मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: नीरज से अपनापा

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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक -14                                                                      पिछली कड़ी के लिये यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

“परीक्षा” के अगले दिन राजेन्द्र माथुर ने मुझे अपने कक्ष में बुलाया. कुछ देर बाद अपने काम से फारिग होकर वह मुझसे मुखातिब हुए. मेरी उत्तर पुस्तिकाओं पर फिर से नज़र डालने लगे, जिन्हें वह पहले ही देख चुके थे. हिंदी तो आपकी औसत से भी ज्यादा ठीक है, पर अंग्रेज़ी में काफी मेहनत करनी होगी, उनकी इस बात से मैं भांप गया कि उन्हें कल वाली करतूत की भनक लग गयी है.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

आखिर वह एक प्रोफ़ेसर भी तो रह चुके थे. परीक्षा में चीटिंग करने का पुराना अभ्यस्त था. एम्. ए. फाइनल की परीक्षा में मेरे गुरु प्रोफेसर गोविन्द शर्मा चाहते थे कि मैं सर्वोच्च अंकों से पास होऊं. मैं उनका प्रिय शिष्य जो था. एम्. ए. हिन्दी में अच्छे नंबर लाना मेरे लिए कोई जटिल भी नहीं था, लेकिन एक पर्चा संस्कृत का होता था जो बगैर कोर्स को पढ़े मुमकिन नहीं था, जो मैंने पढ़ा ही नहीं था. बाकी एम्. ए हिन्दी का कोर्स तो मैं इंटर तक आते आते ही पढ़ – समझ चुका था. पूरी आशंका थी कि बाकी सब पर्चों में मेरे फर्स्ट डिवीजन के मार्क्स आयेंगे, पर संस्कृत में फेल हो जाऊँगा. उदार सदाशयी और, समर्पित गुरु ने पता लगा लिया कि संस्कृत वाली कापी अलीगढ़ जांचने के लिए जा रही है. उन्होंने सम्बंधित प्रोफ़ेसर का नाम – पता मुझे देते हुए कहा कि – आगे तुम संभालो. बहुत नेतागिरी करते हो, अब करो खुद अपना भी कल्याण.

मैं सीधे दिल्ली हेमवती नंदन बहुगुणा के पास पंहुचा. उन्हें सारा माजरा समझाया और प्रेरित किया कि वह सम्बंधित प्रोफ़ेसर या कुलपति को फोन करें. प्रश्न वाचक दृष्टि से मेरी और देखते हुए बहुगुणा बोले – लेकिन क्या यह नैतिक रहेगा? इस तरह उन्होंने प्रकरण से अपना पिंड झाड लिया, अलबत्ता मुझे कुछ धन राशि दे दी यह कहते हुए कि मैं खुद ही झेलूं. जेब में नोट ठूंस कर मैं अलीगढ़ की बस में बैठा. अपरिचित और अज्ञात प्रोफ़ेसर को रुपये का लालच देना उलटा भी पद सकता था. मैं अलीगढ़ में सिर्फ कवि – गीतकार गोपाल दास नीरज को जानता था, वह भी उनके गीत- कविताओं के ज़रिये. उनका भक्त था. अन्यथा हम न कभी मिले थे, न कोई पत्रव्यवहार ही था. लेकिन प्रेम, सौन्दर्य, करुणा और भाव कातरता का अप्रतिम चितेरा गीतकार मेरी मदद अवश्य करेगा, यह मेरा किशोर ह्रदय कहता था, और वही हुआ भी. इस मुलाकात के बाद मैं और नीरज जी एक अटूट स्नेह और मैत्री की डोर में बांध गए

( जारी )                                                                                                   अगली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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