मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: नीरज से पहली मुलाक़ात…

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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक-15                                                                                  पिछली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

अलीगढ बस अड्डे पर उतरा ही था कि रिक्शे वाले ने पूछा – होटल चलना है न ? मैंने इसे अपनी यात्रा की शुभ शुरुआत माना कि एक अनजान शहर में अपरिचित व्यक्ति मेरे स्वागत में खड़ा है, और उसे यह भी पता है कि मुझे होटल जाना है. पैसे भी उसने बहुत कम मांगे. तब तक मुझे यह पता नही था कि रिक्शे वालो का होटल से एक शाश्वत गठ बंधन होता है. रिक्शे वाले ने किराए में जो रियायत की थी, वह होटल वाले ने पूरी कर दी. अढायी सौ रुपये एडवांस धरवा लिए.gopal das neeraj

आज से तीस साल पहले यह रक़म ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं थी, होटल के कमरे में अपना झोला रख कर मैं नीचे उतरा. शराब का ठेका और सड़क पर अतिक्रमण कर बनाया गया हनुमान, शिव या शनि देव का मंदिर तब भी कुछ क़दम चलने पर आराम से मिल जाता था. इंग्लिश का एक लार्ज पैग पीते ही मैंने होटल वाले से पूछा – व्हेर इज मिस्टर गोपालदास नीरज ? द फेमस कबी ? नीचे रिक्शे वाला आपको वहां ले जाएगा, होटल वाले ने आश्वस्त किया. अब तक मेरा तीसरा नेत्र खुल चूका था, और मैंने भूमिका बना ली थी कि नीरज जी को किस तरह काबू करना है. मेरे पास उनके प्रति अपने भक्ति भाव की पूंजी जो थी. मेरिस रोड पर अपनी कोठी के बरामदे में लुंगी और कुर्ता पहने खड़े मिले नीरज. उठान लिए प्रशस्त काठी, आजानुभुज, उन्नत ललाट और सुगढ़ ग्रीवा. मैं चरणों में जो भू लुंठित हुआ, तो फिर उठा ही नहीं. उन्हें खुद झुक कर उठाना पडा. ऐसे अज्ञात विह्वल भक्त को उन्होंने अंक से लगा लिया. अब तक बाहर खड़े रिक्शे वाले को खुद किराया देकर विदा किया. तथा गेट पर खड़े खोमचे वाले से मेरे लिए चाट का एक पत्ता बनवाया, यह कहते हुए कि चटपटा बनाना. दर असल वह उस समय खुद भी चाट खा रहे थे. मेरा मुंह सूँघते हुए उन्होंने पूछा – चाय तो तुम पियोगे नहीं, यह बताओ की कहाँ से आये, कैसे आये, कौन हो ? यह तो तय है की तुम कवि हो. मैंने उन्हें अपनी कविताओं की कापी सौंपी. वह पलटने लगे. एक पन्ने पर ठिठक गए और वाह वाह करने लगे. गज़ल थी –

“बहार लायी है हर बार सिर्फ़ कांटे ही

मगर मैं फिर भी हमेशा खिले गूलाब लिखूं

किसी पहाड़ के झरने में घोल दूँ आतिश

मैं इस सदी की हथेली पे इन्कलाब लिखूं”

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

अब किसी और परिचय की ज़रुरत नहीं रह गयी थी. नीरज मुझे अपने साथ अपनी एक एंटीक कार में बिठा कर बैंक ले गए. वहाँ उन्हें अपने कयी चेक जमा करवाने थे.रास्ते में ही मेरे परीक्षा संकट पर चर्चा हो गयी थी. इस अनैतिक कृत्य के प्रस्ताव को उनहोंने बड़ी सहजता से लिया, और बोले शाम को शहर में एक कवि गोष्ठी है. तुम्हें भी वहां चलना ही है. सारे प्रोफ़ेसर वहीं आयेंगे. देख जाएगा. नीरज की विलक्षण स्मृति मेधा को देख मैं दंग रह गया, जब शाम की गोष्ठी में मेरा परिचय कराते हुए उन्होंने मेरी तारीफों के पुल बांधते हुए, दिन में एक बार, सिर्फ एक बार पढी मेरी पूरी गज़ल वहाँ सूना दी और फिर बोले – अब इन्हीं के मुंह से सुनिये. इसके कई वर्ष बाद जब वह मुझे कुछ साल पहले देहरादून में मिले तो फिर वही मेरी गज़ल उन्होंने मुझे सुना दी, जब की तब तक खुद मुझे भी वह अविकल याद नही थी.
( जारी )                                                अगली पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ पोस्ट करें..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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