छिपकर दुश्मन की टोह लेने वाली पनडुब्बी के विकास की राह भारत के लिए कतई आसान नहीं रही:BBC

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पानी के अंदर छिपकर दुश्मन की टोह लेने वाली अनोखी विशाल मशीन पनडुब्बी के विकास की राह भारत के लिए कतई आसान नहीं रही और इसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा.

मंज़ूरी लेने में ही लग गए तीन साल

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी 1958 तक भारतीय नौसेना की कमान अंग्रेज अधिकारी के हाथों में ही रही. इसके बाद जाकर भारत के किसी अधिकारी को नौसेना की कमान मिली.sindhurakshak

भारतीय नौसेना की कमान भारतीय अधिकारी के हाथों में आने के बाद ही पनडुब्बी शाखा के गठन की दिशा में काम शुरू हो पाया. हालांकि तीन साल तो सरकार से मंज़ूरी लेने में ही लग गए.

आखिर सरकार ने 1961 में इसके लिए अपनी मंजूरी दे दी. इसके बाद 1961 से 1963 तक भारतीय नौसेना के अधिकारी और नाविक छोटी-छोटी टुकडि़यों में प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन गए.

इन अधिकारियों ने ब्रिटेन की शाही सेना में तीन महीने तट पर और नौ महीने समुद्र में गहन प्रशिक्षण लेकर विभिन्न श्रेणियों की पनडुब्बियों के संचालन की बारीकियों को सीखा.

ब्रिटेन का पनडुब्बी देने से इनकार

एक अप्रैल 1967 को विशाखापटनम में फ्लैग ऑफिस सबमरीन (एफओएसएम) का गठन किया गया. ब्रिटेन ने तब भारत को आधुनिक परपोइज/ओबेरोन श्रेणी की पनडुब्बी देने से इनकार कर दिया था लेकिन कठिन शर्तों पर द्वितीय विश्वयुद्ध के जमाने की ‘टी’ श्रेणी की पनडुब्बी को लीज़ पर देने पर सहमति जताई थी.

सोवियत संघ ने 1964 में औने पौने दामों पर चार आधुनिक ‘‘प्रोजेक्ट 641’’ पनडुब्बियां देने की पेशकश की और इस संबंध में 1965 में करार पर हस्ताक्षर किए गए- उत्तर अटलांटिक संधि संगठन में इन पनडुब्बियों को ‘फॉक्सट्राट’ कूटनाम दिया था.

इन पनडुब्बियों के संचालन का प्रशिक्षण लेने के लिए 20 अधिकारियों और 100 नाविकों का दल 1966 में रूस के व्लादीवोस्तोक रवाना हुआ जहां उन्होंने तीन महीने तक रूसी भाषा का प्रशिक्षण लिया और फिर 12 महीने पनडुब्बी संचालन का प्रशिक्षण लिया.

पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवारी का जलावतरण

भारत की पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवारी का आठ दिसंबर 1967 को यूक्रेन के रीगा (तत्कालीन सोवियत संघ) में जलावतरण किया गया और तबसे आठ दिसंबर को ‘पनडुब्बी शाखा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.

उस दौरान अरब देशों और इज़रायल के बीच संघर्ष के कारण स्वेज़ नहर में संचालन बंद होने के बाद कलवारी को भारत पहुंचने के लिए तीन महीने तक केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाना पड़ा था.

इस तीन महीने की अवधि में तीन पनडुब्बियों (अमरीका की यूएसएस स्कॉरपियोन, सोवियत संघ की गोल्फ श्रेणी की एक पनडुब्बी और फ्रांस की यूरीडाइस) को समुद्र ने लील लिया था जो भारतीय नौसेना के लिए भी इस बात की चेतावनी थी कि पनडुब्बी संचालन आसान काम नहीं है.

दिल्ली में पनडुब्बी शाखा के लिए एक नए महानिदेशालय का गठन किया गया जबकि विशाखापट्टनम में पनडुब्बी अड्डे की आधारशिला रखी गयी जिसे बाद में ‘आईएनएस वीरबाहु’ नाम दिया गया.

भारत-पाकिस्तान युद्ध

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पूर्वी और पश्चिमी सीमा में पनडुब्बियों को अग्रिम इलाकों तक तैनात किया गया था. भारतीय नौसेना का दावा है कि इन पनडुब्बियों ने तब पाकिस्तानी नौसेना को कराची बंदरगाह से निकलने नहीं दिया था.

किलो श्रेणी की आठ पनडुब्बियों को रीगा में कमीशन मिला और वे 1986 से 1990 के दौरान भारत पहुंची थीं. इनमें से चार को विशाखापट्टनम में और चार को मुंबई में रखा गया. इस श्रेणी की पहली पनडुब्बी का नाम ‘आईएनएस सिंधुघोष’ रखा गया.

किलो श्रेणी की पनडुब्बियों को भारत की समुद्री परिस्थितियों के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था. इसलिए शुरुआत में डीज़ल जेनेरेटरों, बैटरियों, वातानुकूलित प्रणालियों और ताज़ा पानी को लेकर कई तरह की ख़ामियों को सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में उजागर किया था.

स्वदेशी नुस्खे

भारतीय नौसेना के अधिकारियों ने स्वदेशी नुस्ख़े अपनाते हुए इन समस्याओं को दूर किया और इन पनडुब्बियों को भारतीय परिस्थितियों में संचालन के अनुकूल बना दिया.

भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस चक्र को पांच जनवरी 1988 में व्लादीवोस्तोक में कमीशन मिला और यह तीन साल की ली़ज़ पर विशाखापट्टनम पहुंची.

विभिन्न तरह की पनडुब्बियों के कुशल संचालन और इनमें तालमेल के लिए एक अप्रैल 1987 को फ्लैग ऑफिस सबमरींस (एफओएसएम) विशाखापट्टनम में स्थापित किया गया.

अथाह खर्च पर सवाल

एसएसके श्रेणी की दो पनडुब्बियों आईएनएस शल्की और आईएनएस शंकुल का 1992 और 1994 में मुंबई की मडगांव गोदी में निर्माण किया गया.

लेकिन कई विवादों के उठने से यह कार्यक्रम प्रभावित हुआ. पनडुब्बी निर्माण के लिए आधारभूत ढांचे के विकास और पनडुब्बीकर्मियों के प्रशिक्षण पर अथाह खर्च पर सवाल उठने लगे. इससे इस दौरान मिला अनुभव बेकार चला गया और भारत को अब फिर से परंपरागत पनडुब्बियों के निर्माण का ककहरा सीखना पड़ा.

साल 1991 में सोवियत संघ के विघटन से भारत को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि इससे पनडुब्बियों के कलपुर्ज़ों की आपूर्ति प्रभावित हुई. हालांकि इससे एक फायदा यह हुआ कि इनमें से कई कलपुर्ज़ों का स्वदेश में ही निर्माण होने लगा.

26 जुलाई 2009 को स्वदेश निर्मित पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को लांच किया गया.

मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने कभी पनडुब्बियों के बारे में कहा था ‘‘पनडुब्बियों ने अपनी तरह के अधिकारी और जवान तैयार किए हैं जिनकी भाषा और परंपराएं नौसेना की दूसरी शाखाओं से अलग हैं लेकिन उनका दिल नौसेना का ही है.”

(बीबीसी)

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One thought on “छिपकर दुश्मन की टोह लेने वाली पनडुब्बी के विकास की राह भारत के लिए कतई आसान नहीं रही:BBC

  1. hamara deas mhan hia but gdarosa prya san hia bharat estra kia kiya pandubabia kharida skta hia deas mma choar gadar na hoto kmisan khoriya and bahar pisa rkna esa trah ka kam bharat ma jorosa hia and jbtak hamarya deas miya gadar rhya gea tabtak prya sanioa ka jwala rhaga jya hand jya bharat aj bhia hamara bhrat sonya kia chidiya hia but dukha kia bat yah hia kia jabtak gadar deas miya gdariya kryaga tabtak deas agya nhia bikas kryaga but marya samjhha mea nhia ata kia choriya kiwa krtya hia pysa satha jtanhia hia to kiwa choriya kiskya liya sochiya.

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