क्या हम सच में आज़ाद हैं?

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-विकास कुमार गुप्ता||

महात्मा गांधी ने एक बार अपने लिखित वक्तव्य में कहा था “याद रखना, आजादी करीब हैं. सरकारे बहुत जोर से यह जरूर कहेगीं कि हमने यह कर दिया, हमने वह कर दिया. मै अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन व्यावहारिकता किसी भी अर्थशास्त्री से कम नहीं हैं. आजादी के बाद भी जब सरकार आएगी, तो उस सरकार के कहने पर मत जाना, इस देश के किसी हिस्से में एक किलोमीटर चल लेना, हिन्दुस्तान का सबसे लाचार, बेबस बनिहार (मजदूर) मिल जायेगा, अगर उसकी जिन्दगी में कोई फर्क नहीं आया तो उसी दिन, उसी क्षण के बाद उस समय चाहे किसी की सरकार हो उसका कोई मतलब नहीं. आज स्थिति यहां तक आ गयी है कि मजदूरी भी लोगों को नसीब नहीं हो रही. सरकार मनरेगा के नाम पर बेरोजगारों को मजदूरी मुहैया करा रही है. truth of indian independence

आजादी का जो सपना महात्मा गांधी ने दिखाया था, उस सपने के साथ में उन्होंने दो सपने दिखाए थे ‘स्वाभिमान’ और ‘स्वरोजगार’ का. स्वरोजगार का सपना इसलिए दिखाया था, क्योकि स्वरोजगार के बिना स्वाभिमान जिन्दा नहीं रह सकता. आजादी मिली, लेकिन स्वाभिमान और स्वरोजगार का सपना पूंजीवादी सभ्यता और हमारी सरकार की भेंट कब चढ़ गया? पता ही न चला.
ईस्ट इंडिया कंपनी को चार्टर निर्गत होता है भारत के लियें. 20-20 साल के लिये इसे चार्टर (अधिकार पत्र) दिया जाता रहा. पहला चार्टर सन् 1600 में दिया गया. ब्रिटिश संसद में परिचर्चा के दौरान बिलियम फोर्स कहता है कि हमें भारत में फ्री ट्रेड करना है. और वह फ्री ट्रेड का अर्थ समझाते हुए कहता है कि हमें भारत में ऐसी नीति बनानी है कि यहां सिर्फ ब्रिटेन की वस्तुएं बिके. समूचे बाजार पर ब्रिटिश वस्तुएं काबिज हो. भारत का वैश्विक निर्यात उस समय लगभग 35 प्रतिशत हुआ करता था जब हम गुलाम थे और आज 0.01 प्रतिशत रह गया है. और आगे वह कहता है कि उसके लिये हमें भारत के कपड़ा, मसाला और स्टील उद्योगों पर जबरदस्त टैक्स लगाना होगा चूंकी यही उद्योग यहां की रीढ़ है. और अपने माल को टैक्स फ्री करना होगा. फिर पॉलीसी बनायी जाती है. जब ब्रिटिश संसद में फ्री ट्रेड की पॉलीसी को लेकर डिबेट चल रहा था तो विलियम फोर्स का प्रतिवाद करते हुए एक सांसद ने कहा की अगर हम 97 प्रतिशत इंकम टैक्स, सेल्स टैक्स, कस्टम एक्साइज, चुंगी नाका जैसे टैक्स लगायेंगे तो भारतीय व्यापारी मर जायेंगे तब विलियम फोर्स कहता है कि यही तो हम चाहते है कि या तो वे मर जायें या फिर बेईमान हो जाये. हमारे दोनो हाथों में लड्डू है. अगर वे बेईमान हो जायेंगे तब भी हमारे शरण में आ जायेंगे और यदी मरेंगें तो ना रहेंगे व्यापारी ना चलेगा यहां का व्यापार. इस तरह अंग्रेजों ने यहां विभिन्न प्रकार के टैक्स का कानून बनाकर यहां के उद्योग व्यवस्था को नष्ट किया. उन्होंने अपना फ्री ट्रेड चलाने के लिये यहां से फ्री कच्चा माल जोकि अंग्रेजों का ही था सारे जंगल अंग्रेजों के थे और वर्तमान की सभी सरकारी भूमि उस समय अंग्रेजों की थी अब उनके जाने के बाद सरकार की है को ले जाने के लिये ट्रेन चलाया. और ट्रेन के मालगाड़ी में लादकर पहले वे मुम्बई ले जाते और फिर मुम्बई से ब्रिटेन. हमारे यहां से कपास और स्टील के अयस्क सरीखे अन्य वस्तुएं अंग्रेज ले जाते रहे. और फिर वहां से माल तैयार कर यहां लाकर बेचते रहे. 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद यहां सीधे ब्रिटिश संसद का शासन हो गया. इतिहास गवाह है भारत के लाखों कपड़ा कारिगरों के हाथों को सिर्फ इसलिए काटा गया ताकि यहां का  प्रसिद्ध कालीन/कपड़ा उद्योग नष्ट हो जाये. फिर स्टील उद्योग को नष्ट करने के लिये यहां इंडियन फॉरेस्ट एक्ट लगाकर स्टील के अयस्क को जंगलों से लेने के लिए मना कर दिया गया. और कानून बनाया गया कि स्टील के अयस्क को लेने वालों को 50 कोड़े लगवाये जाये और फिर भी वह नहीं मरे तो उसे गोली मार दी जाये.
1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली द्वारा निर्देशित लार्ड माउंट बेटन से हमारे देश के नेताओं ने डोमिनियन स्टेट के मेम्बर होने की तर्ज पर ब्रिटिश संसद में पास कानून इंडियन इंडिपेन्डेन्स एक्ट (http://www.legislation.gov.uk/ukpga/1947/30/pdfs/ukpga_19470030_en.pdf) के पारित होने पर आजादी ली. 1948 में अंग्रेजों की चालों को समझने वालें गांधीजी के मरने बाद ब्रिट्रेन में इंडिया कान्स्यूक्वेस्यिल प्रोविजन एक्ट (http://www.legislation.gov.uk/ukpga/1949/92/pdfs/ukpga_19490092_en.pdf) 1949 पारित किया गया. और फिर उसके बाद 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ.
भारत में वर्तमान में 5000 से अधिक विदेशी कंपनिया मौजूद है. अगर इतिहास के पन्नो में पीछे झांके तब वित्त मंत्रालय से लेकर रिजर्व बैंक के आंकड़े चिल्ला चिल्लाकर कह रहे है कि विदेशी निवेश और विदेशी कंपनियों से जितना भी पैसा भारत में आता है उससे कई गुना ज्यादा पैसे वे भारत से लेके जाती है. 1933 से भारत में कार्य कर रही हिन्दुस्तान युनीलीवर जोकि ब्रिटेन और हालैण्ड की संयुक्त कंपनी है ने मात्र 35 लाख रुपये से भारत में व्यापार शुरु किया था और उसी वर्ष यह 35 लाख से अधिक रुपया भारत से लेकर चली गयी. उसी तरह प्राॅक्टर एण्ड गैम्बल, फाइजर, गैलेक्सो, गुडईयर, बाटा सरीखी हजारों कंपनीयों ने जितना निवेश किया उससे लगभग कई गुना उसी वर्ष भारत से वापस लेके चली गयी. जीरो टेक्नोलोजी की वस्तुओं के लिए विदेशी दरवाजे बंद होते तो हमारे मजदूरों की आज जो स्थिति है वह नहीं होती. उसकी मैनुफैक्चरिंग इंडियन करते तो हमारे रोजगार कई गुना बढ़ जाते. लेकिन आर्थिक गुलामी से भारत के स्वाभिमान का ग्राफ वैश्विक पटल पर गिरता जा रहा है. कर्जे पर कर्जे लेकर भारत की क्या स्थिति हो गयी है बताने की जरूरत नहीं.
2013 में अगर देखा जाये तो पुलिस वालों की हफ्ता वसूली की सीमा नहीं. सरकारी मशीनरी लूट की फैक्टरी बन चुकी है. देश त्राहिमाम् त्राहिमाम् कर रहा है. महंगाई चरम पर है. रुपये की कीमत गिरती जा रही है. विदेशी ताकते अपने पैर फैलाती जा रहीं है. आजादी के बाद की लूट की महागाथा का पक्का सबूत स्विस बैंक में जमा पैसे के रूप में मौजूद है. क्या यही आजादी है. हमारे नेता स्विस बैंक में अथवा विदेशी बैंकों में भारत में भ्रष्टाचार के ज़रिये लूटी गई राशि को संजो रहे हैं. न्यायालयों, शासन की लेट लतीफी से आजिज़ आकर आज भी भारतीय गरीब, मजदूर अंग्रेजों के समय से ज्यादा लाचार और बेबस दिख रहे है. अपने ही देश के फुटपाथ पर अपनी दुकान का हफ्ता देने को आज भी गरीब मजबूर है. पुलिसवालें आज भी उसी तरह लाठियां भाज रहे है जैसे अंग्रेजों के समय भाजी जाती थी. फिर अन्तर क्या है.  देश में गरीबों के बदबूदार झोपड़पट्टों की बढ़ती संख्या गवाही दे रही है कि हम कहा जा रहे है. झोपड़पट्टों को बांग्लादेशी और भीखमंगा करार देने वाले यूरोपीयन थिंकरों से मैं पूछता हूं विकसित देशों में झोपड़पट्टों की क्या स्थिति है उसे भी देख लें.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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