खड्ग घपला, ढाल घोटाला…

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-आलोक पुराणिक||

कालोनी के बच्चों को देशभक्ति के गीत समझाने का जिम्मा मेरा लगाया गया.

जो हुआ सो वह यह है-

बच्चो, गीत सुनो- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.

आलोक पुराणिक
आलोक पुराणिक

हे हे, क्या सुंदर है, ये गीत तो संदेश दे रहा है कि खड्ग और ढाल के बगैर ही संतजी लड़ाई लड़ पाये. वरना खड्ग, ढाल, टैंक, हैलीकाप्टर,तोप वगैरह की मदद लेते तो, लड़ाई हो ही ना पाती. खड्ग घपला हो जाता, ढाल घोटाला हो जाता. सुना नहीं, पाक बार्डर पर शहीद हुए जवानों की बुल्लेट-प्रूफ जैकेट तक फर्जी थी. खड्ग ढाल नकली हों, इससे बेहतर हों ही ना.

बच्चो, तुम स्वतंत्रता दिवस के दिन अंड-बंड ना बोलो,कित्ता अच्छा दूसरा गीत सुनो- हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के.

हे, हे, ये संदेश देने वाला साफ कर रहा है कि नेताओं को बच्चों को ही देश संभालकर रखना है. हम कहां के मरभुख्खे बच्चे देश संभालनेवाले, हम तो वोटर मात्र हैं. कश्मीर से कन्याकुमारी देख लो, नेताओं के बेटे देश संभाल रहे हैं, कन्याकुमारी के राज्य तमिलनाडु में तो एक नेता की पार्टी में इत्ते बेटे-बेटी हो लिये हैं कि मार मची हुई है. बेटा निकम्मे निकले, तो दामाद संभाल लें,सब कुछ प्लाट से लेकर नेतागिरी के ठाठ तक. हम कौन संभालनेवाले. जिन स्वतंत्रता सेनानी नेताओं के बालक-बच्चे ना आये पालिटिक्स में, उन नेताओं का नामलेवा कोई नहीं है. पालिटिक्स में बालक-बच्चे आ जायें, चार छह घपले-घोटाले मचा दें, तो बरस दर बरस नाम चलता रहता है. फ्रीडम फाइट वालों के नाम कोई ना जान रहा है, उनकी अगली पीढ़ियों के घपले ही नामी हो रहे हैं.

बच्चो, सुनो तीसरा गीत सुनो कित्ता सुंदर-मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे.

हे, हे, आपने बसंती चोलों की होलसेल एजेंसी ली हुई है. यूं फोकटी में बसंती चोलों का प्रमोशन आप क्यों कर रहे हैं.

बच्चो, तुम्हारी बातों से चिंता होती है.

हे हे, चिंता नहीं, देशभक्ति संभालिये, छब्बीस जनवरी पर फिर काम आयेगी और देश की चिंता छोड़िये, उसे तो नेताओं के बच्चे चकाचक संभाले हुए हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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