अन्ना हजारे और उनकी मंडली में आत्मविश्वास का केमिकल लोचा

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-दिवांश ।।

अन्ना हजारे ने जब जंतर मंतर से  पहली बार हुंकार भरी थी तब लोगों को लगा कि शायद अब देश को एक ऐसा इंकलाबी नेता मिल गया है जो कि देश के करप्शन को नेस्तनाबूत कर देगा। उस वक्त अन्ना एण्ड कम्पनी ने दावा किया था कि जनलोकपाल कानून बन जाने से हिन्दुस्तान का करप्शन ऐसे खत्म हो जाएगा जैसे गधे के सिर से सींग।

लेकिन जैसे जैसे वक्त निकला इनके दावे की हवा भी निकलती गई। जब यह लोग जंतर मंतर पर अनशनरत थे तब अन्ना मंडली दावा कर रही थी सौ फीसदी करप्शन समाप्त हो जाएगा लेकिन रामलीला मैदान तक आते आते साठ सत्तर फीसदी पहुंच गया। रामलीला मैदान में अनशन शुरू करते वक्त जब पत्रकारों ने अन्ना साहब से पूछा कि क्या जनलोकपाल का मसौदा स्वीकार कर लेने के बाद इस देश से करप्शन समाप्त हो जाएगा तो खुद अन्ना हजारे ने कहा कि पक्के तौर पर साठ सत्तर फीसदी खत्म हो जाएगा।

अब आप खुद ही देख लीजिए कि जंतर मंतर से रामलीला मैदान तक आते आते अन्ना के आत्मविश्वास में तीस से चालीस फीसदी की गिरावट आई। यही हाल टीम अन्ना का भी है। भारतीय समाज का आम आदमी टूटकर इस आंदोलन का साथ दे रहा है, बिना यह जाने कि आखिरकार यह आंदोलन क्यों है और उससे क्या हासिल होगा? विडंबना बस इतनी है कि अन्ना हजारे का यह आंदोलन वैसे ही है जैसे कैंसर के उपचार के लिए सिरदर्द की गोली दी जाए।

अन्ना के अलावा अब रही बात अन्ना के टीम की तो अन्ना मंडली की मांग को अल्पविराम पूर्ण विराम सहित भी अगर स्वीकार कर लिया जाय तो भी इस करप्शन पर काबू पाने की गारंटी न तो अन्ना हजारे दे सकते हैं और ना ही उनकी टीम के सदस्य। यह भी सत्य है कि इस आंदोलन से सरकार के खिलाफ भडके लोगों के गुस्से को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब देखना यह है कि आने वाले वक्त में लोगों का ये गुस्सा किस पर भारी पड़ता है।

(लेखक एक नवोदित व्यंगकार हैं)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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5 thoughts on “अन्ना हजारे और उनकी मंडली में आत्मविश्वास का केमिकल लोचा

  1. अन्ना की आवाज का जादू था की हेर वो इन्सान जो भ्रस्तचार से थ्रस्ट था रामलीला मैदान में था जरा अपने आप से सोचिये की आप किटें इमानदार है क्या पैसे का लेनदेन ही भ्रस्ताचार है.हम अपने दिनक जीवन में कितन भ्रस्त आचरण करते है इसकी गिनती कभी किया है.जरा गायत्री समाज के आचार्य श्री राम जी के सन्देश को इतने सालो में हम सभी ने अमल किया होता तो सायद अन्ना जी को यह सब कुछ नहीं करना होता.उन्होंने कहा था “हम बदलेंगे तो युग बदलेगा” क्या हम बदले जो जादू से अन्ना के अनसन मात्र से ब्रश्त्चार ख़तम हो जाएगा .
    अन्ना की आवाज तो एक मशाल है जिसमे तेल डालना हम सब का कर्तब्य है और इसे जल्ये रखेने की हमे जरुरत है.संकल्प ले के न हम भ्रस्तचार करेनेगे और न धेकेंगे और हेर उस का समर्थन करेंगे जो इसका समर्थन कर रही है.
    आये और संकल्प ले. धन्यबाद.

  2. मुझे लगता है अन्ना का ये आन्दोलन मेरे गाँव में बैठे उस झोला छाप डॉक्टर की तरह है जो हर बीमारी के लिए steroid देते है और मरीज ये जाने बगैर कि उस डॉक्टर को बीमारी कि कितनी समझ है, उसकी दवा को एक सस्ता और एकमात्र उपाय मान कर लेता है. उस मरीज को नहीं पता कि steroid भविष्य में उसके शारीर को कितना नुकसान पहुचायेगी.
    अन्ना का ये आन्दोलन जिस प्रकार कि जिद पकडे हुए है वह जिद अंत में एक steroid ही साबित हो सकता है,

    1. अपने बिलकुल ठीक कहा ….दहेज़ के विरुद्ध भी कानून बना लेकिन क्या वो बंद या कम हुआ..नहीं ..वो और बढ़ गया …ठीक उसी तरह janlokpal भी घुश लेने का एक और authorized agency बन जाएगी ..क्योंकि अन्ना टीम की नियत साफ़ नहीं लगती है …..जबतक हम खुद को तैयार नहीं कर लेते की किसी भी हाल में हम घुस नहीं देंगे या लेंगे तबतक कितना भी कुछ -कितने भी अन्ना उपवास कर ले यह रुकने वाला नहीं है….थिंक ..थिंक.

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