरबों के करतब देखे हैं, कलमाड़ीजी के कामनवेल्थ से करोड़ों के वेल्थी बनने-बनाने के कारनामे देखे हैं, वह पीढ़ी सुल्ताना डाकू, मोहर सिंह, माधोसिंह जैसे पुराने यशस्वी डाकुओं को डाकू तक मानने से इनकार कर देती है. रेजगारी-चिल्लर टाइप उचक्का भर मानकर नयी पीढ़ी सुल्ताना डाकू को वह सम्मान नहीं देती, जिसके हकदार सुल्ताना डाकू हैं.Red onion

एक बुजुर्ग बता रहे थे कि सुल्ताना डाकू का सुपर जलवा था, जिस ठिकाने पर डाका डालता था, उस ठिकाने पर चोर, सेंधमार, उचक्के, जेबकट सब पहुंचकर वारदात करते थे, ये सारी वारदात सुल्ताना डाकू के खाते में जाती थीं. चुन्नू करें चोरी, जिम्मेदारी लें सुल्ताना- डाकू टाइप मामला था.

सुल्ताना डाकू टाइप यही मामला प्याज का हो रखा है, अस्सी रुपये किलो प्याज पर इतनी मचमच मची है कि महंगी भिंडी, आलू, लौकी, तोरई की जेबकटी पर किसी का ध्यान ना जा रहा और महंगाई की सारी वारदात प्याज के नाम दर्ज हो रही हैं. महंगाई का सुल्ताना डाकू प्याज सबके पाप धो रहा है.

OLYMPUS DIGITAL CAMERAप्याज पर इस कदर हल्ला हो लिया है कि मुझे शक हो रहा है कि विदेश मंत्रालय चीन और पाकिस्तान के घुसपैठियों को बुलाकर आफ दि रिकार्ड यह निवेदन ना करने लगे-देखो अभी बवाल का सारा फोकस प्याज पर है, पूरे साल घुसपैठ का जितना कोटा है, सो अभी दम-मेहनत लगाकर पांच-सात दिन में पूरा कर लो. अभी किसी का ध्यान ना जायेगा. बाद में करोगे, तो हल्ला मचेगा, हमें जवाब देने पड़ते हैं.

कम लोगों को खबर है कि इंडिया का एक शिप ईरान ने पकड़ लिया. प्याज के हल्ले में इस पर ज्यादा चाऊं-चाऊं ना हुई. थैंक्स ईरान, सही टाइमिंग पर शिप पकड़ा, आगे-पीछे पकड़ते, तो जवाब देने पड़ते.

पर मुझे प्याज के सुल्तानी हल्ले में एक डर यह लग रहा है कि कुछ मंत्री-अफसर नये घपलों के प्लान में ये सोचकर ना जुट जायें कि अभी खा-खेंच लो, जितना मन करो, अभी प्याज की वारदात के सिवा दूसरी वारदात का कोई नोटिस ही ना ले रहा.

अबे प्याज कित्ता परेशान करेगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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